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कवि सुरेंद्र शर्मा की नेताओं को नसीहत- देश के लिए लड़ें, देश में ना लड़ें

Agenda AajTak 2024: एजेंडा आजतक के मंच पर हिंदी कवि सुरेंद्र शर्मा ने कहा, "पहले राजनीति में नीति थी, फिर कूटनीति आई और अब कुटिलनीति है. पहले साथ मिलकर बैठते थे, संसद में बहस का दर्जा जिस स्तर का होता था और मेरे विचार में अब जितना घटिया दर्जा हुआ, वो पहले कभी नहीं हुआ था."

हिंदी कवि सुरेंद्र शर्मा (तस्वीर: Arun Kumar, Rajwant Rawat) हिंदी कवि सुरेंद्र शर्मा (तस्वीर: Arun Kumar, Rajwant Rawat)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 14 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 2:54 PM IST

Agenda AajTak 2024: एजेंडा आजतक के सेशन 'हंसी खुशी' में हिंदी कवि सुरेंद्र शर्मा और अशोक चक्रधर ने दर्शकों को अपनी रचनाएं सुनाईं और तालियां बटोरीं. इस दौरान देश की मौजूदा सियासत, हिंदू-मुस्लिम भाईचारे, भारत पाकिस्तान की लड़ाई और ज़िंदगी के मक़सद को लेकर बातचीत की. 

'पहले और मौजूदा दौर की राजनीति में फ़र्क़' के सवाल पर बात करते हुए सुरेंद्र शर्मा ने कहा, "राजनीति में बहुत फ़र्क़ आया है. पहले राजनीति में नीति थी, फिर कूटनीति आई और अब कुटिलनीति है. पहले साथ मिलकर बैठते थे, संसद में बहस का दर्जा जिस स्तर का होता था और मेरे विचार में अब जितना घटिया दर्जा हुआ, वो पहले कभी नहीं हुआ था."

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 (तस्वीर: Arun Kumar, Rajwant Rawat)

'मैं सभी से कहना चाहता हूं...'

कवि सुरेंद्र शर्मा ने कहा, "मैं तो सभी लोगों से एक ही बात कहना चाहता हूं कि आप किसी पार्टी के एमपी नहीं, इलाक़े के एमपी होते हैं. आप भारत के प्रधानमंत्री हो, किसी और के प्रधानमंत्री नहीं हो. आपस में बैठकर बात करो, देश की समस्याओं पर बात करो. देश के लिए लड़ो, कम से कम देश में मत लड़ो, मुल्क पर आप सबका बहुत एहसान होगा."

इसके बाद उन्होंने एक कविता सुनाई, जो इस तरह है...

आज एक बार कहें, आख़िरी बार कहें
क्या पता तुम न रहो, क्या पता हम न रहें
मंदिर-ओ-मस्जिद की या किसी इमारत की 
माटी तो लगी उसमें, भाई मेरे भारत की 
लहू था हिंदू का, अल्लाह शर्मिंदा रहा
मरा मुसलमां तो राम कब ज़िंदा रहा 
बिख़रे-बिख़रे हैं सभी आओ मिल-जुल कर रहें
क्या पता तुम न रहो, क्या पता हम न रहें 

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'इंसानियत ज़िंदा रहनी चाहिए...'

सुरेंद्र शर्मा ने कहा, "मैं आप सबसे यही कहना चाहता हूं कि संदेश देने वालों से बच कर रहें. ये मुल्क संदेश देने वालों से ही बर्बाद हुआ है. अगर हम संदेश देने वालों से बचते, तो अपनी सोच पैदा करते. हमने अपनी सोच खत्म कर दी और संदेश वालों के ऊपर चलने लग गए. संदेश वालों पर कभी भी ज़िंदगी में नहीं चलो, अपने दिमाग़ से काम लो, जिससे ज़िंदगी के अंदर आप भी कुछ करें और बेहतर ढंग से होगा."

'अगर लोग संदेश नहीं मानें, तो कहां जाएं?' इस सवाल पर सुरेंद्र शर्मा ने सबसे पहले कवि घनश्याम अग्रवाल की कुछ पंक्तियां सुनाईं...

पाकिस्तान के सौ मरे
हमारे दो सौ मरे 
लेकिन कविता तीन सौ लाशों की बात करती है, न कि सौ और दौ सौ.

उन्होंने आगे कहा कि इंसानियत ज़िंदा रहनी चाहिए, चाहे किसी भी तरह से ज़िंदा रहे. भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई नहीं हो, मैं तो कहता हूं कि जाकर उनके हुक्मरानों से बात करें. मोदी जी जाएं और कहें...

आख़िरी लड़ाई लड़ते हैं, 
तू अपने मुल्क ग़रीबी पहले मिटाता है या हम मिटाते हैं,
तू अपने मुल्क बेरोज़गारी पहले मिटाता है या हम मिटाते हैं,
यार गोलियों का ख़र्च रोटियों पर हो जाए, तो दोनों देश के लोग संपन्न हो जाएं, 
मैं तो चाहता हूं कि 2025 में ये हो जाए. 

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'मैं चपरासी हूं...'

सुरेंद्र शर्मा ने कहा, "हमेशा ये सोचना चाहिए कि तुम्हारे पांव ने ज़मीन तो नहीं छोड़ी है, ज़मीन से जुड़े रहकर हम तरक़्क़ी करेंगे तो स्थायी रहेगा, नहीं तो हमें आकाश और पर्वत की उंचाई नहीं चाहिए." उन्होंने आगे कहा कि मैं हास्य का चपरासी हूं, बादशाह नहीं क्योंकि बादशाह होने के बाद तरक़्क़ी ख़त्म हो जाती है और चपरासी होने पर तरक़्क़ी शुरू होती है.

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