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अफसरों का ट्रांसफर, बिजली बिल का बकाया... आंध्र-तेलंगाना के बीच 10 साल बाद भी क्यों अनसुलझे हैं ये मुद्दे?

जून 2014 में हुए बंटवारे के 10 साल भी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच कई मुद्दे अनसुलझे हैं. इन मुद्दों को सुलझाने के लिए हाल ही में आंध्र के सीएम चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने मुलाकात की है. दोनों के बीच मुद्दों को सुलझाने के लिए समितियां बनाने पर भी सहमति बनी है.

चंद्रबाबू नायडू और रेवंत रेड्डी (फाइल फोटो-PTI) चंद्रबाबू नायडू और रेवंत रेड्डी (फाइल फोटो-PTI)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 09 जुलाई 2024,
  • अपडेटेड 11:47 AM IST

बंटवारे के दस साल बाद भी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जो अब तक अनसुलझे हैं. अब इन मुद्दों को सुलझाने के लिए मंत्रियों और अधिकारियों की समिति बनाई जाएगी, जो इन अनसुलझे मुद्दों का समाधान निकालेगी.

हाल ही में, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी के बीच मुलाकात हुई थी. इस बैठक में दोनों ही राज्यों के मुख्यमंत्री मुद्दों को सुलझाने के लिए समितियां बनाने पर सहमत हो गए हैं.

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तेलंगाना के डिप्टी सीएम मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने बताया कि दोनों राज्यों के सीनियर अफसरों की एक समिति बनेगी, जिसमें दोनों राज्यों के तीन-तीन अफसर शामिल होंगे. ये समिति मुद्दों का समाधान ढूंढने की कोशिश करेगी. उन्होंने बताया कि जिन मुद्दों का हल अफसरों की समिति नहीं निकाल पाएगी, उसके लिए मंत्रियों का पैनल बनाया जाएगा.

विक्रमार्क ने बताया कि इसके बाद भी अगर किसी मुद्दे का हल नहीं निकलता है तो फिर मुख्यमंत्री स्तर पर उसे सुलझाने की कोशिश की जाएगी.

क्या-क्या हैं विवाद?

आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद 2 जून 2014 को तेलंगाना अस्तित्व में आया था. अलग होने के दस साल बाद भी दोनों राज्यों के बीच कई मुद्दों को लेकर सहमति नहीं बन सकी है.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच अब भी संपत्तियों का बंटवारा, राज्य सरकारों के संस्थान, बिजली बिल बकाया, कर्मचारियों का उनके मूल राज्य में ट्रांसफर करने जैसे मुद्दे अनसुलझे हैं.

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न्यूज एजेंसी पीटीआई ने आधिकारिक सूत्रों के हवाले से बताया है कि आंध्र प्रदेश पुनर्गठन कानून की 9वीं और 10वीं अनुसूची में लिखित इंस्टीट्यूशन और कॉर्पोरेशन का बंटवारा पूरा नहीं हुआ है, क्योंकि अब तक दोनों राज्यों के बीच इसे लेकर एक राय नहीं बन सकी है.

यह भी पढ़ें: आंध्र प्रदेश से 10 साल बाद क्यों छिनी राजधानी हैदराबाद? जानें- जगन मोहन रेड्डी का 'थ्री कैपिटल फॉर्मूला' कैसे हुआ फेल

क्या-क्या होना है बंटवारा?

- आंध्र प्रदेश पुनर्गठन कानून की 9वीं अनुसूची में 89 सरकारी कंपनियां और कॉर्पोरेशन हैं, जिनका बंटवारा होना है. इनमें आंध्र प्रदेश राज्य बीज विकास निगम, आंध्र प्रदेश राज्य कृषि औद्योगिक विकास निगम जैसे कॉर्पोरेशन शामिल हैं.

- वहीं, कानून की 10वीं अनुसूची में आंध्र प्रदेश राज्य वक्फ बोर्ड, तेलुगू यूनिवर्सिटी, द्रविडियन यूनिवर्सिटी, संस्कृत अकादमी, हिंदी अकादमी, आंध्र प्रदेश पुलिस अकादमी जैसे 107 इंस्टीट्यूशन और ट्रेनिंग सेंटर हैं, जिनका बंटवारा होना है.

- दोनों राज्यों के बीच बिजली बिल का बकाया भी बड़ा मुद्दा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेलंगाना पर आंध्र प्रदेश का 7 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि तेलंगाना की ओर से बकाया नहीं चुकाने के कारण आंध्र प्रदेश पर बोझ बढ़ रहा है. हर साल आंध्र प्रदेश सरकार बिजली पैदा करने के लिए बैंकों को 11% ब्याज चुकाती है.

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- सरकारी कर्मचारियों के ट्रांसफर का मुद्दे का भी अब तक कोई समाधान नहीं निकला है. पिछले महीने तेलंगाना के डिप्टी सीएम मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने बताया था कि सरकार ने तेलंगाना के 144 कर्मचारियों को वापस उनके मूल राज्य में ट्रांसफर करने का आग्रह किया है. ये कर्मचारी बंटवारे के बाद से आंध्र प्रदेश में काम कर रहे हैं.

