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400 फ‍िल्मों के ऑड‍िशन कर चुके मुकेश छाबड़ा, सबसे मुश्किल थी बजरंगी भाईजान की कास्ट‍िंंग, जानें क्यों?

कास्टिंग छाबड़ा के नाम से बॉलीवुड इंडस्ट्री में सक्रिय मुकेश छाबड़ा आज टॉप के कास्टिंग डायरेक्टर माने जाते हैं. मुकेश ने हमसे इस मुलाकात में अपनी कास्टिंग प्रोसेस जर्नी पर खुलकर बातचीत की.

मुकेश छाबड़ा मुकेश छाबड़ा
नेहा वर्मा
  • मुंबई,
  • 13 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 11:21 AM IST

डायरेक्टर इम्तियाज अली ने एक बार इंटरव्यू में कहा था कि 'इंडस्ट्री में अगर आज के दौर में किसी से मिल पाना मुश्किल है, तो वो हैं मुकेश छाबड़ा. एक वक्त के लिए डायरेक्टर व एक्टर से तो मुलाकात हो भी जाए, लेकिन मुकेश से अपॉइंटमेंट मिल पाना मुश्किल है.' इम्तियाज के इस स्टेटमेंट में कोई दो राय नहीं है, वाकई में मुकेश जो कास्टिंग छाबड़ा के नाम से पहचाने जाते हैं, इंडस्ट्री के सबसे बिजी पर्सनैलिटी में पहचाने जाते हैं. 

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पांच हजार रुपये लेकर मुंबई शहर आया था 
बता दें, मुकेश के लिए यह जर्नी बहुत आसान नहीं रही है और कईयों के लिए इंस्पीरेशन भी है. थिएटर में सक्रिय रहे मुकेश दिल्ली से केवल पांच हजार रुपये लेकर पहुंचे थे. उस वक्त सरवाइव करने के लिए मुकेश ने हर वो काम किया जिससे वो इस इंडस्ट्री में टिक सके. अपनी इस जर्नी पर मुकेश कहते हैं, बहुत अच्छा लगता है, जब आप एक अंजान शहर आते हो और आपकी जेब में केवल 5 हजार होते हैं. बचपन से मैं इस इंडस्ट्री में आना चाहता था और अब इसका अहम हिस्सा बन चुका हूं. ये सोचकर वाकई मुझे बहुत खुशी होती है. हालांकि मैं यहां तक पहुंच गया हूं, तो इसका कतई मतलब नहीं कि मेहनत करना बंद कर दूं. मैं रोजाना अपने काम में लगा रहता हूं. इस अचीवमेंट को बनाए रखना एक बड़ा टास्क हो जाता है. मैंने गैंग्स ऑफ वासेपुर से जवान तक का सफर तय किया है. अभी तो और आगे जाना है. 

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मां के जाने के बाद मशीन सा हो गया हूं
मुकेश बताते हैं, मैं निजी जिंदगी में अपनी मां के बहुत करीब हूं. हाल ही में उनकी डेथ हुई है. इस हादसे ने मुझे तोड़ दिया है. अब घर जाता हूं, तो कोई नहीं होता है. इसलिए अब मैं रोजाना मशीन की तरह काम करता जा रहा हूं. मैं वो खाली जगह भरने के लिए लगातार खुद को बिजी रखता हूं. 

400 फिल्मों के ऑडिशन किए हैं और कई किस्से रहे हैं 
अतरंगी ऑडिशन एक्सपीरियंस पर मुकेश कहते हैं, फनी ऑडिशन तो हमेशा से होते रहते हैं. मुसीबत तब आती है, जब वो आपके सामने परफॉर्म कर रहे हैं और वो उन्हें लगता है कि उन्होंने बेस्ट कर दिया है लेकिन ऐसा होता नहीं है. उस वक्त एक्साइटमेंट को रोक कर हम कैसे रिएक्ट करते हैं, वो ऊपरवाला ही जानता है. एक फनी किस्सा है, जब हम छिछोरे का ऑडिशन कर रहे थे, तो उस वक्त नितेश ने नवीन पॉली का नाम मुझसे कहा था. मैंने उन्हें फौरन कहा कि अरे ये तो मेरा दोस्त है. मेरी ऑफिस वो अक्सर आता जाता रहता है. नितेश हैरान हो गए थे, उन्होंने कहा कि अरे वो बहुत बड़ा एक्टर ऐसे कैसे हो सकता है. जबकि हम दो अलग-अलग एक्टर की बात कर रहे थे. मैंने अभी तक 400 फिल्मों की कास्टिंग की है, हर ऑडिशन के अनोखे और फनी किस्से हैं. मैं सोच रहा हूं कि इस पर किताब लिख डालूं. 

