
कोरोना वायरस को हमारे बीच फैले तीन साल से भी ज्यादा का समय बीत चुका है. और ये वायरस कब तक रहेगा या कब खत्म होगा? इसका जवाब किसी को नहीं पता. ऐसा इसलिए क्योंकि वायरस लगातार म्यूटेट हो रहा है. इसी म्यूटेशन की वजह से संक्रमण जाते-जाते फिर लौट आता है.
भारत में भी कुछ महीनों से कोरोना के मामलों में कमी आ रही थी, लेकिन कुछ हफ्तों से संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.
स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, मंगलवार को देशभर में कोरोना के 10,542 नए मामले सामने आए हैं. 38 मरीजों की मौत भी हुई है. इतना ही नहीं, पॉजिटिविटी रेट भी 4.39 फीसदी पहुंच गया है.
पर ये मामले क्यों बढ़ रहे हैं? इसके लिए हेल्थ एक्सपर्ट ओमिक्रॉन के सब-वैरिएंट XBB.1.16 और XBB.1.16.1 को जिम्मेदार मानते हैं. इस समय यही दोनों सब-वैरिएंट हावी हैं और संक्रमण फैला रहे हैं. XBB.1.16.1 ओमिक्रॉन के सब-वैरिएंट XBB.1.16 का ही म्यूटेटेड वर्जन है. ऐसे में सवाल उठता है कि कोई वायरस म्यूटेट कैसे करता है?
1. वायरस में म्यूटेशन की वजह क्या?
होता ये है कि कोई भी वायरस खुद को जिंदा रखने के लिए अपने स्ट्रक्चर में बदलाव करता है और इसे ही म्यूटेशन कहते हैं, जिस कारण इसके नए-नए वैरिएंट सामने आते हैं.
दिसंबर 2019 में वुहान में कोरोना का जो वायरस फैला था, उसने बाद में म्यूटेट किया और उसकी वजह से ही अल्फा, बीटा, गामा, कप्पा, डेल्टा, डेल्टा प्लस और ओमिक्रॉन जैसे नए वैरिएंट सामने आ चुके हैं.
2. अलग-अलग वैरिएंट क्यों आ रहे हैं?
शुरुआत में ये था कि सार्स-कोव-2 नया वायरस था. उस समय न तो संक्रमण बहुत ज्यादा फैला था और न ही इसकी वैक्सीन मौजूद थी.
इस वजह से वायरस को खुद को जिंदा रखने के लिए म्यूटेट होने की जरूरत नहीं पड़ी. लेकिन जैसे-जैसे संक्रमण फैलने लगा, वैसे-वैसे इसमें म्यूटेशन होने लगा और इसके वैरिएंट सामने आने लगे.
अब चूंकि दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी संक्रमित हो चुकी है और वैक्सीनेटेड हो चुकी है, इसलिए अब वायरस में जल्द ही म्यूटेशन हो जा रहे हैं, जिस कारण कम समय में ही नया वैरिएंट सामने आ जा रहा है.
3. क्या नया वैरिएंट पहले से ज्यादा खतरनाक होता है?
जरूरी नहीं है कि नया वैरिएंट पिछले की तुलना में ज्यादा खतरनाक हो. इसे ऐसे समझिए कि जब कोरोना के नए वैरिएंट आए थे तो वो संक्रामक भले ही थे, लेकिन उतने ज्यादा घातक नहीं थे.
इसके बाद जब डेल्टा और डेल्टा प्लस वैरिएंट आए तो वो पिछले वैरिएंट की तुलना में कहीं ज्यादा संक्रामक और घातक, दोनों थे.
लेकिन डेल्टा के बाद जब ओमिक्रॉन वैरिएंट आया तो ये डेल्टा की तुलना में संक्रामक ज्यादा था लेकिन इसकी गंभीरता कम थी. ओमिक्रॉन संक्रमण जरूर बढ़ा रहा था लेकिन इससे मौतें डेल्टा और डेल्टा प्लस की तुलना में कम ही हो रही थीं.
4. तो क्या नए वैरिएंट खतरनाक नहीं होते?
ऐसा नहीं कहा जा सकता. एक्सपर्ट मानते हैं कि वायरस के जब नए-नए वैरिएंट सामने आते हैं तो वो खतरनाक भी हो सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं.
एक्सपर्ट का मानना है कि जब नया वैरिएंट आता है तो जरूरी नहीं कि बहुत ज्यादा संक्रामक न हो लेकिन वो घातक हो सकता है. इसी तरह से ये भी हो सकता है कि नया वैरिएंट बहुत ज्यादा संक्रामक हो लेकिन घातक न हो.
5. इसका खतरा क्या है?
वायरस में म्यूटेशन होना और उसके नए-नए वैरिएंट आने का सबसे बड़ा खतरा ये है कि ये इम्युन सिस्टम को कमजोर कर देता है. यानी भले ही आप वैक्सीनेटेड हो या पहले संक्रमित हो चुके हैं, आपके फिर से संक्रमित होने का खतरा बना रहता है.
