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क्या है नजूल की जमीन, जिसपर बनी धार्मिक इमारतों को हटाने पर सुलग उठी देवभूमि हल्द्वानी, कौन है इसका मालिक?

हल्द्वानी के बनभूलपुरा में गुरुवार को भड़की हिंसा में पांच लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि करीब 300 लोग घायल हैं. फिलहाल पूरे उत्तराखंड में मिली-जुली आबादी वाले इलाकों में पुलिस अलर्ट पर है. सारा मामला तब शुरू हुआ, जब प्रशासन कथित तौर पर नजूल की जमीन पर बने मदरसे और मस्जिद को ध्वस्त करने पहुंचा.

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aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 12 फरवरी 2024,
  • अपडेटेड 1:22 PM IST

कुमाऊं का एंट्री पॉइंट कहलाने वाला हल्द्वानी वैसे तो हमेशा शांत रहता है, लेकिन गुरुवार को यहां का माहौल बदल गया. सड़कों पर पत्थरों की बौछार, और आगजनी फैली हुई थी. हिंसा में मौतें भी हुईं और बहुत से लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए. मामले की शुरुआत तब हुई, जब प्रशासन बनभूलपुरा में माइनोरिटी के कथित अवैध धार्मिक स्थलों को तोड़ने पहुंचा, जो नजूल लैंड पर बने हुए थे. 

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खुफिया एजेंसियों ने किया था आगाह

अब इस मामले में कई रिपोर्ट्स आ रही हैं, जो कहती हैं कि इंटेलिजेंस को इस हिंसा का पहले ही अंदाजा हो चुका था, और उसने एडमिनिस्ट्रेशन को चेताया था कि मुस्लिम कट्टरपंथी नेता अपने लोगों को उकसा सकते हैं. मामले की जांच चल रही है. इस बीच ये जानते हैं कि आखिर ये नजूल जमीन क्या बला है, जिसके चलते सारा फसाद हुआ. साथ ही, जिस जगह तोड़फोड़ हुई, उसका आधिकारिक स्टेटस क्या है. 

सरकार का होता है नजूल लैंड

जमीन खरीदना तो लगभग सभी का सपना होता है, लेकिन इसकी खरीदी-बिक्री के समय बेहद चौकन्ना रहना पड़ता है. कई बार रेकी के दौरान दिख जाता है कि किसी पट्टे पर नजूल भूमि का बोर्ड लगा हुआ है. ये असल में सरकारी जमीन है, जिसपर न तो कोई पक्की इमारत बनाई जा सकती है, न ही खेती-बाड़ी की जा सकती है, जब तक कि सरकार इजाजत न दे. इसे आम लोग खरीद या बेच नहीं सकते. 

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अंग्रेजों के समय चली प्रथा

नजूल जमीन की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई. ये भूमि के वो टुकड़े थे, जो असल में बागियों के थे, और जिनपर अंग्रेजों ने जबरन कब्जा कर लिया. आजादी के बाद सरकार ने जमीन मालिकों को उनके पट्टे वापस लौटाने शुरू कर दिए. लेकिन कई जमीनों के वारिस ही नहीं मिले. या फिर ऐसे लोग सामने आए, जिनके पास पूरे कागज नहीं थे. ऐसे में आजाद भारत की सरकार ने जमीन का मालिकाना हक अपने पास ही रखा. 

लीज पर भी दी जाती हैं 

ये जमीन जिस राज्य में आती है, उस सरकार की होती है, लेकिन आमतौर पर सरकारें इसे खाली रखने की बजाए एक तय समय के लिए लीज पर दे देती हैं. ये अवधि 15 साल से लेकर 99 साल तक की हो सकती है. लीज खत्म होने से पहले रेवेन्यू विभाग में चिट्ठी देकर उसे रिन्यू भी कराया जा सकता है. लेकिन फैसला सरकार के ही हाथ में होता है कि वो जमीन का क्या करना चाहती है. 

किस काम आती है ये जमीन

देश के लगभग हर राज्य में नजूल की जमीनें हैं. वहां का स्थानीय प्रशासन तय करता है कि उस जमीन को किसे और किसलिए लीज पर दिया जाए.

ज्यादातर समय प्रशासन इसका इस्तेमाल स्कूल, अस्पताल या पंचायत भवन बनाने के लिए करता है.

कई शहरों में यहां हाउसिंग सोसायटी भी बनाई जाती है, जो लीज पर होती है. इसके लिए नजूल लैंड्स (ट्रांसफर) रूल्स 1956 काम करता है.

इसमें ये देखा जाता है कि जमीन का टाइप क्या है, यानी क्या वो खेती लायक है, या फिर बंजर है. इसके मुताबिक ही उसे लीज पर दिया जाता है. 

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क्या नजूल का मालिकाना हक बदल सकता है 

नहीं. जमीन का इस्तेमाल किस काम के लिए हो रहा है, ये बदल सकता है. खेती की जमीन आगे चलकर इमारत बनाने के काम आ सकती है. लीज पर किसे दिया जाएगा, ये बदल सकता है, लेकिन उसका मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा. कहीं-कहीं अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों को भी ये जमीन खेती के लिए पट्टे पर दी जाती है. 

क्या हल्द्वानी की विवादित जमीन नजूल के तौर पर रजिस्टर्ड है?

हल्द्वानी जिला प्रशासन का कहना है कि जिस प्रॉपर्टी पर माइनोरिटी का धार्मिक स्थल बना हुआ है, वो नगर निगम की नजूल जमीन के तौर पर रजिस्टर्ड है. वहां पर करीब तीन हफ्तों से सड़कों से जाम कम करने के लिए अवैध कब्जे हटाए जा रहे थे.

इसी सिलसिले में वहां नोटिस देते हुए कहा गया कि वे जमीन के मालिकाना हक के कागज कोर्ट में जमा कराएं, या कब्जा हटाएं. इसके बाद ही बवाल शुरू हुआ. डीएम ने अपने बयान में कहा था कि जमीन पर अवैध कब्जे की बात तय होने के बाद ही अतिक्रमण हटाया गया. 

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