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न बोलकर कई लोगों का दिल तोड़ा है 
मेरे प्रॉफेशन का सबसे बड़ा ड्रॉबैक यही है कि मुझे कई लोगों को न बोलना पड़ता है. ज्यादातर लोग मुझसे चिढ़े भी इसलिए होते हैं कि उन्हें लगता है कि मैं जानबूझकर उन्हें कास्ट नहीं करता हूं. हालांकि जब वो खुद फिल्म देखते हैं, तो उन्हें लगता है कि मेरा फैसला सही रहा है. यहां लोग प्रफेशनल और फ्रेंडशिप के बीच की लाइन को समझ नहीं पाते हैं. कंफ्यूजन यहीं से आना शुरू होता है. आपका कोई खास दोस्त है, लेकिन आप उसे कास्ट नहीं कर पा रहे हो, तो कई बार बात ईगो तक पहुंच जाती है. सबसे ज्यादा मुश्किल बच्चों की कास्टिंग होती है. मैं इमोशनली थोड़ा डिसटर्ब हो जाता हूं. जब  बजरंगी भाईजान के लिए बच्ची को कास्ट कर रहा था, तो उस वक्त जितने बच्चों को न कहा था, उनके लिए आज भी मुझे बुरा लगता है. उनमें से कुछ बच्चों को मैंने ब्रह्मास्त्र में कास्ट किया था. 

अब मतलबी लोगों को पहचान जाता हूं 
मुकेश बताते हैं, मुझे आज इतना वक्त हो चुका है कि अब मैं यह जान चुका हूं कि आखिर कौन मुझसे मतलब से जुड़ा है और किसे बस दोस्ती चाहिए. पहले ऐसा नहीं था. कईयों ने मेरा इस्तेमाल किया है. बहुत धोखे खाए हैं और अब जाकर इनकी वजह से स्ट्रॉन्ग हो गया हूं. 

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डायरेक्टर से हमेशा क्लैश होते रहते हैं
मुकेश कास्टिंग के प्रॉसेस पर बात करते हुए कहते हैं, ऐसा कई बार हुआ है कि डायरेक्टर और हमारे बीच मतभेद होती रही हैं. हमारे क्लैश जग जाहिर है. हम कास्टिंग पर आपस में सहमत नहीं हो पाते हैं. ऐसा भी हुआ है, जब कोई डायरेक्टर किसी को रेकेमेंड करता है, तो मुझे उसकी कास्टिंग सुटेबल नहीं लगती है. वहीं ये भी होता है कि मेरे सजेस्ट किए हुए एक्टर पर वो राजी नहीं होते हैं. अभी हंसल मेहता जी की बात कर लें, हम कई बार लड़े हैं. हालांकि यहां लड़ाई पर्सनल नहीं होती है, यह बहुत ही क्रिएटिव प्रॉसेस है. मैं कास्टिंग के वक्त इस बात का ध्यान रखता हूं कि जिस नजरिये से हम एक्टर्स को कास्ट कर रहे हैं, क्या वो वाकई में कन्विंसिंग है. किसी को भी खुश करने के लिए यह काम तो नहीं कर सकता हूं. डायरेक्टर और कास्टिंग डायरेक्टर की क्लैश भी इसलिए होती है क्योंकि वो दोनों ही प्रोजेक्ट की बेहतरी के लिए लगे होते हैं. हालांकि मैंने जितने भी डायरेक्टर्स के साथ काम किया है, उनके साथ काम रिपीट ही हुआ है, तो मतभेद जैसी बात रह नहीं जाती है. 

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