
भारत में बच्चों के लिए कैंसर जानलेवा बनता जा रहा है. हायर इनकम वाले देशों की तुलना में भारत में कैंसर से जूझ रहे बच्चों का बच पाना बहुत मुश्किल होता है. यानी, भारत में कैंसर से जूझ रहे बच्चों का सर्वाइवल रेट हायर इनकम देशों के मुकाबले काफी कम है.
ये जानकारी नेशनल सेंटर फॉर डिसीज इन्फोर्मेटिक्स एंड रिसर्च (NCDIR) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की स्टडी में सामने आई है. NCDIR इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के अधीन काम करता है. बच्चों के कैंसर पर ये इस तरह की पहली स्टडी है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, बच्चों में कैंसर एक बड़ी समस्या है. हर साल 19 साल तक के 4 लाख बच्चे कैंसर की चपेट में आ जाते हैं. बच्चों में ल्यूकेमिया, ब्रेन कैंसर, लिम्फोमस और सॉलिड ट्यूमर जैसे कैंसर आम हैं.
NCDIR और WHO की स्टडी बताती है कि भारत में कैंसर से जूझ रहे बच्चों का सर्वाइवल रेट बहुत कम है. जबकि कैंसर से जूझ रहे 80 फीसदी बच्चों को ठीक किया जा सकता है. लेकिन भारत में ऐसा नहीं है. स्टडी बताती है कि भारत में समय पर इलाज न मिलने, थैरेपी नहीं होने और अच्छे डॉक्टर-नर्स की कमी होने की वजह से बच्चों को बचाया नहीं जा सक रहा है.
कैंसर के जितने मरीज, उनमें से 4% बच्चे
इस स्टडी में नेशनल कैंसर रजिस्ट्री रिपोर्ट 2021 के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि 2012 से 2019 के बीच देशभर में कैंसर के जितने मामले सामने आए थे, उनमें से 4% मामले बच्चों में थे.
नेशनल कैंसर रजिस्ट्री रिपोर्ट के मुताबिक, 2012 से 2019 के बीच देशभर में कैंसर के 6.10 लाख से ज्यादा मामले सामने आए थे. कैंसर के मरीजों में 3.19 लाख पुरुष और 2.90 लाख महिलाएं थीं. इनमें से 24,268 बच्चे थे, जिनकी उम्र 14 साल से कम थी. इनमें 15,549 लड़के और 8,719 लड़कियां थीं. रिपोर्ट के मुताबिक, 11 हजार 300 से ज्यादा बच्चे ल्यूकेमिया से जूझ रहे थे.
NCDIR के डायरेक्टर डॉक्टर प्रशांत माथुर का कहना है कि भारत में कैंसर से जूझ रहे बच्चों का सर्वाइवल रेट 40% है. जबकि WHO के मुताबिक, हायर इनकम वाले देशों में सर्वाइवल रेट 80% से ज्यादा है. लिहाजा, भारत में सर्वाइवल रेट हायर इनकम वाले देशों की तुलना में लगभग आधा है. डॉ. माथुर का ये भी कहना है कि भारत में कैंसर से जूझ 49% बच्चों का इलाज ही नहीं हो पाता है.
ये स्टडी 26 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में की गई थी. इसे 'सिचुएशन एनालिसिस ऑफ चाइल्डहुड कैंसर केयर सर्विस इन इंडिया 2022' के नाम से जारी किया गया है.
बच्चों में कैंसर कितना खतरनाक?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, हर साल 4 लाख बच्चे कैंसर की चपेट में आ जाते हैं. हाई इनकम वाले देशों में कैंसर से बच्चों का सर्वाइवल रेट 80 फीसदी से ज्यादा है, जबकि लो और मिडिल इनकम वाले देशों में 30 फीसदी से भी कम है.
बच्चों में कैंसर सिर्फ स्क्रीनिंग से पकड़ में नहीं आता है. कैंसर से जूझ रहे ज्यादातर बच्चों का इलाज जेनेरिक दवाओं और रेडियोथैरेपी या सर्जरी से ठीक हुआ जा सकता है.
WHO का कहना है कि लो और मिडिल इनकम देशों में न तो कैंसर की दवाओं की पहुंच है और न ही इलाज समय पर मिल पाता है, इस कारण यहां मौतें ज्यादा होती हैं.
बच्चों में कैंसर के कारण क्या?
कैंसर एक ऐसी बीमारी है जो किसी भी उम्र में हो सकती है और शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है. ये कोशिकाओं में जेनेटिक चेंज से शुरू होती है और फिर ट्यूमर का रूप ले लेती है. अगर समय पर सही इलाज न हो तो इससे मौत भी हो सकती है.
WHO के मुताबिक, वयस्कों के मुकाबले बच्चों में कैंसर के कारणों का पता लगाना बहुत मुश्किल है. कुछ कैंसर पर्यावरण या लाइफस्टाइल की वजह से होते हैं, लेकिन अभी भी कैंसर के कारणों का पता लगाने की कोशिश की जा रही है.
WHO का कहना है कि कुछ पुराने संक्रमण जैसे HIV या मलेरिया भी बच्चों में कैंसर के कारण हो सकते हैं. इसलिए बच्चों का वैक्सीनेशन बहुत जरूरी है. जैसे- हेपेटाइटिस बी की वैक्सीन लिवर कैंसर और ह्यूमन पेपिलोमावायरस की वैक्सीन सर्वाइकल कैंसर से बचा सकती है.
क्या है इसका इलाज?
कैंसर का जितनी जल्दी पता लगता है और जितना जल्दी इलाज शुरू होता है, सर्वाइवल रेट उतना ही ज्यादा होता है. कैंसर का इलाज जल्दी शुरू करने से बच्चों की जान बचाई जा सकती है.
कैंसर से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए एक सही डायग्नोसिस जरूरी है, क्योंकि हर कैंसर का इलाज अलग होता है. इसमें सर्जरी, रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी शामिल है.
कोई बच्चा जब कैंसर की चपेट में आता है तो उसमें कई सारे लक्षण दिखते हैं. जैसे- तेज बुखार, तेज सिरदर्द, हड्डियों में दर्द और वजन का कम होना.
सही समय पर इलाज शुरू करने से न सिर्फ बच्चों की जान बचाई जा सकती है, बल्कि ये कम खर्चीला भी होता है और इसकी थैरेपी में दर्द भी कम होता है.