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UCC से पहले असम में बहुविवाह पर लगेगी रोक! जानें- एक से ज्यादा शादियों पर राज्य में क्यों है बवाल?

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने ऐलान किया है कि सरकार बहुविवाह पर रोक लगाने के लिए जल्द ही विधानसभा में बिल लेकर आएगी. उन्होंने दावा किया कि पैगम्बर भी बहुविवाह का समर्थन हीं करते थे. ऐसे में जानते हैं कि असम में बहुविवाह पर बवाल क्यों है? और एक से ज्यादा शादियां करने पर कानून क्या कहता है?

असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने बहुविवाह पर रोक लगाने की बात कही है. (फाइल फोटो) असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने बहुविवाह पर रोक लगाने की बात कही है. (फाइल फोटो)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 14 जुलाई 2023,
  • अपडेटेड 7:02 PM IST

एक ओर समान नागरिक संहिता पर बहस चल रही है तो दूसरी ओर असम सरकार बहुविवाह पर रोक लगाने की तैयारी कर रही है. 

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने ऐलान किया है कि बहुविवाह रोकने के लिए सरकार अगले विधानसभा सत्र में बिल लेकर आएगी. उन्होंने ये भी कहा कि अगर अगले सत्र में किसी कारण से बिल नहीं आ पाता है तो जनवरी में बिल लाया जाएगा.

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सीएम सरमा ने दावा करते हुए कहा, यहां तक कि पैगम्बर भी बहुविवाह का समर्थन नहीं करते थे. क्योंकि उनका मानना था कि मुस्लिम पुरुष की एक ही पत्नी होनी चाहिए. 

उन्होंने कांग्रेस को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि कांग्रेस को बहुविवाह का समर्थन नहीं करना चाहिए. उसे मुस्लिम महिलाओं के साथ खड़ा होना चाहिए, भले ही कुछ वोटों का नुकसान हो जाए.

बहुविवाह रोकने के लिए कानून बनाने के लिए असम सरकार ने एक कमेटी बनाई थी. अगर कमेटी अपनी रिपोर्ट सितंबर से पहले दे देती है, तो फिर इसके लिए अगले विधानसभा सत्र में ही बिल लाया जाएगा. लेकिन रिपोर्ट लेट होती है तो फिर जनवरी में बिल पेश किया जाएगा.

ये पहली बार नहीं है, जब मुख्यमंत्री सरमा ने बहुविवाह पर रोक लगाने के लिए कानून लाने की बात कही है. इससे पहले मई में उन्होंने कहा था कि ये प्रतिबंध किसी खास समुदाय के लिए नहीं होगा, बल्कि पूरी बहुविवाह प्रथा के खिलाफ लगाया जाएगा. 

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असम में बहुविवाह पर बवाल क्यों?

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मुताबिक, बराक घाटी के तीन जिलों और होजई और जमुनामुख के इलाकों में बहुविवाह प्रचलित हैं. हालांकि, शिक्षित वर्ग में इसकी दर बहुत कम है और स्थानीय मुस्लिम आबादी के बीच भी ये इतनी मौजूद नहीं है.

सरमा का दावा है कि बहुविवाह इस्लामी कानून का जरूरी हिस्सा नहीं है और यहां तक कि पैगम्बर मोहम्मद ने भी एकविवाह को प्राथमिकता दी है. 

उन्होंने बताया था कि बाल विवाह के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशन में सामने आया कि बहुत से बुजुर्गों ने कई शादियां की थीं और उनकी पत्नियां ज्यादातर युवा लड़कियां थीं जो समाज के गरीब तबके से आती हैं.

उन्होंने कहा कि राज्य में आज भी कई आदिवासी समुदायों में बहुविवाह का प्रचलन है. हालांकि, अब ये समुदाय की बजाय व्यक्तिगत हो सकता है. उन्होंने कहा, ऐसे भी कई मामले हैं जहां पुरुषों की पहली पत्नी है और चूंकि बहुविवाह पर रोक है, इसलिए वो बगैर शादी किए दूसरी महिलाओं के साथ रहते हैं. 

असम में बहुविवाह पर क्या कहते हैं आंकड़े?

मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेस (IIPS) की अप्रैल में एक स्टडी आई थी. ये स्टडी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई थी. 

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इस स्टडी में बताया गया था कि रोक के बावजूद भारत में बहुविवाह की प्रथा आज भी प्रचलित है और ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुस्लिमों में, बल्कि हिंदू और दूसरे धर्मों में भी बहुविवाह अभी भी हो रहा है.

इसके आंकड़ों के मुताबिक, बाकी राज्यों की तुलना में पूर्वोत्तर भारत में बहुविवाह आम है. अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा में बहुविवाह सबसे ज्यादा है. इनमें भी बहुविवाह की दर मणिपुर में सबसे ज्यादा है. 