यही वजह है कि नए वैरिएंट के सामने आते ही रि-इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है. एक्सपर्ट इसे लेकर ही चिंता जताते हैं. चिंता बढ़ाने की दूसरी बात ये है कि नए वैरिएंट कमजोर इम्युनिटी वालों को आसानी से शिकार बना लेते हैं.
6. फिर इससे बचने का तरीका क्या है?
एक्सपर्ट मानते हैं कि वायरस म्यूटेट होता है तो वो इम्युनिटी को कमजोर कर देता है. ऐसे में वैक्सीनेशन भी पूरी तरह से नहीं बचा सकता. लिहाजा वैक्सीन को अपडेट करने की जरूरत है.
अपडेट करने की जरूरत इसलिए क्योंकि पहले जो वैक्सीन बनी थी वो वायरस के अलग रूप को ध्यान में रखकर बनी थी, लेकिन अब वायरस ने अपना रूप बदल लिया है. ऐसे में जब वायरस शरीर के अंदर जाता है तो हो सकता है कि वैक्सीन से तैयार एंटीबॉडी वायरस की सेल्स को पहचान न सकें.
7. क्या अभी और वैरिएंट आएंगे?
आ सकते हैं. इसकी दो वजह हैं. पहली ये कि बड़े और अमीर देशों में तो वैक्सीनेशन हो रहा है लेकिन छोटे और गरीब मुल्कों तक वैक्सीन अभी अच्छी तरह से पहुंची नहीं है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब तक वायरस फैलता रहेगा तब तक इसके नए-नए वैरिएंट सामने आते रहेंगे.
दूसरी वजह ये है कि कोरोना वायरस जानवरों में भी फैल चुका है. कोई भी वायरस जानवरों के लिए अनुकूल होता है. जून 2020 में डेनमार्क के एक मिंक फार्म में कोरोना फैल गया था. यहां पहले इंसानों से मिंक में वायरस फैला और फिर मिंक से इंसानों में.
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर जानवरों में वायरस फैल जाता है तो इससे उसे पूरी तरह खत्म कर पाना मुश्किल हो जाता है. इतना ही नहीं, जानवरों में वायरस फैलने से इसके नए और खतरनाक वैरिएंट सामने आने का खतरा भी बढ़ जाता है.
8. तो क्या कभी खत्म नहीं होगा कोरोना?
हो सकता है कि कोरोना का वायरस कभी हमारे बीच से न जाए. ऐसे पहले कई वायरस आ चुके हैं जो हमारे बीच अब तक बने हुए हैं. इनमें एचआईवी, खसरा, चेचक, हेपेटाइटिस जैसे वायरस शामिल हैं.
हालांकि, एक्सपर्ट ये भी मानते हैं कि हो सकता है कि कोरोना वायरस एंडेमिक स्टेज में आ जाए. एंडेमिक स्टेज वो होती है जब वायरस इंसानों के बीच में हमेशा के लिए रह जाता है और पूरी तरह खत्म नहीं होता.
अगर कोरोना वायरस एंडेमिक स्टेज में आता है तो इससे लोग संक्रमित तो होते रहेंगे लेकिन उतनी बड़ी तादात में नहीं जितने अभी हो रहे हैं.
9. फिर वैक्सीनेशन करवाना जरूरी होगा या नहीं?
अगर वायरस एंडेमिक स्टेज में भी चला जाता है तो भी हो सकता है कि ये कभी पैंडेमिक यानी महामारी या फिर आउटब्रेक की स्टेज में आ जाए.
ऐसी स्थिति से बचने के लिए वैक्सीनेशन बहुत जरूरी है. अभी भी खसरा और बाकी दूसरे वायरस की वैक्सीन दी ही जाती रही है, भले ही ये वायरस एंडेमिक स्टेज में हों.
वैज्ञानिकों का भी यही मानना है कि अगर कोरोना वायरस एंडेमिक स्टेज में आ भी जाता है तो भी इसकी वैक्सीन को अपडेट करते रहना और वैक्सीनेशन जरूरी हो सकता है. हो सकता है कि जिस तरह से फ्लू की वैक्सीन हर साल दी जाती है, वैसे ही कोविड की वैक्सीन भी हर साल लेनी पड़े.
10. भारत में क्या होने वाला है?
भारत में इस समय ओमिक्रॉन के दो सब-वैरिएंट XBB.1.16 और XBB.16.1 संक्रमण बढ़ा रहे हैं. हालांकि, राहत की बात ये है कि इससे हॉस्पिटलाइजेशन और मौतों की संख्या नहीं बढ़ रही है.
स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े सूत्रों ने कुछ दिन पहले बताया था कि अभी जो संक्रमण बढ़ रहा है वो नई लहर का अंदेशा नहीं है. बल्कि ये कोविड की एंडेमिक स्टेज हो सकती है.
स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों का ये भी कहना है कि वैक्सीन की तीसरी डोज की जरूरत अब सिर्फ उन्हीं लोगों को है जो पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं.