
तीन दिन के दौरे पर अमेरिका पहुंचे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भारत में रोजगार की समस्या पर बड़ा बयान दिया है. उन्होंने चीन से तुलना करते हुए कहा कि भारत ने प्रोडक्शन पर ध्यान नहीं दिया, इसलिए यहां बेरोजगारी की समस्या है.
राहुल गांधी ने कहा, 'चीन ने अपने देश में प्रोडक्शन पर ध्यान दिया है. इसलिए वहां रोजगार की समस्या नहीं है. भारत में ज्यादातर चीजें 'मेड इन चाइना' है. चीन की यही नीति उसे रोजगार देने में सफल बनाती है.'
उन्होंने मैनुफैक्चरिंग सेक्टर पर भी बात रखी. राहुल ने कहा, 'सिर्फ एक या दो लोगों को सारे पोर्ट्स और डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स सौंपे जा रहे हैं, जिसकी वजह से भारत में मैनुफैक्चरिंग सेक्टर की हालत खराब है.'
राहुल के बयान से इतर अगर भारत का मैनुफैक्चरिंग सेक्टर देखें तो पिछले कुछ सालों में ये काफी बढ़ा है. उम्मीद है कि 2030 तक भारत से 1 ट्रिलियन डॉलर का 'मेड इन इंडिया' सामान एक्सपोर्ट होगा. भारत की मैनुफैक्चरिंग इंडस्ट्री कितनी बड़ी है? कितने लोगों को इससे रोजगार मिलता है? और इसमें देश चीन को कैसे पछाड़ सकता है? आइये समझते हैं.
भारत और मैनुफैक्चरिंग
- आजादी से पहलेः ज्यादातर उत्पाद हाथ से बने होते थे. इन्हीं को दुनियाभर में बेचा जाता था. लकड़ी का कोयला जलाकर लोहा बनाने की पहली कोशिश 1830 में तमिलनाडु में हुई थी. 1868 में जमशेदजी टाटा ने टाटा ग्रुप शुरू किया. पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भारत में औद्योगिक विकास तेजी से हुआ, क्योंकि इससे अंग्रेजों को मदद मिलती थी.
- आजादी के बाद (1948-91): पंचवर्षीय योजना लाकर भारत ने उद्योगों पर फोकस किया. 1956 में एक इंडस्ट्रियल पॉलिसी लाई गई. लोहा, स्टील, भारी इंजीनियरिंग और फर्टिलाइजर इंडस्ट्री तेजी से बढ़ी. हालांकि, लाइसेंस राज होने के कारण सरकारी फैक्ट्रियों में वैसा काम नहीं हुआ, जैसा होना चाहिए था.
- 1991 के सुधार के बाद: 1991 में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था खोल दी. लाइसेंस राज खत्म होने से प्राइवेट इंडस्ट्री के लिए रास्ता खुल गया. हालांकि, इसके बाद गुड्स के बजाय सर्विसेस पर ज्यादा ध्यान दिया गया, जिससे इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन की ग्रोथ रेट में निगेटिव असर दिखा. हालांकि, MSME के माध्यम से सरकार ने मैनुफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया.
- 2014 से 2024: मोदी सरकार में 2014 में 'मेक इन इंडिया' योजना शुरू की गई. इसका मकसद भारत को मैनुफैक्चरिंग हब में बदलना है. मैनुफैक्चरिंग बढ़ाने के लिए PLI स्कीम शुरू की गई, जिसके तहत कंपनियों को इंसेटिव मिलता है. कॉर्पोरेट टैक्स में कमी की गई. MSME सेक्टर को बढ़ावा देने के मकसद से मुद्रा योजना लाई गई.
कितना बड़ा है भारत का मैनुफैक्चरिंग सेक्टर?
भारत की जीडीपी में 17% हिस्सेदारी मैनुफैक्चरिंग सेक्टर की है. IBEF की रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2022 से जून 2024 के बीच भारत की मैनुफैक्चरिंग इंडस्ट्री में 40% की ग्रोथ हुई है.
वहीं, दिसंबर 2023 में आई Colliers की रिपोर्ट बताती है कि 2025-26 तक भारत का मैनुफैक्चरिंग सेक्टर 1 ट्रिलियन डॉलर के पार चला जाएगा.
कॉमर्स मिनिस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 में भारत ने कुल 776.68 अरब डॉलर का सामान एक्सपोर्ट किया था. इसमें से 437 अरब डॉलर का एक्सपोर्ट मैनुफैक्चरिंग सेक्टर से हुआ था. 2022-23 की तुलना में मैनुफैक्चरिंग सेक्टर से जुड़े एक्सपोर्ट में 3% की गिरावट आई है. 2022-23 में मैनुफैक्चरिंग सेक्टर से 451 अरब डॉलर का एक्सपोर्ट हुआ था.
मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में अब विदेशी निवेश (FDI) भी तेजी से बढ़ रहा है. इसी साल अगस्त में मॉनसून सत्र के दौरान केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि 2014 से 2024 के बीच मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में 165 अरब डॉलर से ज्यादा का विदेशी निवेश आया है. जबकि, 2004 से 2014 के बीच करीब 98 अरब डॉलर का FDI आया था. यानी, 2004-14 की तुलना में 2014-24 के बीच मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में FDI में 69% की ग्रोथ दर्ज की गई है.
कितनी नौकरियां देता है मैनुफैक्चरिंग सेक्टर?