NFHS-5 के सर्वे के दौरान मणिपुर की 6 फीसदी से ज्यादा महिलाओं ने बताया कि उनके पति ने एक से ज्यादा शादी की है. मिजोरम में ये दर 4.1%, सिक्किम में 3.9%, अरुणाचल प्रदेश में 3.7% है. असम में ये दर 2.4% है. 

भारत को लेकर क्या कहते हैं आकड़े?

1961 में हुई जनगणना में बहुविवाह को लेकर भी आंकड़े जारी किए गए थे. उसके मुताबिक, मुसलमानों में बहुविवाह का प्रतिशत 5.7% था, जो बाकी समुदायों की तुलना में कम था. हिंदुओं में ये दर 5.8%, बौद्ध में 7.9%, जैन में 6.7% और आदिवासियों में 15.25% थी.

उसके बाद हुई जनगणना में बहुविवाह पर आंकड़े नहीं जुटाए गए. हालांकि, उसके बाद नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में जो आंकड़े सामने आए, उससे पता चलता है कि बहुविवाह के मामलों में कमी जरूर आई है, लेकिन ये अभी खत्म नहीं हुआ है.

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भारत में इस्लाम को छोड़कर बाकी सभी धर्मों में बहुविवाह पर रोक है. मुस्लिम पुरुष चाहें तो चार पत्नियां रख सकते हैं. एनएफएचएस-5 के आंकड़ों के मुताबिक, 1.9% मुस्लिम महिलाओं ने माना है कि उनके पति की और भी पत्नी या पत्नियां हैं. वहीं, 1.3% हिंदू और दूसरे धर्मों की 1.6% महिलाओं ने अपने पति की दूसरी पत्नी या पत्नियां होने की बात मानी है.

बहुविवाह पर क्या है कानून?

भारत में बहुविवाह पर पूरी तरह रोक है. इस्लाम को छोड़कर बाकी सभी धर्मों में दूसरी शादी करने की मनाही है. 

1955 के हिंदू मैरिज एक्ट के तहत पति या पत्नी के जीवित रहते या बगैर तलाक लिए दूसरी शादी करना अपराध है. इस कानून की धारा 17 के तहत, अगर कोई भी पति या पत्नी के जीवित रहते या बिना तलाक लिए दूसरी शादी करता है तो उसे सात साल की जेल हो सकती है. सजा का ये प्रावधान आईपीसी की धारा 494 में किया गया है. हिंदू मैरिज एक्ट हिंदुओं के अलावा सिख, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों पर भी लागू होता है.

यही प्रावधान स्पेशल मैरिज एक्ट में भी है. स्पेशल मैरिज एक्ट दो अलग-अलग धर्मों के वयस्कों को शादी करने का अधिकार देता है. स्पेशल मैरिज एक्ट में भी पति या पत्नी के जीवित रहते या तलाक लिए बगैर दूसरी शादी करना अपराध है और ऐसा करने पर सात साल तक की सजा हो सकती है.

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तीन शर्तों में ही हो सकती है दूसरी शादी

- पहली शर्तः पति या पत्नी, दोनों में से किसी एक की मौत हो चुकी हो.

- दूसरी शर्तः पति या पत्नी में से किसी एक का 7 साल तक कुछ अता-पता न हो या फिर उसके जीवित रहने का कोई सबूत न हो.

- तीसरी शर्तः अगर अदालत ने पहली शादी अमान्य घोषित कर दी हो, यानी तलाक हो चुका हो.

ईसाइयों में क्या है कानून?

ईसाई धर्म को मानने वालों की शादी क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872 के अंतर्गत आती हैं. हिंदू मैरिज एक्ट की तरह ही इसमें भी ईसाइयों के दूसरी शादी करने की मनाही है. 

ईसाई धर्म को मानने वाले दूसरी शादी तभी कर सकते हैं, जब दोनों में से किसी एक के पार्टनर की या तो मौत हो चुकी हो या फिर तलाक हो चुका है. 

मुस्लिमों में क्या है कानून?

मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ है. मुस्लिमों में चार शादी यानी निकाह करने की इजाजत है, लेकिन सिर्फ पुरुषों को. पांचवां निकाह तभी वैध माना जाता है जब चार में से किसी एक पत्नी से तलाक हो चुका हो या किसी एक पत्नी की मौत हो चुकी हो.

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर मुस्लिम पुरुष दूसरी शादी करते हैं तो क्या उन्हें कोई सजा नहीं हो सकती. ऐसे मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में दूसरी शादी को 'क्रूरता' माना है. और ऐसी क्रूरता के लिए आईपीसी की धारा 498(A) के तहत 7 साल की सजा हो सकती है.

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