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बगैर दस्तावेज भी सालों-साल अमेरिका और ब्रिटेन में रह रहे भारतीय, शरण चाहने वालों की कैसे मदद करता है कानून?

बहुत से देशों की तुलना में भारतीयों को अमेरिका या ब्रिटेन में शरण मिलने की संभावना काफी कम है. इसके बाद भी एक बड़ी भारतीय आबादी वहां सालों-साल टिकी रह जाती है. अगर ये देश शरण देने से इनकार कर दें तो भी वापस लौटना जरूरी नहीं. पूरा लीगल सिस्टम है, जो शरण दिलवाने की लड़ाई लड़ेगा. इस बीच महीनों से लेकर साल बीत जाते हैं.

अमेरिका और ब्रिटेन में असाइलम-सीकर्स बढ़ रहे हैं.  (Photo- Getty Images) अमेरिका और ब्रिटेन में असाइलम-सीकर्स बढ़ रहे हैं. (Photo- Getty Images)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 04 सितंबर 2024,
  • अपडेटेड 12:01 PM IST

भारत से अमेरिका और ब्रिटेन पहुंचने वाले ऐसे लोग बढ़ रहे हैं जो बगैर दस्तावेज जाकर उसी समय शरण के लिए आवेदन देते हैं. दोनों ही देशों में पहले से ही असाइलम के लिए लंबी वेटिंग है. ऐसे में कुछ को तो शरण मिल जाती है, लेकिन बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें हटाने की कार्रवाई अनिश्चितकाल तक चलती रह जाती है. ऐसे में वे लोग उन्हीं देशों में टिके रहते हैं. 

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बाहरियों को शक और डर से देखा जा रहा

कुछ सालों से यूरोप समेत पूरे पश्चिम में शरण देने को एक बड़ी समस्या की तरह देखा जा रहा है. अगर सुपर पावर अमेरिका की बात करें तो राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ रहे डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया कि वे सीमाओं पर पहरा सख्त कर देंगे क्योंकि उनकी वजह से देश का संतुलन गड़बड़ा रहा है. इधर ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस में भी दक्षिणपंथी पार्टियां तेजी से लोकप्रिय हुईं, जो बाहरियों को हटाने या एंट्री बैन करने की बात कर रही हैं. लेकिन भारतीय अब भी तेजी से बाहर जा रहे हैं. और शरण देने की तय क्षमता के बावजूद देश उन्हें बाहर नहीं निकाल पा रहे. 

ब्रिटिश नागरिकता के लिए काफी सारे लोग आवेदन करते हैं. लेकिन वहां की सरकार ने सबके लिए एक कंट्री लिमिट तय कर रखी है. इसके तहत हर देश से कुछ निश्चित प्रतिशत को ही मंजूरी मिलती है.

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इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट कहती है कि शरण मिलने के हिसाब से भारतीय आबादी 15वें पायदान पर है. ईरान इसमें टॉप पर है. वहां से 77 से 86 फीसदी आवेदकों को शरण मिल जाती है. इसके बाद अफगानिस्तान, पाकिस्तान से लेकर चीन तक शामिल हैं. वहीं सिर्फ 6 से 9 फीसदी भारतीयों को ही सालाना मंजूरी मिल पाती है. मसलन, पिछले कुछ सालों को देखें तो साल 2019 से 2023 तक तीन सौ से भी कम भारतीयों को शरण या रिफ्यूजी स्टेटस के बगैर रहने की इजाजत मिली. 

कड़ाई बरतने की वजह से यूके में बैकलॉग काफी कम हुआ, मतलब पुरानी वेटिंग लिस्ट की छंटाई हो सकी. लेकिन तब भी लगभग एक लाख लोग फैसले के इंतजार में थे, और वे एक-दो हफ्ते नहीं, बल्कि लंबे समय से थे. 

लीगल स्टेटस के बिना भी क्यों मिलती है अनुमति

इसकी वजह वहां का लीगल सिस्टम है. अगर यूके होम ऑफिस किसी को शरण देने में आनाकानी करे तो वो कोर्ट के इमिग्रेशन और असाइलम चैंबर के पास शिकायत कर सकता है. एक अपील के तय होने में 11 महीने लग जाते हैं. इतने समय तक आवेदन करने वाला वहां रह सकता है. अगर यहां भी एप्लिकेशन खारिज हो जाए तो भी रास्ता बंद नहीं होता. शरण चाहने वाला अपर ट्रिब्यूनल जा सकता है. अगर ये भी फेल हो जाए तो लोग कोर्ट जाकर रिव्यू की दरख्वास्त कर सकते हैं. 