हमारे देश में मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार करने वालों की संख्या चार दशकों में 114% तक बढ़ी है. रिजर्व बैंक की हालिया रिपोर्ट बताती है कि 1980-81 में भारत में 2.95 करोड़ लोग ऐसे थे जो मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में काम करते थे. 2022-23 तक इनकी संख्या बढ़कर 6.31 करोड़ हो गई. भारत में जितनों के पास रोजगार हैं, उनमें से 10% मैनुफैक्चरिंग सेक्टर से ही जुड़े हैं.
केंद्र सरकार के मुताबिक, MSME सेक्टर में भी 30% से ज्यादा रोजगार मैनुफैक्चरिंग में ही हैं. आंकड़ों के मुताबिक, इस सेक्टर में 35% जॉब ट्रेड में और 32% जॉब मैनुफैक्चरिंग में हैं.
इसी साल जुलाई में आई Indeed की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत में अब मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार के नए मौके तेजी से उभर रहे हैं. Indeed के सेल्ड हेड शशि कुमार का मानना है कि चूंकि भारत अब एक ग्लोबल मैनुफैक्चरिंग हब बनने की कोशिश कर रहा है, इसलिए इस सेक्टर में कारोबारियों और नौकरी चाहने वालों, दोनों के लिए मौके ही मौके हैं.
क्या चीन का मुकाबला कर सकता है भारत?
आज भारत की जो आर्थिक स्थिति है, 2007 में वैसी ही हालत चीन की थी. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 2007 में चीन की जीडीपी 3.5 ट्रिलियन डॉलर थी. लगभग इतनी ही जीडीपी अभी भारत की है. 2007 में चीन की प्रति व्यक्ति आय लगभग 2,700 डॉलर थी. जबकि, इस समय भारत में प्रति व्यक्ति आय लगभग 2,500 डॉलर है.
चीन ने जो आर्थिक तरक्की की है, वो 2008 के बाद की है. उसके बाद चीन ने युवाओं को मैनुफैक्चरिंग सेक्टर की ओर आकर्षित किया. नतीजा ये हुआ कि एग्रीकल्चर सेक्टर में रोजगार करने वालों की संख्या घटी और मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में बढ़ी.
लेकिन अब भारत भी मैनुफैक्चरिंग हब के तौर पर उभर रहा है. अभी जीडीपी में मैनुफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 17% है, जिसे 2025 तक बढ़ाकर 25% पर ले जाने का लक्ष्य रखा गया है.
पिछले कुछ सालों में चीन से तनाव और ट्रेड वॉर के कारण कई बड़ी कंपनियों ने भारत की ओर रुख किया है. डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक्स मैनुफैक्चरिंग में काफी संभावनाएं हैं. भारत ने 2025 तक 5 अरब डॉलर के डिफेंस एक्सपोर्ट का टारगेट रखा है. इसी तरह 2030 तक इलेक्ट्रॉनिक्स मैनुफैक्चरिंग सेक्टर 300 अरब डॉलर पहुंचने की उम्मीद है. अमेजन और एपल जैसी टॉप कंपनियां पहले ही भारत में मैनुफैक्चरिंग को लेकर निवेश कर चुकी हैं.
पिछले साल जब एपल ने भारत में मैनुफैक्चरिंग प्लांट लगाने का ऐलान किया था तो चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने इसे चीन के लिए बड़ी 'चिंता' बताया था.
Colliers ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि गुजरात सबसे बड़ा मैनुफैक्चरिंग हब बनकर उभर सकता है. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु निवेश के लिए सबसे बड़ी पसंद हो सकते हैं.
गुजरात इसलिए क्योंकि इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के लिए सस्ती दरों पर जमीन मिलती हैं. कनेक्टिविटी अच्छी है और सरकार की तरफ से कंपनियों को इंसेंटिव मिलता है. वहीं, महाराष्ट्र में ना सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर अच्छा है, बल्कि यहां अपनी इंडस्ट्री लगाने पर सब्सिडी भी दी जाती है. जबकि, तमिलनाडु में लेबर कॉस्ट कम होने के साथ-साथ इंडस्ट्रियों को सब्सिडी और इंसेंटिव भी मिलता है.
बाहरहाल, भारत के पास चीन को पछाड़ने की पूरी क्षमता है. क्योंकि चीन की तुलना में भारत में न सिर्फ लेबर कॉस्ट कम है, बल्कि यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर भी मजबूत है. सरकार अगले पांच साल में इन्फ्रास्ट्रक्चर में 11 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने जा रही है. मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाएं हैं.
अगर भारत को बड़ा मैनुफैक्चरिंग हब बनना है तो मैनुफैक्चरिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट्स पर लगने वाली इंपोर्ट ड्यूटी को भी कम करना होगा. वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) के मुताबिक, भारत में कंपोनेंट्स पर औसतन 18% इंपोर्ट ड्यूटी लगती है, जबकि चीन में ये 7.5% है. इसी तरह कस्टम से इंपोर्ट क्लियरेंस मिलने में चीन में औसतन 20 घंटे का वक्त लगता है. जबकि, भार में 44 से 85 घंटे तक लग जाते हैं.
हालांकि, जानकारों का मानना है कि दुनिया का सबसे बड़ा मैनुफैक्चरिंग हब बनने के लिए भारत को सिर्फ चीन ही नहीं, बल्कि वियतनाम को भी पछाड़ना होगा, क्योंकि दुनिया की बड़ी मैनुफैक्चरिंग कंपनियों के लिए भारत के मुकाबले वियतनाम पहली पसंद है.