
"सबसे बड़ा मैं... मुझसे छोटी बहन ललिता, जब पार्टिशन हुई मेरी मां ने एक बेटे को जन्म दिया, कुक्कू नाम था उसका. बीमार, मां भी बीमार." चेहरा झुकाये, सिर को हाथ से टिकाये... मनोज कुमार हर शब्द जोर देकर बोल रहे थे. मानो अतीत उनका पीछा छोड़ना चाहता था. ये अभिनेता भी अतीत की यादों में छटपटाकर रह जाना चाहता था.
इस कहानी को मनोज कुमार आगे ले जाते हुए कहते हैं, "हम रिफ्यूजी कैंप में, मां को तीस हजारी हॉस्पिटल में रखा. रॉयट्स (दंगे) चालू थे. जब सायरन बजता था तो डॉक्टर और नर्स अंडरग्राउड चले जाते थे. मां मेरी तड़प रही थी. भाई मेरा तड़प रहा था. मां मेरी चीख रही थी कि डॉक्टर को बुलाओ. वो सब अंडरग्राउंड हो गये थे. मां ने चीख मारी, मेरा भाई कुक्कू चला गया था."
87 साल की लंबी जिंदगी जीने वाले मनोज कुमार अपनी बचपन की कहानी और भारत की आजादी के बाद की कहानी को एक साथ गूंथ देते हैं. जगह दिल्ली थी- इलाका किंग्सवे कैंप. हड़सन लाइन, ओल्ड राजेंद्र नगर.
देश के विभाजन के बाद हुए दंगे ने पाकिस्तान के एबटाबाद में पैदा हुए हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी के मासूम मन पर जो असर डाला, वो उनके अवचेतन मस्तिष्क में ताउम्र रहा. उन्होंने अपने 2 महीने के छोटे भाई के शव को यमुना में जो समाधि जी उसका वर्णन झकझोर देने वाला है. आज से लगभग 10-12 साल पहले राज्यसभा टीवी के साथ बातचीत में मनोज कुमार ने कहा था. एक-एक शब्दों का एक-एक वाक्य बनाते हुए.
"भाई की मौत के बाद मैं बहुत गुस्से में था. मैं लाठी लेकर अंडरग्राउंड गया. नर्सेस को भी मारा. डॉक्टर को भी मारा. पिता जी आ गए थे. संभाला. दूसरे दिन उस दो महीने के बच्चे को यमुना जी में प्रवाह कर दिया. जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, वैसे वैसे लगता था, मैं डूब रहा हूं. फिर पिता जी ने रात को अपने सिर पर हाथ रखवाकर कसम दिलवाई कि जिंदगी में दंगा-मारपीट नहीं करनी है. बहुत बार दिल किया कि किसी को थप्पड़ मार दूं. हाथ उठता भी तो जैसे पिता जी रोक लेते."
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भारत और सिनेमा इंडस्ट्री का एक युग देखने वाले हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी उर्फ मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार का शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) को मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में निधन हो गया.
मनोज कुमार का जन्म अविभाजित भारत और आज के पाकिस्तान के एबटाबाद में 1937 में हुआ था. जब वे 10 बरस के हुए तो भारत की आजादी के साथ उनके परिवार के विस्थापन के दिन आ गए. अगर आपको याद हो पाकिस्तान का ये शहर कुछ साल पहले काफी चर्चा में आया था.
एबटाबाद का हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी अपने जन्मस्थान और बचपन को कभी नहीं भूल पाया, उन्होंने कहा था, "जिसका बचपन मर गया, वो आदमी मर गया. अपने अंदर के बचपन को मत मरने दो. वो रोता हुआ बचपन, जो लाहौर से बिछड़ गया, जो जनयाला शेर खां से बिछड़ गया, जो एबटाबाद से बिछड़ गया. बहुत रोता हुआ बचपन था वो. उसको आज भी सोचता हूं तो आंखें भले ही कंट्रोल हो लेकिन दिल रोता है.और दिल का रोना बहुत बुरा होता है, बहुत भयानक होता है."
19 साल में पहला रोल 90 साल के भिखारी का
अपनी फिल्मों में भारतीयता की खोज करने वाले मनोज कुमार की रुपहले पर्दे की यात्रा दिल्ली से शुरू हुई थी. उन्होंने उस इंटरव्यू में कहा था,"पहली फिल्म फैशन में 19 साल की उम्र में 90 साल का भिखारी बनकर एक्स्ट्रा के तौर पर आया था. फिर सहारा फिल्म थी, उसमें मीना कुमारी जी के साथ पांच सात सीन मिले. फिर चांद मिली. फिर कांच की गुड़िया में होरी के रुप में आया."
पहली फिल्म की शूटिंग को याद कर उन्होंने कहा था कि वे बहुत नर्वस थे, कैमरा देखकर लगता था मानो तोप का कोई गोला चलेगा. टांगें कांपती थी, लेकिन काम हो गया.
मनोज साहब जिंदगी के बारे में बात करते-करते एकदम फिलॉसफिकल हो जाते थे. उनका कहना था कि जब दिल्ली में था तो लाहौर याद आता था और जब दिल्ली से मुंबई गया तो दिल्ली की याद सताती थी. यादें बहुत सताती हैं. खुशगवार भी होती हैं, जिंदा भी रखती हैं और रुलाती भी हैं. हंसाती भी हैं.
सिगरेट, शख्सियत और कहानियां
भारत कुमार से जुड़े आदर्श का किस्सा सुनाते हुए मनोज कुमार ने बताया था, "एक बार परिवार के साथ खाना खाने गया. सिगरेट का तब शौक था, सिगरेट पी रहा था. एक नौजवान लड़की आई, उसने मुझे डांटा- आप भारत होकर सिगरेट पी रहे हो, आपको शर्म नहीं आती. उसके बाद मैंने जो फिल्में की उसमें हिरोइन को टच नहीं किया. सीरियस बात कर रहा है, कहीं चिप न हो जाए. इसके बाद जब सिगरेट पीता तो छिपकर की कोई फोटोग्राफर फोटो न खींच ले. बड़ा बोझ है इस नाम का. जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारियां डालता है."
मनोज कुमार की जिंदगी सपनीली कहानियों से भरी थी. वो कहते हैं कि भारत कुमार बनने की कोशिश उन्होंने नहीं की थी. मुझे भारत कुमार बनाया गया. फिल्म उपकार में किसान की कहानी थी. किसान कहां बसता है गांव में, तो मैं भारत नाम रखा, देश की जनता को पसंद आ गया. मैंने हरि कृष्ण से मनोज कुमार बनाया, जनता ने मनोज कुमार से भारत कुमार बना दिया.
मनोज कुमार ने कहा था कि मेरे नेता मेरी पब्लिक है, पब्लिक मैंडेट देती है फिर किसी की क्या जरूरत है.