
अगस्त में चीन ने अपना नया आधिकारिक मैप जारी किया. तब से बवाल मचा हुआ है. नक्शे में भारत के अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन उसके देश में शामिल दिख रहे हैं. भारतीय हिस्सों के अलावा उसने ताइवान और विवादित दक्षिण चीन सागर को भी अपने में शामिल कर लिया. तब से चीन के विस्तारवादी मंसूबों पर भारत समेत कई देश भड़के हुए हैं.
किन देशों ने दर्ज किया एतराज
अब तक फिलीपींस, मलेशिया, ताइवान, नेपाल और वियतनाम चीन के नक्शे पर ऑब्जेक्शन रख चुके. मलेशिया ने तो सीधे डिप्लोमेटिक प्रोटेस्ट ही जाहिर कर दिया. वहीं चीन का कहना है कि उसने ऐतिहासिक नक्शों के आधार पर नया मैप निकाला. इससे पहले चीन ने जितनी भी बार यूनाइटेड नेशन्स में अपना नक्शा जमा किया, सबमें उसने सीमाओं को सिकोड़कर दिखाया था.
यहां तक तो फिर भी समझ आता है, लेकिन पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने रूस को भी नहीं छोड़ा. नए मैप में बोल्शोई उस्सुरीस्की नाम का द्वीप भी चीन में दिखता है, जबकि रूस का कहना है कि ये उसका आइलैंड है.
रूस के खाबरोवस्क शहर के करीब इस द्वीप पर दोनों देशों में तनाव रह चुका है. साठ के शुरुआती दशक की बात है, जब रूस (तब सोवियत संघ) और चीन के बीच रिश्ते गड़बड़ाने लगे थे. यहां तक कि मार्च की शुरुआत 1969 में चीन ने रूस पर हमला भी बोल दिया था.
सालों बाद पहुंच सके थे एग्रीमेंट पर
चार दशकों के विवाद के बाद साल 2005 में इसे लेकर समझौता हुआ. इसके तहत चीन को द्वीप के 350 वर्ग किलोमीटर में से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर का दायरा मिला था, जबकि बाकी हिस्सा रूस का हो गया. कुछ समय के भीतर दोनों के हिस्सों का जमीनी बंटवारा भी हो गया. अब दिक्कत ये है कि चीन इस रूसी हिस्से को भी अपना बता रहा है. ये सब उस समय हो रहा है, जब रूस से तो दुनिया बिदकी हुई है ही, चीन भी अपनी सीमा-फैलाओ रणनीति के कारण निशाने पर है.
क्या बदला जा सकता है मैप
हर देश की अपनी नेशनल मैप एजेंसी या कई संस्थाएं होती हैं, जो नक्शों पर काम करती हैं. लेकिन विवादित सीमा को ग्रे डॉट्स डालकर छोड़ दिया जाता है, भले ही यूनाइटेड नेशन्स में देश अपना-अपना पक्ष रखते रहें. हर कुछ सालों में लगभग सारे देश अपने नक्शों को रिवाइज करते हैं. इसे मैपिंग साइकल कहते हैं. कई बार इसी साइकल के दौरान देश कुछ गड़बड़ियां जानबूझकर करते हैं, जैसे चीन ने अभी की. वो विवादित इलाके को चुपके से अपने नक्शे का हिस्सा बता रहा है. मैपिंग साइकल में गलतियों को रोकने के लिए कोई इंटरनेशनल संस्था फिलहाल नहीं है.
जैसे हम-आप अगर किसी विवादित जमीन के पचड़े में पड़ते हैं तो निपटारे के लिए कोर्ट जाना होता है, वैसा ही मामला देशों के साथ भी है. इंटरनेशनल जमीन पर लड़ाई-झगड़ा नीदरलैंड के हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में जाता है. ऐसे कई केस वहां चल रहे हैं. हालांकि यहां भी वही हाल है. आमतौर पर कोर्ट ऐसे मामलों में उतना सख्त अप्रोच नहीं कर पाती क्योंकि ये दो देशों के बीच तनाव बढ़ा सकता है.
इस तरह सुलझता है मामला
इंटरनेशनल कोर्ट इसे दो तरीकों से सुलझाती है. अगर कोई बाउंड्री एग्रीमेंट हो तो वो देखा जाता है. फिर जांच होती है कि एग्रीमेंट कितना सही और किस आधार पर बना है. दूसरी तरीका है मामले को दोनों देशों के बीच छोड़ देना. कोर्ट इसमें तभी दखल देती है जब मामला हिंसक दिखने लगे.
किन मामलों का हो चुका है कोर्ट में निपटारा
- लीबिया और चड के बीच साल 1994 में समझौता.
- कतर और बहरीन में बॉर्डर समझौता.
- कैमरून और नाइजीरिया के बीच जमीन की लड़ाई में मध्यस्थता.
- बोत्सवाना- नामीबिया के बीच समुद्री सीमा के झगड़े का निपटान.
- मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच पुराने विवाद में कराई सुलह.
- सिंगापुर और मलेशिया के बीच एक द्वीपीय विवाद को सुलझाया.
क्यों बदलता रहता है मैप
अक्सर ये बात सीमावर्ती इलाकों में दिखती है. दो देशों की सीमाएं बंटी हुई तो हैं, लेकिन बहुत से देशों के बॉर्डर विवादित हैं. इनपर दोनों ही देश अपना दावा करते हैं. ऐसे हालातों में कई बार डिस्प्यूटेड जमीन पर रहने वाले अपना एक अलग देश बना लेना चाहते हैं और इसमें सफल भी होते हैं. तब नक्शे बदलते हैं. गूगल अर्थ पर विवादित इलाकों को डैश वाली ग्रे लाइन के साथ दिखाया जाता है ताकि कोई भी देश इसपर बवाल न खड़ा करे.