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क्या बहस सुनकर बदल जाता है वोटर का इरादा, US में राष्ट्रपति चुनाव से पहले डिबेट पर क्यों रहता है जोर?

हाल में कुछ पूर्व जजों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस लीडर राहुल गांधी को सार्वजनिक बहस का न्योता दिया. वैसे अमेरिका में यह सिस्टम है कि वहां राष्ट्रपति चुनाव से पहले उम्मीदवार टीवी पर बहस करें. कई दूसरे देश भी बेहद गंभीरता से सर्वोच्च पद के लिए डिबेट कराते रहे. लेकिन क्या इनसे मतदाताओं की सोच पर कोई फर्क पड़ता है?

अमेरिका में नवंबर में चुनाव होने जा रहा है. अमेरिका में नवंबर में चुनाव होने जा रहा है.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 13 मई 2024,
  • अपडेटेड 2:52 PM IST

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कुछ पूर्व जजों ने पीएम नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी को एक चिट्ठी लिखकर दोनों को ओपन डिबेट का न्योता दिया. चिट्ठी में लिखा गया कि सार्वजनिक बहस से लोग अपने नेताओं को सीधे सुन सकेंगे और इससे काफी फायदा होगा. लेकिन क्या वाकई ऐसा होता है? 

अमेरिका समेत कई बड़े देशों में ये सिस्टम है. यहां सर्वोच्च पद के नेता और भावी नेता के बीच खुली बहस होती है, जिसे एक साथ भारी आबादी सुनती है. लेकिन शोध मानते हैं कि पहले से मन बना चुके वोटरों पर इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता. 

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क्या फर्क पड़ता है मतदाताओं की सोच पर

साल 2019 में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल ने एक रिसर्च की, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी समेत कई देशों के 31 चुनावों के दौरान हुए 56 टीवी डिबेट्स को देखा गया. शोध में 94 हजार लोग शामिल थे. इनसे पूछा गया कि वे किसे वोट करना चाहते हैं. यही सवाल डिबेट के बाद भी पूछा गया. शोधकर्ता उम्मीद कर रहे थे कि लोगों के जवाब बदल जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पाया गया कि चुनावी बहस तो सबने देखी लेकिन इससे किसी का मन नहीं बदला. ये शोध साइंटिफिक अमेरिकन में प्रकाशित हुई. 

क्या हो सकती हैं वजहें

जो लोग राष्ट्रपति बहस को सुनते हैं, वे जाहिर तौर पर राजनैतिक रूप से काफी जागरुक होते हैं और पहले से ही अपना मन बना चुके रहते हैं कि उन्हें किसे वोट देना है. 

प्रेसिडेंशियल डिबेट से काफी पहले से कैंपेन चल रहे होते हैं. ज्यादातर वोटर इस दौरान डिसाइड कर लेते हैं कि उन्हें किसको वोट करना है. 

अगर डिबेट के दौरान कोई मुद्दा उठे भी, और हल्की-फुल्की हलचल मच जाए तब भी ये जल्दी दब जाता है. 

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कई अध्ययनों में अलग ही दावा

कई स्टडीज मानती हैं कि डिबेट से काफी फर्क पड़ता है, यही कारण है कि उम्मीदवार इसकी तैयारी करके आते हैं.

कुछ महीनों पहले राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर कहा था- लोग जानते हैं कि मैं कौन हूं और मेरा कार्यकाल कितना सफल रहा. इसलिए मैं डिबेट में शामिल नहीं रहूंगा. ट्रंप रिपब्लिकन्स की तरफ से राष्ट्रपति पद के दावेदार हैं. उन्होंने पिछली बार भी इलेक्शन डिबेट में हिस्सा नहीं लिया था, जब कोविड की वजह से बहस टीवी की बजाए ऑनलाइन हो गई थी. 

टेलर एंड फ्रांसिस ऑनलाइन में इसे लेकर एक स्टडी छपी- डू प्रेसिडेंशियल डिबेट्स मैटर. ये अध्ययन मानता है कि बहस से उन मतदाताओं को फायदा होता है, जो राष्ट्रपति पद के दावेदारों के बारे में उतनी अच्छी तरह नहीं जानते. वे डिबेट देखकर उसपर और पढ़ते या बातचीत करते और फिर तय करते हैं कि वोट किसे करना चाहिए. साल 2000 से अगले 12 सालों के बीच हुई चुनावी बहस में पाया गया कि एक बड़े प्रतिशत ने अपना मतदान पहले से तय पार्टी की बजाए कहीं और किया. इसमें काफी हाथ प्रेसिडेंशियल डिबेट का रहा होगा. 

कब होगी प्रेसिडेंशियल डिबेट

अमेरिका में 16 सितंबर, 1 अक्टूबर और 9 अक्टूबर को डिबेट होने जा रही है. इसमें डेमोक्रेट्स की तरफ से जो बाइडन और रिपब्लिकन्स की ओर से डोनाल्ड ट्रंप उम्मीदवार हैं. टीवी पर इसका प्रसारण लगभग 90 मिनट तक होगा और ये एड-फ्री समय होगा ताकि लोग बिना रुकावट सर्वोच्च पद के उम्मीदवारों को सुन सकें. वाइस प्रेसिडेंशियल डिबेट 25 सितंबर को होगी. 

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मेकअप कराने से कर दिया था इनकार

साल 1960 में हुए जनरल इलेक्शन की बहस सबसे ज्यादा चर्चा में आई थी. इस दौरान रिपब्लिकन से रिचर्ड निक्सन, वहीं डेमोक्रेटिक पार्टी से जॉन कैनेडी थे. 70 मिलियन से ज्यादा लोगों ने इसे देखा था. निक्सन जब बहस के लिए आए तो बीमार दिख रहे थे. वे बीमार थे भी. कुछ ही समय पहले वे घुटनों की चोट के चलते अस्पताल में भर्ती रहकर लौटे थे.

बहस के लिए टीवी स्टेशन आते समय उन्हें दोबारा चोट लग गई लेकिन प्रोग्राम रद्द किए बिना वे स्टेज पर आ गए. निक्सन ने मेकअप करने से भी इनकार कर दिया. वहीं दूसरा पक्ष यानी कैनेडी अपने साथ मेकअप का टीमटाम लेकर आए. वे स्वस्थ दिख रहे थे, जबकि विपक्षी कैंडिडेट कमजोर. ये गेम चेंजर इवेंट रहा. लोग सेहतमंद उम्मीदवार की तरफ मुड़ गए. इसके बाद से माना जाने लगा कि राष्ट्रपति पद के लिए बहस बड़ी जरूरी है. उम्मीदवार पूरी तैयारी के साथ आने लगे.

कैसे होती है बहस

इसमें उम्मीदवारों के साथ एक मॉडरेटर होता है, जो टीवी प्रेजेंटर होता है. मॉडरेटर या सामने बैठे दर्शकों में से कोई एक सवाल कर सकता है. सवाल कौन करेगा, ये पहले तय हो जाता है. सिक्का टॉस करके तय करते हैं कि कौन पहले सवाल का जवाब देगा. सवाल पूछने के 2 मिनट के भीतर कैंडिडेट को जवाब देना होता है. अब ग्रीन और रेड लाइटें, बजर जैसी चीजें भी इस्तेमाल होने लगी हैं.

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