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क्या होती है जेलों की अंडा कोठरी, जिसमें सबसे खतरनाक कैदी रखे जाते हैं? पूर्व प्रोफेसर साईबाबा भी रहकर लौटे

दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा हाल में जेल से बरी हो गए. उन्हें नागपुर जेल की अंडा कोठरी में रखा गया था. ये बेहद खास सेल होती है, जिसे हाई-रिस्क कैदियों के लिए डिजाइन किया जाता है. प्रोफेसर साईबाबा की पत्नी एएस वसंता कुमारी ने कहा था कि अंडा सेल में रहने के कारण उनके पति के पास शब्द खत्म हो गए थे.

नक्सलियों से कथित संबंध के आरोप में जीएन साईबाबा जेल में रहे.  (photo- PTI) नक्सलियों से कथित संबंध के आरोप में जीएन साईबाबा जेल में रहे. (photo- PTI)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 12 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 5:23 PM IST

मार्च 2017 में महाराष्ट्र की एक अदालत ने प्रोफेसर जीएन साईबाबा समेत कईयों को कथित माओवादी रिश्तों और देश में आतंक फैलाने की गतिविधि में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया था. साईबाबा पहले से ही नागपुर सेंट्रल जेल में बंद थे. कुछ दिन पहले वे बाहर आए. इसके बाद से अंडा सेल की बात हो रही है. ये वो सेल है, जहां उन्हें रखा गया था. माना जाता है कि इसमें रहने के दौरान कैदी की मानसिक हालत बुरी तरह खराब हो सकती है. एक्टिविस्ट गौतम नवलखा को भी मुंबई की एग सेल में रखा गया था. 

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क्या होती है ये सेल

ये हाई-सिक्योरिटी कोठरी है, जिसका आकार अंडे की तरह होता है. देश की सेंट्रल जेलों में ये बंदोबस्त है. इस कोठरी को ऐसे तैयार किया जाता है कि खतरनाक कैदी या उन कैदियों पर नजर रखी जा सके, जिनके भागने से बड़ा नुकसान हो सकता हो. इसका शेप मॉनिटरिंग और पेट्रोलिंग में मदद करता है. 

इसमें दो लेयर पर सिक्योरिटी होती है- इनर और आउटर. इनर लेयर पर कोठरी अंदर की तरफ खुलती है. इसमें एक खुली जगह होती है, जहां कैदी तय समय पर बाहर जाकर घूम-फिर सकते हैं. हर कैदी के लिए बाहर जाने का समय अलग-अलग होता है ताकि उनकी कम से कम बात हो सके. 

सिक्योरिटी बाकियों से कहीं ज्यादा

जेल में वैसे तो तगड़ी सुरक्षा होती है, लेकिन एग सेल के लिए बाकियों से ज्यादा प्रिजन ऑफिसर और स्टाफ तैनात रहते हैं. हर स्टाफ को अंदर आते, और बाहर जाते हुए साइन करना होता है, चाहे वो कितना ही पुराना क्यों न हो. एग सेल छोटी से लेकर बड़ी हो सकती है, जो इसपर निर्भर करता है कि एक सेल में कितने कैदियों को रखा जा रहा है. 

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आइसोलेट सेल नहीं है ये

अंडा सेल के बारे में कहा जाता है कि यहां कैदी को ऐसा एकांतवास मिलता है कि वो बाहर की दुनिया से पूरी तरह कट जाए. इसके बाद उसकी मानसिक हालत खराब होती चली जाती है. यहां तक कि वो खुदकुशी की सोचने लगता है. हालांकि एग सेल का मतलब सॉलिटरी कनफाइनमेंट नहीं है. ये सच है कि ये कोठरियां जेल की सबसे अलग-थलग चीज हैं. इसमें रहने वाली कैदी, बाकी कैदियों से कम घुलमिल पाते हैं. 

रोशनी बहुत कम रहती है

अंडा सेल की सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात ये है कि इसमें केवल दो खिड़कियां होती हैं, वो भी लोहे की मोटी सलाखों से घिरी हुई. ऐसे में सनलाइट इतनी कम आती है कि दिन में भी रात जैसा अंधेरा लगे. वहीं आइसोलेशन सेल यानी वो कोठरी, जहां कैदी को एकदम अकेला रखा जाता है, वो ऊपर से खुली होती है ताकि सनलाइट अच्छी तरह आ सके. 

अंडा सेल बाकी बैरकों से कैसे अलग

इसमें टॉयलेट और बाथरूम जुड़ा होता है. कैदी दूसरे कैदियों से बात करना, लाइब्रेरी या कैंटीन जाना नहीं कर सकते. न ही उन्हें कॉमन आंगन या गलियारे में घूमने की इजाजत होती है. खाना और किताबें उन्हें अपनी कोठरी के भीतर ही मिलती हैं. वे बस अपने सेल या सामने रखे हुए कैदियों से ही बात कर सकते हैं. अगर उस वक्त वहां दूसरा कोई कैदी मौजूद नहीं, तो वे लगभग अकेले ही रहते हैं. 

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किन्हें रखा जाता है इस सेल में

इसमें केवल बहुत खतरनाक और वही लोग रखे जाते हैं, जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा माने जाते हैं. जैसे आतंकवादी, नक्सल लीडर, गैंगस्टर और माफिया. इन लोगों को ट्रायल के दौरान भी यहां रखा जाता है. इसके पीछे यही वजह है कि आम कैदियों के साथ रहने पर ये उनका भी ब्रेनवॉश कर सकते हैं, या भागने का रास्ता निकाल सकते हैं. आतंकवादी अजमल कसाब को भी यरवदा की एग सेल में ही रखा गया था. वो अकेला ही रखा गया था. 

कब आया ओवल-शेप्ड सेल का विचार

अंडा सेल का कंसेप्ट भारत में जनरल अरुण वैद्य की हत्या के बाद आया. साल 1886 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के कमांडिग अधिकारी रहे वैद्य की पुणे में हत्या कर दी गई. हत्यारे हत्यारों सुखदेव सिंह सूखा और हरजिंदर सिंह जिंदा को आम कैदियों के साथ रखना खतरनाक था, साथ ही उन्हें ऐसी जगह रखा जाना था, जहां पर पूरे समय नजर रखी जा सके. तभी महाराष्ट्र में अंडा सेल के बारे में सोचा गया. पहली सेल नासिक रोड और दूसरी पुणे जेल में बनी. बाद में सेंट्रल जेलों में ये कंसेप्ट कॉपी किया गया.

वैसे महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में ब्रिटिश काल में ही ओवल-शेप सेल बनई गई थी, जिसका मकसद कैदियों को परेशान करना था. 

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कौन फैसला करता है कि यहां किसे रखा जाए

ये तय करने का अधिकार उस पर्टिकुलर जेल के सुपरिंटेंडेंट के पास होता है. ऐसे कैदियों को भी यहां डाला जा सकता है, जो लिंचिंग या दूसरे कैदियों से मारपीट करते रहे हों.

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