
मैक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप के की खाड़ी में अब तक का सबसे गहरा ब्लू होल मिला, जिसे नाम मिला ताम जा ब्लू होल. इसकी गहराई का पक्का पता लगने में समय लगेगा क्योंकि फिलहाल मौजूद कोई भी यंत्र एक हद से नीचे नहीं जा सकता. ये तो हुई ब्लू होल की बात, लेकिन दुनिया की सबसे गहरी जगह भी समुद्र में ही है. गहरे अंधेरे और माइनस तापमान वाले इस हिस्से को चैलेंजर डीप नाम दिया गया.
कहां और कैसा है चैलेंजर डीप
वुड्स होल ओशनग्राफिक के अनुसार, समंदर की औसत गहराई करीब 12 हजार फीट है. वहीं इसके सबसे गहरे हिस्से को चैलेंजर डीप कहते हैं. ये जगह प्रशांत महासागर के नीचे मारियाना ट्रेंच के दक्षिणी छोर पर है. बता दें कि मारियाना ट्रेंच समुद्री खाई है, जो लगभग ढाई हजार किलोमीटर तक फैली हुई है. इसी के एक कोने में चैलेंजर डीप बना हुआ है. ये लगभग 36 हजार फीट गहरा है. साल 1875 में पहली बार इसका पता लगा. तबसे इसके करीब जाने की कई कोशिशें हुईं, लेकिन हर बार आधी-अधूरी रहीं.
सबसे पहले इसकी गहराई का मोटा अंदाजा लगाते चलें. चैलेंजर डीप उस जगह से तीन गुना गहरा है, जहां टाइटेनिक का मलबा पड़ा हुआ है. या फिर इसे समझिए कि ये अपनी गहराई में माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई से भी ज्यादा है.
क्यों है यहां जाने में जोखिम
इस जगह जाना कितना जोखिमभरा है, इसे एक उदाहरण से जानते हैं. समंदर में हर 33 फीट नीचे जाने पर पानी का दबाव एक एटमॉस्फेयर बढ़ जाता है. एक एटमॉस्फेयर का मतलब है हर वर्ग इंच पर लगभग 15 पाउंड का प्रेशर. तो समुद्र की इस सबसे गहरी जगह पर दबाव वैसा होता है जैसे हर स्क्वायर इंच पर 50 जंबो जेट रखे हों. हर समय गहरे अंधेरे में डूबे चैलेंजर डीप का तापमान शून्य या इससे नीचे रहता है. दुनिया की ये सबसे गहरी जगह अपने में ढेरों रहस्य लिए हुए है, जिसका ओरछोर मॉडर्न तकनीकों को भी नहीं लग सका.
नीचे दिखे प्लास्टिक बैग और कैंडी रैपर!
साठ के दशक में पहली बार डॉन वेल्स और जेक्यू पिकार्ड यहां पहुंचे, लेकिन कुछ पलों से ज्यादा वक्त नहीं बिता सके. एक अमेरिकी समुद्री खोजकर्ता विक्टर वेस्कोवो ने भी यहां पहुंचने के बाद दावा किया कि ग्रह के सबसे गहरे स्थान पर एक प्लास्टिक बैग और कैंडी रैपर दिखा. बाद में टीम ने कहा कि वे यह जांच रहे हैं कि रैपर इंसानों का बनाया हुआ है, या कोई दूसरी चीज है, जिसे वे रैपर समझ बैठे. या फिर समुद्र की तली में कोई और सभ्यता पल रही है, जिसका खानपान इंसानों जैसा है.
क्या चैलेंजर डीप में जीवन है?
प्रशांत महासागर स्थित इस जगह की गहराई इतनी ज्यादा है कि यहां बिल्कुल अंधेरा है. चैलेंजर डीप का तापमान फ्रीजिंग पॉइंट से कुछ ही कम होता है. इस जगह जाने के बाद भी लोगों को ये पता नहीं लग सका कि यहां जीवन है या नहीं. अधिकतर सी-एनिमल्स भी वहीं रहते हैं, जहां रोशनी हो और वनस्पति हो.
लंग्स फटने लगते हैं 120 फीट से नीचे जाते ही
टाइटन की तरह सबमरीन, जिसे ह्यूमन ऑक्युपाइड वीकल भी कहते हैं, इसकी मदद से गहरे समुद्र में जाया जा सकता है. इसके अलावा रिमोटली ऑपरेटेड वीकल भी होते हैं, जो बड़े जहाजों से लेकर वैज्ञानिकों के सीधे संपर्क में होते हैं. इसके बाद भी समुद्र में जाना आसान नहीं. मजबूत कदकाठी और पूरी तरह फिट लोग भी 100 फीट से नीचे जाने पर सांस लेने में दिक्कत महसूस करते हैं. गोताखोर 120 फीट तक जा पाते हैं. इसके बाद फेफड़ों पर भारी दबाव पड़ने लगता है.
हो सकती है जहरीली हवा से मौत
गहरे पानी में नाइट्रोजन पॉइजनिंग की स्थिति बन आती है, जिसे नाइट्रोजन नार्कोसिस भी कहते हैं. इस दौरान कई गैसें एक साथ मिलकर मेंटल और कॉग्निटिव फंक्शन पर असर डालती है. इससे तैराक को सांस लेने, सोचने और हाथ-पैर हिलाने में भी परेशानी होने लगती है. पानी में ऊपर की तरफ जाने से ये कंडीशन टल जाती है, लेकिन नार्कोसिस की दशा में पहुंच चुका शख्स आमतौर पर ये फैसला लेने की हालत में ही नहीं रहता.
क्यों सामने रहते हुए हम समुद्र को स्पेस से कम जानते हैं?
नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार, साल 2022 तक दुनिया में 20% ही सीफ्लोर ही देखा गया है. इसकी एक नहीं, कई वजहें हैं. सबसे पहला कारण है, समुद्र के भीतर का प्रेशर. सिर्फ समुद्र के पास जाने भर से हम पर 15 पाउंड प्रति वर्ग इंच का दबाव पड़ने लगता है. ये गहराई के साथ बढ़ता ही चला जाता है. वहीं अंतरिक्ष में दबाव जीरो हो जाता है.
बना हुआ है डेविल्स ट्राएंगल का डर
पानी के ऊपर से गुजरते हुए कई हवाई जहाज गायब हो गए और पानी के जहाज भी एकदम से कहीं लापता हो गए. फिर इनका कुछ पता नहीं लगा. ये बरमुडा ट्राएंगल है, जो अपने दायरे में आई हर चीज को निगल जाता है. इसे धरती का ब्लैक होल भी मान सकते हैं. नॉर्थ अटलांटिक महासागर का ये त्रिभुजाकार हिस्सा अब तक पूरी तरह से समझा तक नहीं जा सका.
स्पेस के बारे में बहुत कुछ जानने वाले एक्सपर्ट भी इसे पैरानॉर्मल थ्योरीज या एलियन्स से जोड़ते हैं. यहां तक कि इस जगह जाकर अमेरिकी बमवर्षक विमान भी रहस्यमयी तरीके से गायब हो गए. इसके बाद इस जगह को डेविल्स ट्राएंगल नाम दिया गया. अब समुद्र की खोज में लगे लोगों को ये डर भी है कि कहीं इस जैसी कई और जगहें तो गहराई पर नहीं होंगी.