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यूएस में कौन चाहता है शरणार्थी स्टेटस

अमेरिका में ज्यादातर ऐसे लोग शरण लेने पहुंचते हैं, जो किसी न किसी कारण से अपने यहां परेशान हैं. इसमें युद्ध भी हो सकता है, अंदरुनी दंगे भी, या धार्मिक भेदभाव भी. कुछ लोग राजनैतिक वजहों से शरण लेना चाहते हैं. दोनों ही मामलों में सुनवाई काफी लंबी चलती है. साल 2018 से खुद को पीड़ित बताने वाले भारतीय एप्लिकेंट्स की संख्या तेजी से बढ़ी लेकिन उनका बैकलॉग ही साफ नहीं हो पा रहा. साल 2017 में पेंडिंग मामलों की संख्या लगभग 11 हजार थी, जो बीते साल 53 हजार को पार कर गई. 

तीसरे देश की सीमा से कर रहे घुसपैठ 

वहां कानूनी शरण का रास्ता यूके से ज्यादा मुश्किल है. ऐसे में लोग कनाडा के रास्ते अमेरिका जाते और असाइलम के लिए आवेदन कर देते हैं. वहां से आने वालों के लिए लीगल प्रोसेस काफी लंबी चलती है. चूंकि ये सीधे डिपोर्ट नहीं किए जा सकते, तो वहीं रहकर काम करते रहते हैं. ऐसे लोगों को वहां की बिजनेस लॉबी का भी सहारा रहता है. उन्हें बगैर ज्यादा लिखीपढ़ी के लिए अपने लिए वर्कर मिल जाते हैं. 

असाइलम चाहने वालों को वापस भेजना काफी मुश्किल

एक न एक धड़ा ऐसा होता है जो मानवाधिकार के नाम पर उन्हें लौटाने का विरोध करता है. अगर भारत की ही बात करें तो ये शरणार्थी समझौते का हिस्सा नहीं, लेकिन हमारे यहां भी लाखों लोग बिना दस्तावेज बाहर से आए हुए हैं और कामकाज कर रहे हैं. खासकर जब शरण चाहने वाले किसी तीसरे देश से एंट्री करते हैं, तो उन्हें लौटाना और मुश्किल हो जाता है. प्यू रिसर्च सेंटर की साल 2021 की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका में मैक्सिको और अल सल्वाडोर के बाद भारतीय तीसरे सबसे बड़े अवैध अप्रवासी बन गए. 

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इलेक्शन से पहले अमेरिका में कई उलटफेर

नवंबर में चुनाव से पहले अमेरिका ने अपने यहां बसी भारतीय आबादी या बाकी देशों के अप्रवासियों को लुभाने के लिए एक बड़ा दांव खेला. वाइट हाउस ने एलान किया कि बाइडेन प्रशासन आने वाले समय में दस्तावेजों के बगैर रहते लोगों को अपने यहां बसने और नागरिकता के लिए आवेदन की इजाजत देगा. इस स्कीम को पैरोल-इन-प्लेस ग्रीन कार्ड कहा जा रहा है. 

कौन आएगा स्कीम के तहत

इसके तहत उन लोगों को रखा जाएगा, जो किसी अमेरिकी नागरिक से शादी के बाद कम से कम 10 साल अमेरिका में रह चुके हों. या फिर वे बच्चे भी इसके हकदार हो सकते हैं जिनके पेरेंट्स में से किसी ने अमेरिकी सिटिजन से शादी की हो. एक तरह से देखा जाए तो यह मानवाधिकार पैरोल है, जो उन्हें मिलता है जो लोग पहले से ही अमेरिका में रह रहे हैं. ये साढ़े 5 लाख से ज्यादा लोगों को अस्थाई वैधता और काम करने की छूट देगा. इस बीच वे वैधता के लिए ग्रीन कार्ड की मंजूरी भी ले सकते है. भारतीय भी इसमें शामिल हैं. 

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