
सीरिया में इसी महीने तख्तापलट के बाद देश की लीडरशिप हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) के पास चली गई. ये एक इस्लामिक संगठन है, जो अतीत में अलकायदा का हिस्सा रहा. सीरियाई जनता फिलहाल खुश है लेकिन बाकी देशों में आशंका बढ़ी हुई है. दरअसल इस संगठन के हाथ सैन्य उपकरणों और हथियारों का बड़ा भंडार लग चुका है, जो राष्ट्रपति बशर अल-असद की मदद के लिए रूस ने रख छोड़ा था.
सीरिया की स्थिति तीन साल पहले अफगानिस्तान के हालात से काफी मिलती-जुलती है. वहां भी अचानक अमेरिकी सेना के जाने से काफी सैन्य उपकरण बच गए थे, जो अब चरमपंथियों की विरासत हो गए हैं.
सीरिया में रूस और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाएं क्या कर रही थीं
रशियन आर्मी साल 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति बशर अल-असद के बुलाने पर पहुंची थी. ये सीरियाई विद्रोह के साथ इस्लामिक स्टेट का भी दौर था और असद को सत्ता बचाने के लिए विदेशी सपोर्ट की जरूरत थी. रूस से चूंकि उनके रिश्ते अच्छे रहे, लिहाजा वहां की सेना माल-असबाब के साथ सीरिया पहुंच गई.
आईएसआईएस के शिविरों को खत्म करने और असद की सत्ता बचाने के बाद भी मॉस्को वहां बना रहा. ये मिडिल ईस्ट में अपने पांव मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा था. अब असद सरकार के तख्तापलट के बाद सेना की मौजूदगी भी लगभग खत्म हो गई, लेकिन हथियार और सैन्य उपकरण छूट गए. माना जा रहा है कि ये अब एचटीएस के पास हैं.
फिलहाल यह साफ नहीं है कि असद के हथियारों का कितना हिस्सा, जो ज्यादातर रूस के हैं, एचटीएस के हाथ लगा है. चूंकि एचटीएस एक वक्त पर बेहद खूंखार और कट्टर रहा, इसलिए कई देश डरे हुए हैं कि हथियारों का गलत इस्तेमाल न हो. यही वजह है कि सीरिया में तख्तापलट होते ही इजरायल ने उसपर बमबारी शुरू कर दी ताकि युद्धपोत, लड़ाकू विमान और गोला-बारूद के भंडार को खत्म किया जा सके.
अफगानिस्तान में लगभग दो दशक रही यूएस आर्मी
अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में साल 2001 में पहुंची थी, जब 9/11 के बाद उसने वॉर ऑन टैरर का एलान कर दिया था. अलकायदा को पनाह देने वाली तालिबानी सरकार को मिटाने के लिए सेना ने अपना पूरा जोर लगा दिया. बाद में भी वो वहीं बनी रही ताकि किसी भी आतंकी गुट के पैर न जमने पाएं. अगस्त 2021 में आर्मी वहां से पूरी तरह से हट गई. लेकिन 20 सालों तक वहां रहने के दौरान सेना ने काफी हथियार जमा किए थे, जो आखिरकार तालिबान को विरासत में मिल गए.
ये सवाल पीछे छूटे हुए
सीरिया और अफगानिस्तान में रूस और अमेरिका की सेना ने दशकों बाद अपना बेस छोड़ा तो पीछे हथियारों और गोला-बारूद का बड़ा भंडार भी छूटा ही होगा, लेकिन किसका नुकसान ज्यादा हुआ- अमेरिका या रूस का. और दोनों में से कौन सा चरमपंथी गुट कितना खतरनाक हो सकता है?
कितने हथियार मिले सीरिया को
सीरिया और रूस (तब सोवियत संघ) के हथियारों का रिश्ता कोल्ड वॉर के समय से शुरू हो चुका था. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक, साल 1950 से 1991 तक सीरिया के 94 फीसदी हथियार रूस से आए थे. बाद में और मॉर्डन हथियार और लड़ाकू विमान, एंटी-मिसाइलें सब इसमें जुड़ती चली गईं. साल 2011 में शुरू हुए सिविल वॉर के दौरान ये भंडार और बढ़ा. ये स्टॉक इतना ज्यादा था कि सीरियाई सेना सालों तक निश्चिंत रह सकी.
यह साफ नहीं है कि असद सरकार ने रूस से मिले कितने टैंक और बख्तरबंद वाहन पीछे छोड़े लेकिन ओपन-सोर्स युद्ध मॉनिटर ओरिक्स के अनुसार, इसमें टैंक, तोप, लड़ाकू वाहन, रॉकेट लॉन्चर समेत बंदूकें और बम शामिल हैं, जिनकी कोई गिनती नहीं. फॉरेन पॉलिसी की एक रिपोर्ट में इजरायल ने दावा किया वो इनमें से बड़ा भंडार खत्म कर चुका ताकि चमरपंथी समूह उसपर या मिडिल ईस्ट में किसी पर भी हमलावर न हो सके लेकिन अंदाजा है कि अब भी भारी भंडार बाकी होगा.
तालिबान के पास क्या-क्या बाकी
अमेरिकी सरकार की वॉचडॉग संस्थाओं ने अनुमान लगाया कि तीन साल पहले अमेरिकी सेना के जाने के बाद तालिबान ने वहां मौजूद 7 बिलियन डॉलर से ज्यादा के अमेरिकी सैन्य उपकरणों पर कब्जा कर लिया. साल 2022 में यूएस डिफेंस विभाग ने बताया कि वहां इससे भी कहीं ज्यादा कीमत के हथियार और उपकरण छूट गए थे.
एचटीएस या तालिबान, कौन हो सकता है ज्यादा घातक
दोनों ही चरमपंथी समूह हैं और दोनों की ही आइडियोलॉजी लगभग एक जैसी है. दोनों समूह इस्लामिक शासन चाहते हैं लेकिन उनमें कई फर्क भी हैं, जो उन्हें ज्यादा या कुछ कम खतरनाक बना सकते हैं.
क्यों डराता है एचटीएस
हयात तहरीर अल-शाम के पास फिलहाल पूरे देश की कमान है. सीरिया लंबे समय से अस्थिर ही रहा. तिसपर एचटीएस का कनेक्शन अलकायदा से था. उसने हाल-हाल तक सीरिया में अपने कंट्रोल वाले हिस्सों पर कई हिंसक वारदातें कीं. उसका तरीका भी कट्टरता से भरा है. सीरियाई मसला चूंकि रूस, ईरान, तुर्की और यहां तक कि अमेरिका और इजरायल से भी जुड़ा हुआ है, ऐसे में बहुत आशंका है कि कोई देश इस दल को अपने फायदे के लिए सपोर्ट करे और वो ज्यादा आक्रामक बन जाए.
तालिबान की ताकत के क्या हैं मायने
तालिबान अफगानिस्तान में लंबे समय से एक्टिव रहा. अब वो दोबारा काबुल में है. अपने बेहद कट्टर तरीकों से लिए कुख्यात ये समूह महिलाओं को लेकर काफी क्रूर रहा. तालिबान का खतरा केवल अफगानिस्तान तक नहीं, इसके पास पाकिस्तान, भारत, और मध्य एशिया में भी प्रभाव है. इसने तीन साल पहले अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज होने के बाद इन इलाकों में अस्थिरता बढ़ाई ही.
जियोपॉलिटिक्स के लिहाज से दोनों की देशों में चरमपंथी लीडरशिप का होना घातक साबित हो सकता है, खासकर जब मिडिल ईस्ट से लेकर एशिया में भी उथलपुथल दिख रही है.