- दोनों के बीच राज्य सड़क परिवहन निगम की संपत्ति को लेकर भी असहमति है. आंध्र प्रदेश सरकार ने हैदराबाद में स्थित सड़क परिवहन निगम की संपत्तियों में हिस्सेदारी मांगी थी, लेकिन तेलंगाना ने इससे इनकार कर दिया था. तेलंगाना को लगता है कि शीला भिड़े पैनल ने 'हेडक्वॉर्टर' की जो परिभाषा बताई थी, उस हिसाब से संपत्तियां उसकी है.

क्या आंध्र के साथ नाइंसाफी हुई?

आंध्र प्रदेश सरकार दावा करती है कि राज्य का बंटवारा करके उसके साथ नाइंसाफी की गई. आंध्र सरकार दावा करती है कि पुनर्गठन कानून का ड्राफ्ट मिलिट्री एयरक्राफ्ट के जरिए विधानसभा भेजा गया था और जल्दबाजी में पास कराया गया. दावा ये भी है कि संसद की लाइव टेलीकास्टिंग रोककर और आंध्र के सांसदों को निलंबित कर ये बिल पास किया गया.

आंध्र सरकार दावा करती है कि पुनर्गठन प्रक्रिया में पारदर्शिता भी नहीं रखी गई और तत्कालीन यूपीए सरकार ने जिस तेजी से ये बिल पास कराया, उससे आंध्र के लोगों में भी निराशा है. राज्य सरकार बंटवारे की प्रक्रिया को असंवैधानिक और तर्कहीन बताती है.

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राज्य सरकार का दावा है कि इस बंटवारे ने आंध्र प्रदेश पर वित्तीय बोझ बढ़ा दिया. आंध्र में 58% आबादी होने के बावजूद रेवेन्यू का 48% हिस्सा ही दिया गया. संपत्तियों का बंटवारा लोकेशन तो देनदारियों का बंटवारा आबादी के आधार पर किया गया. राज्य की लगभग सभी संपत्तियां हैदराबाद में थीं, क्योंकि ये छह दशकों तक राजधानी रही, जो तेलंगाना को मिल गई, जबकि ज्यादातर देनदारियां आंध्र पर डाल दी गईं.

आंध्र ये भी दावा करता है कि एक लाख 30 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की देनदारी आंध्र पर डाल दी गई. इसके अलावा 24 हजार करोड़ रुपये का कर्ज भी आंध्र पर डाल दिया गया.

आंध्र सरकार दावा करती है कि सिंगरेनी कोलियरिज कंपनी हैदराबाद में है, इसलिए तेलंगाना सरकार को इसमें 51% की हिस्सेदारी दी गई. जबकि, इसकी सब्सिडियरी कंपनी आंध्र प्रदेश हेवी मशीनरी एंड इंजीनियरिंग आंध्र में होने के बावजूद इसमें उसे हिस्सेदारी नहीं मिली. सिंगरेनी कोलियरिज कोल माइनिंग कंपनी है.

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कुछ ऐसे बना था तेलंगाना

आंध्र प्रदेश से अलग तेलंगाना बनाने की मांग लंबे समय से हो रही थी. तेलंगाना आंदोलन की शुरुआत 1970 के दशक से ही शुरू हो गई थी. कई हिंसक आंदोलन भी हुए, जिनमें कइयों की मौत भी हुई.

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2004 और 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस ने तेलंगाना बनाने का वादा किया था. लेकिन 2009 का चुनाव जीतने के बाद भी जब यूपीए सरकार ने तेलंगाना को लेकर कुछ खास नहीं किया तो चंद्रशेखर राव अनशन पर बैठ गए. 11 दिन तक चले अनशन के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार ने ऐलान किया कि वो तेलंगाना बनाने की प्रक्रिया शुरू कर रही है.

2013 आते-आते तेलंगाना को लेकर बवाल बढ़ता गया. तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी के कई विधायक-सांसदों ने इस्तीफा दे दिया. आंध्र में भी कांग्रेस को लेकर नाराजगी थी, क्योंकि यहां के कांग्रेसी नेता राज्य का बंटवारा नहीं चाहते थे.

2013 में ही यूपीए सरकार राज्य का बंटवारा करने के लिए आंध्र प्रदेश पुनर्गठन बिल लेकर आई, लेकिन ये आंध्र विधानसभा में गिर गया. कुछ महीनों बाद इस बिल को कुछ संशोधन के साथ लाया गया. फरवरी 2014 में लोकसभा में ये बिल पास हुआ. इस दौरान लोकसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण नहीं किया गया. लोकसभा से पास होने के दो दिन बाद ही ये बिल राज्यसभा से पास हो गया. मार्च 2014 में इस बिल पर राष्ट्रपति ने दस्तखत कर दिए. आखिरकार 2 जून 2014 को आंध्र से अलग होकर तेलंगाना बना.

मुद्दे सुलझाने के लिए दोनों राज्यों ने क्या किया?

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पिछले 10 साल में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अनसुलझे मुद्दों को सुलझाने के लिए बातचीत की है. 2020 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन सीएम वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने तेलंगाना के सीएम के. चंद्रशेखर राव से मुलाकात की थी.

इससे पहले 2014 से 2019 के बीच आंध्र के मुख्यमंत्री रहे चंद्रबाबू नायडू ने भी केसीआर से मुलाकात की थी. केसीआर तब आंध्र की नई राजधानी अमरावती के शिलान्यास कार्यक्रम में भी शामिल हुए थे.

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