
निर्भया को याद करते हुए मोदी सरकार में राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने कहा कि किसी भी तरह के रेप मामले में समयबद्ध जांच नहीं हो पाती है और निश्चित समयावधि में उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है. निर्भया के माता-पिता की जो भी शिकायतें हैं वो इन्हीं वजहों से हैं. वो सात साल से न्याय पाने के लिए भटक रहे हैं. हम संसद के अंदर भी महिलाओं के मुद्दों को लेकर आवाज उठाते हैं. महिलाएं किसी भी राजनीतिक पार्टी से हों, वो हमेशा इन मुद्दों पर बढ़-चढ़ कर बोलती हैं. हम सब ने चर्चा की हैं तभी देश में कड़े कानून बने हैं. 2014 में बने हैं 2012 के बाद बने हैं और 2019 में भी बने हैं. ये समाज, जब कोई मुद्दा उठाता है तो उसपर विमर्श होता है और फिर अगर इसमें कोई कमी रह जाती है तो हम उसपर काम भी करते हैं. आज के विमर्श का यही नतीजा दिख रहा है कि समयावधि के दायरे में रहकर न्यायिक प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए. देश के सभी राज्यों में रेप जैसे जघन्य अपराध हो रहे हैं लेकिन सभी मामलों में दोषी करार दिए जाने की प्रक्रिया में लंबा समय लग जाता है. अदालतों में जजों की कमी हैं इसलिए मामलों के निपटारे में समय लगता है.
सबसे पहले हमें इस सिस्टम की कमियों पर काम करना होगा. पुलिस को अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी. सिस्टम को मजबूत बनाना लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. हम एक बार में सब नहीं कर पाए हैं. सभी सरकारें थोड़ा-थोड़ा कोशिश करती हैं. लेकिन मेरा अपना मत है कि महिलाओं के मुद्दों पर जिस प्राथमिकता के साथ ध्यान देने की जरूरत है हम उसमें चूक रहे हैं. सदन के अंदर हमलोग इस दिशा में काफी प्रयास कर रहे हैं जिससे पीड़ितों को जल्द इंसाफ मिले.
इस समस्या का एक समाजिक पहलू भी है. सामाजिक मूल्यों में गिरावट भी इस तरह के मामलों में बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार है. मुझे यह कहते हुए शर्मा आती है कि एक बेटा अपनी मां का रेप कर रहा है. पिता बेटियों को चेन में बांधकर उनका रेप कर रहा है. हम कैसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं? हमारे पारिवारिक मूल्य कहां चले गए हैं? ये भारत हैं जहां पर नारी की पूजा होती है लेकिन एक बेटा, मां का और पिता, बेटी का रेप कर रहा है. किस तरह के समाज की ओर बढ़ रहे हैं?
इन सबकी शुरुआत घर से करनी होगी. सारी बंदिशें सारे सवाल महिलाओं से ही क्यों? समाज में महिलाओं को एक वस्तु के तौर पर दिखाया जाता है. ये पूरा विषय किसी राज्य या देश का नहीं है बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा है. महिलाओं की समानता पर हर जगह बात हो रही है लेकिन यह तब हो पाएगा जब उनकी सुरक्षा का मुद्दा प्राथमिकता में हों.
रीता बहुगुणा बोलीं- न्यायिक प्रकिया में आए तेजी
यूपी कैबिनेट में मंत्री रीता बहुगुणा ने 16 दिसंबर को याद करते हुए कहा कि आज के दिन सिर्फ भारत ही नहीं पूरा विश्व दहल गया था. निर्भया की घटना ने सभी वर्ग की महिलाओं की आंखों में आंसू ला दिए थे. मैं बचपन से ही महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा और असुरक्षा को देखती रही हूं लेकिन हालात आज भी जस की तस है. कोर्ट में सवा लाख से ज्यादा मामले हैं लेकिन फैसला सिर्फ पांच हजार केसों में ही आया है. बाकी मामले आज भी कोर्ट में चल ही रहे हैं. मामले इतने लंबे खिंच जाते हैं कि न्याय मिलेगा इसपर यकीन नहीं होता. न्यायिक प्रकिया जितनी तेज होगी, जितनी सख्त सजाएं मिलेंगी वो लोगों को इस तरह के अपराध करने से रोकेगा. घर के अंदर महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा, इन घटनाओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. किसी लड़की के साथ गलत होने पर उसे छिपाया जाता है. उसे ठीक से समझाया नहीं जाता कि उसके साथ क्या गलत हुआ?
बता दें, आज ही के दिन निर्भया के साथ गैंगरेप की घटना को अंजाम दिया गया था. इस घटना को सात साल गुजर गए हैं लेकिन अब भी सभी दोषियों को सज़ा नहीं मिली है. इस केस में कुल 6 आरोपी थे. जिनमें से एक दोषी जो नाबालिग था वो तीन साल की सजा काट कर रिहा हो चुका है. वहीं एक ने आत्महत्या कर ली थी. जबकि चार अन्य दोषी विनय शर्मा, मुकेश सिंह, पवन गुप्ता और अक्षय कुमार को फांसी पर चढ़ाए जाने का इंतजार पूरा देश कर रहा है.