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शवों पर किस तरह का लेप लगाकर उन्हें सुरक्षित किया जाता है, क्यों हो रहा बालासोर रेल हादसे में इसका जिक्र?

उड़ीसा के बालासोर ट्रेन हादसे को एक सप्ताह हो चुका. दुर्घटना का शिकार हुए बहुत से शव अब भी लावारिस हैं. गर्मी में ये खराब न हो जाएं, इसके लिए शवों की एम्बामिंग की बात हो रही है. शव-लेपन की इस प्रोसेस में शरीर पर खास केमिकल लगाया जाता है. इससे शरीर के डिकंपोज होने की रफ्तार धीमी पड़ जाती है और वो लंबे समय तक संरक्षित रहता है.

एनाटॉमी के एक्सपर्ट शव-लेपन करते हैं. सांकेतिक फोटो (Getty Images) एनाटॉमी के एक्सपर्ट शव-लेपन करते हैं. सांकेतिक फोटो (Getty Images)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 09 जून 2023,
  • अपडेटेड 4:29 PM IST

सालों-साल बीतने के बाद भी शव खराब हों, इसके लिए खास तकनीक अपनाई जाती है. इसे ही एम्बामिंग कहते हैं. एनॉटॉमी के एक्सपर्ट इसमें शरीर पर एक लेप कर देते हैं ताकि डिकंपोजिशन यानी शव के सड़ने की प्रोसेस धीमी पड़ जाए. लेपन से पहले शरीर को अच्छी तरह से साफ करते हैं. इसके बाद उससे सारा फ्लूइड निकाल लिया जाता है, और फिर उसी नस के सहारे एम्बामिंग फ्लूइड भरा जाता है. आमतौर पर ये फार्मेलिन नाम का केमिकल होता है. आर्टरीज में पहुंचकर ये शरीर के ऊतकों को संरक्षित कर देता है. 

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कितने वक्त तक टिक जाता है शरीर

लेपन के बाद रखा हुआ शरीर कुछ हफ्तों से लेकर सालों तक या कई दशकों तक भी चलता है. ये इस बात पर टिका होता है कि वो किस तापमान पर रखा हुआ है. कम तापमान पर और धूल-मिट्टी या किसी भी तरह के बाहरी संपर्क से बचा हुआ शव काफी समय तक चलता है. जो देश अपने लीडरों के शव सुरक्षित रखते हैं, वे हर साल इस प्रोसेस को दोहराते हैं ताकि लेपन कमजोर न पड़े.

कब करते हैं शव-लेपन

दुनिया से लेकर देश के अलग-अलग राज्य भी अक्सर इस प्रोसेस को अपनाते हैं. जब कोई मृत शरीर काफी लंबी दूरी तक ले जाया जाना हो, जैसे इंटरनेशनल बॉर्डर पार करना हो तो एम्बाल्मिंग होती है. अगर मौत और उसकी अंतिम क्रिया के बीच हफ्तेभर या उससे ज्यादा समय का फर्क हो, तब भी लेप करके शव रखा जाता है. चूंकि ट्रेन हादसे में बहुत से शवों की पहचान नहीं हो पा रही है, इसलिए राज्य की सरकार एम्बामिंग के बारे में सोच रही है. 

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बालासोर रेल हादसे में बहुत से शव अब भी लावारिस पड़े हुए हैं. सांकेतिक फोटो (AFP)

कितने समय बाद डिकंपोज होने लगती है बॉडी

ये चरण दर चरण होने वाली प्रक्रिया है. सबसे पहले शरीर के अहम अंग काम करना शुरू करते हैं, जिसके बाद देह ठंडी पड़ने लगती है. मृत घोषित होने के एक से दो घंटे के भीतर शरीर अकड़ने लगता है. 24 घंटों के भीतर ऊतक टूटने लगते हैं और बैक्टीरिया शरीर को सड़ाने लगते हैं, यही डिकंपोजिशन है. ये प्रोसेस दो हफ्तों से लेकर लगभग महीनेभर तक चलती है. इसके बाद शरीर का सारा फ्लूइड खत्म हो जाता है. 

कम्युनिस्ट देशों में चलन

बड़े राजनेताओं और शख्सियतों के मृत शरीर को सुरक्षित रखना भी बड़ा काम है, जो कम्युनिस्ट देशों में खूब होता है. रूस के मॉस्को में लेनिन लैब इसकी एक्सपर्ट कहलाती है. इसने साल 1924 में व्लादिमीर लेनिन के शव पर लेप लगाकर उसे डिसप्ले में रखा था. बाद में उत्तर कोरिया ने भी इस लैब की मदद ली ताकि किम जोंग के दादा और पिता के शव सुरक्षित रखे जा सकें. वियतमान में भी वहां के राष्ट्रपति हो चि मिन्ह का शव म्यूजियम में संरक्षित है. 

बॉडी एम्बामिंग की प्रक्रिया हजारों साल से हो रही है. सांकेतिक फोटो (Reuters)

इन सॉल्यूशन्स में रखा जाता है

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हर साल तय समय पर इन शवों को निकालकर साफ करके लेपन किया जाता है. इसके तहत शव को ग्लीसरॉल सॉल्यूशन में डाला जाता है. इसके बाद पोटेशयम एसिटेट, अल्कोहल, हाइड्रोडन परॉक्साइड, एसेटिक एसिड और एसेटिक सोडियम के अलग-अलग सॉल्यूशन्स में थोड़ी-थोड़ी देर के लिए रखते हैं. 

शव का ऐसे रखा जाता है ध्यान

इस दौरान शव के जो हिस्से खराब हो चुके हों, उन्हें हटा दिया जाता है और ऑर्टिफिशयल अंग जोड़े जाते हैं. जैसे इतने दशकों पहले खत्म हो चुके इन नेताओं के भी त्वचा से लेकर बहुत कुछ ऑर्टिफिशयल है. लेनिन की पलकें भी नकली लगाई गई हैं. ज्यादा उम्र की लाश एकदम से युवा न लगने लगे, इसका भी खास ध्यान रखा जाता है. कुल मिलाकर, ये सबकुछ इस तरह से होता है कि लीडर जितनी उम्र में खत्म हुआ हो, उसका शव भी बिल्कुल वैसा ही लगे. 

करोड़ों रुपए का खर्च आता है

बहुत सारी पाबंदियों से घिरा नॉर्थ कोरिया अपने लीडरों के शव संभालने पर कितने पैसे खर्च करता है, ये जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे. इसकी असल कीमत का अंदाजा लोगों को साल 2016 में हुआ, जब रूस ने अपने लीडर लेनिन की एम्बाल्मिंग पर 1 करोड़ 51 लाख रुपए से ज्यादा खर्च करने की बात की थी. ये एक साल का खर्च था. ऐसे में दूसरे देश जाकर वहां के नेता का शरीर संरक्षित करने पर जाहिर है कि इससे कहीं ज्यादा चार्ज लिया जाता होगा. 

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