
क्यों इतना इंतजार करना पड़ता है न्याय मिलने में? यानी देर है तो अंधेर है. पूरे देश में एक सवाल है - एक रेप को लेकर, एक इंसाफ को लेकर. करीब 15 दिनों से चल रहा है ये सवाल. पहली बार एनकाउंटर पर पुलिस पर लोग फूल बरसा रहे हैं. क्या ये इंसाफ था. क्या लोगों का अदालत से भरोसा उठ गया है. आज ही के दिन निर्भया केस जैसा जघन्य अपराध भी हुआ था. लेकिन अब तक अपराधियों को सजा नहीं हुई. एजेंडा आजतक के पहले दिन आयोजित सेशन 'देर है तो अंधेर है' में पूर्व जज ऊषा मेहरा और पूर्व पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार आमने-सामने आ गए. आइए जानते हैं कि दोनों ने क्या कहा...
पुलिस की कार्रवाई में देरी से होती है इंसाफ मिलने में देरीः ऊषा मेहरा
पूर्व हाईकोर्ट जज ऊषा मेहरा ने कहा कि लोग इंसाफ मिलने में देरी से दुखी है. अदालत या न्याय प्रक्रिया से नहीं. अदालतों और पुलिस का काम तेजी से पूरा होना चाहिए. सामान्य पुलिसिंग करने वाले पुलिसवालों से जांच करने वाली पुलिस टीम को अलग कर देना चाहिए. जब तक ये नहीं होगा. तब तक फैसला जल्दी नहीं आएगा. आप ऐसी वैन तैयार करें जिसमें सारे साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स हो जो सैंपल लिफ्टिंग करें. तत्काल सबूत मिल गए तो आप आधी जंग जीत जाते हैं. निर्भया केस में वन स्टॉप सेंटर होना चाहिए था. ताकि लड़की को सामान्य अस्पताल न ले जाया जाता. क्योंकि वहां लोगों की नजरें उसे और पीड़ा देती है. इसके लिए अस्पताल में अलग सेक्शन होना चाहिए. ताकि जांच और इलाज अच्छे से हो.
जांच अफसर को ट्रैफिक कंट्रोल में लगा देते हैं...
पूर्व हाईकोर्ट जज ऊषा मेहरा ने कहा कि जांच अगर पूरी हो तो ट्रायल तत्काल शुरू हो जाता है. 60 के दशक तक एसएचओ अपने विटनेस को लेकर आता है. तीन महीने में फैसला हो जाता है. जांच करना विशेषज्ञता है. जांच ढंग से नहीं होगी तो केस सही से नहीं चलेगा. कई बार एफआईआर 6 महीने में फाइल होती है. जब आईओ ही फंसा होता है ट्रैफिक कंट्रोल में तो वो केस कहां से पूरी करेगा. हमें तो आईओ को वारंट भेजना पड़ा जाता है.
जजों की संख्या बेहद कम हैंः ऊषा मेहरा
पूर्व हाईकोर्ट जज ऊषा मेहरा ने कहा कि लोअर और हाई कोर्ट में बहुत ज्यादा वैकेंसी हैं. मेरा ये मानना है कि अगर ज्यूडिशयरी ने देरी की, और वह इसे रियलाइज नहीं करती तो लोग कानून हाथ में ले लेंगे. हर फैसले का समय तय होना चाहिए.
पुलिस स्टेशनों में स्टाफ कम है, कैसे दोनों काम संभालेः पूर्व पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार
पूर्व पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार ने कहा कि जांच और प्रॉसीक्यूशन के अलग विभाग होने चाहिए. इससे फायदा होना चाहिए. लॉ एंड ऑर्डर विंग और जांच विंग अलग होना चाहिए. ये सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर है. लेकिन आमतौर पर पुलिस स्टेशन पर छह-सात इंस्पेक्टर होते हैं. या कुल मिलाकर 25-30 स्टाफ होते हैं. मानिए किसी घटना में पूरी टीम को जाना हो लेकिन जांच विंग कह दे हम नहीं जाएंगे तब तो मुश्किल हो जाएगी. इतने कम स्टाफ से कैसे लॉ एंड ऑर्डर और जांच दोनों कैसे होगा.
सारी गलती पुलिस की है तो सात साल क्यों लग गएः नीरज कुमार
पूर्व पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार ने कहा कि आज निर्भया केस को हुए 7 साल हो गए हैं. निर्भया केस में हमने 10 दिन में चार्जशीट फाइल कर दी थी. सात साल लग गए फैसला आने में तो उसमें पुलिस जिम्मेदार नहीं है. हमने सारे सबूत दिए. अगर सारा दोष पुलिस का है, अगर सारी कमियां पुलिस की हैं तो केस में सात साल क्यों लग रहे हैं. ये हमारी आदत है कि हम एक पक्ष पर सारे आरोप लगा देते हैं तो काम आसान हो जाता है.
निर्भया मामला एक केस स्टडी है, देरी कहां हुई ये पता करना चाहिएः नीरज कुमार
एक पुलिस अफसर को हम जांच विंग या लॉ एंड ऑर्डर में कैसे बांट सकते हैं. मेरा कहना है कि स्टाफ कम है. शहर में कितना बड़ा बवाल हो जाए तो अगर स्टाफ नहीं होगा तो कौन मैनेज करेगा. लेकिन कानूनी प्रक्रिया इतनी धीमी हो जाती है उससे दिक्कत आती है. मैं सामान्य बात कह रहा हूं कि निर्भया केस के केस स्टडी मानना चाहिए. कि आखिर इतनी देर कहां हुई. हमें इस देरी का पता लगाना चाहिए. फिर उन्हें खत्म करना चाहिए.