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रूस के बाद अमेरिका पर लटकी आतंकी हमले की तलवार, क्यों ISIS अमेरिका को दुश्मन नंबर 1 मानता है?

मॉस्को में हाल में हुए आतंकी हमले ने साफ कर दिया कि रूस पर आतंकियों, खासकर ISIS-K का खतरा बना हुआ है. इससे पहले भी रूस के दूतावासों को ये आतंकी गुट निशाना बनाता रहा. लेकिन जैसे-जैसे इस्लामिक स्टेट ताकतवर हो रहा है, सबसे ज्यादा खतरा अमेरिका पर मंडरा रहा है. खुद अमेरिकी रक्षा एक्सपर्ट्स इसपर चेताने लगे हैं. जानिए, इस्लामिक स्टेट की अमेरिका से क्या दुश्मनी है.

इस्लामिक स्टेट का खतरा कई देशों पर मंडरा रहा है. (Photo- Getty Images) इस्लामिक स्टेट का खतरा कई देशों पर मंडरा रहा है. (Photo- Getty Images)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 01 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 3:00 PM IST

22 मार्च को मॉस्को के क्रोकस सिटी हॉल कॉन्सर्ट हॉल में हुए हमले में 134 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी. आतंकी गुट इस्लामिक स्टेट ने इसकी जिम्मेदारी ली है. हमलावर पकड़े जा चुके, साथ ही संदिग्धों से पूछताछ चल रही है, लेकिन रूस की चिंता बनी हुई है. जिस इस्लामिक स्टेट के बारे में माना जा रहा था कि वो लगभग खत्म हो चुका, वो न केवल भीतर पहुंचा, बल्कि इतना नुकसान भी कर गया. क्रेमलिन के बाद अंदेशा जताया जा रहा है कि आतंकी किसी अमेरिकी शहर को टारगेट कर सकते हैं. 

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अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ दे रहे चेतावनी

रविवार को यूनाइटेड स्टेट्स सेंट्रल कमांड के पूर्व हेड फ्रैंकलिन मैकेंजी ने दावा किया कि इस्लामिक स्टेट यूएस पर हमलावर हो सकता है. मैकेंजी के अनुसार, खतरा इसलिए भी ज्यादा है कि अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान छोड़ दिया. इससे आतंकियों को वहां पनपने का मौका मिल गया. अब वे पूरी तरह से तैयार हो चुके हैं.

बिल्कुल इसी तरह का बयान यूएस के आर्मी जनरल माइकल एरिक कुरिला ने भी दिया. सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ISIS-K के पास अब अमेरिका और उसके हितों पर अटैक करने की ताकत और मंशा दोनों ही है. आर्मी जनरल ने यहां तक कह दिया कि ऐसा 6 महीने के भीतर भी हो सकता है. 

इस्लामिक स्टेट के नाम पर अमेरिका में आखिरी हमला साल 2017 में हुआ था. न्यूयॉर्क में एक ट्रक में बैठे आतंकियों ने साइकिल सवारों पर गाड़ी चला दी थी, हमले में 8 मौतें हुईं, जबकि कई लोग घायल हुए थे. ये आतंकी गुट के पतन के चरम और पतन का दौर था. 

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वो सीरिया और इराक के सभी बड़े शहरों, जैसे राका, मोसुल, फलुजेह दियाला, किरकर पर कब्जा कर चुका था. यहां तक कि इराक की राजधानी बगदाद तक भी इसकी धमक सुनाई देती थी. कुल मिलाकर लगभग 1 लाख वर्ग किलोमीटर की टैरिटरी पर इसका पक्का राज था, जबकि आसपास के इलाकों में भी असर दिखने लगा था. 

ये चरमपंथ का दौर था, जिसमें युवा आबादी के जत्थे के जत्थे इस्लामिक एक्सट्रीमिस्ट होने लगे. यहां तक कि अमेरिका, यूरोप और ब्रिटेन से लोग भागकर इस्लामिक स्टेट जॉइन करने लगे. ये खतरे की घंटी थी, जिसने अमेरिका और बाकी देशों को अलर्ट कर दिया. साल 2016 में इराक और सीरिया की सरकारों ने पहली बार इसके खिलाफ खुलकर लड़ाई छेड़ी. अमेरिकी फोर्स ने इसमें उनका साथ दिया. यहीं से इस्लामिक स्टेट का जादू टूटने लगा.

इस तरह हुआ सफाया

सबसे पहले इराक के मोसुल और सीरिया के रक्का में इसके हेडक्वार्टर खत्म हुए. लड़ाई तब भी चलती रही. इसका खात्मा तब हुआ, जब इसका लीडर अबु बक्र-अल बगदादी मारा गया. इसके बाद से इस्लामिक स्टेट लगातार कमजोर होता गया और मार्च 2019 में लगभग पूरी तरह खत्म हो गया. कम से कम एलान तो यही हुआ. उसके खात्मे में अमेरिकी सेना और अमेरिकी नीतियों का बड़ा हाथ रहा. देश ने खुद तो इन देशों में अपनी सेनाएं भेजी हीं, मित्र देशों को भी सेनाएं भेजने को कहा. इसी बात ने इस्लामिक स्टेट को अमेरिका का कट्टर दुश्मन बना दिया. 

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अमेरिका बना रहा था आतंकियों को निशाना

आग में घी डालने का काम किया, अमेरिकी फोर्स की अफगानिस्तान में लंबी तैनाती और आक्रामकता ने. वो अक्टूबर 2001 से लेकर अगले 20 सालों तक वहां रही ताकि इस्लामिक स्टेट या कोई भी इस्लामिक चरमपंथी गुट सिर न उठा सके. इस दौरान ISIS-K की ताकत काफी कमजोर होती चली गई. 

अमेरिकी हमलों की वजह से साल 2016 तक ISIS-K में 1500 से 2000 आतंकवादी ही बचे थे. तभी 13 अप्रैल 2017 को अमेरिका ने इस आतंकवादी संगठन को सबसे बड़ी चोट दी और अफगानिस्तान के नांगरहार राज्य में मदर ऑफ ऑल बम को ISIS-K मुख्यालय के ठीक ऊपर गिराया. इसमें तीन दर्जन से ज्यादा आतंकवादी एक झटके में मारे गए थे. 

एक के बाद एक दिख रहे इस्लामिक स्टेट के लिंक्स 

इसके बाद काफी वक्त तक शांति रही लेकिन अब एक बार फिर हलचल दिखने लगी है. खासकर रूस पर हुए हमले ने अमेरिका और यूरोप को अलर्ट कर दिया है. एक्सट्रीमिस्ट गुटों की फंडिंग रुकवाकर उन्हें कमजोर करने वाली संस्था काउंटर एक्सट्रीमिज्म प्रोजेक्ट के अनुसार, पिछले साल जुलाई में जर्मनी में 7 लोगों को अरेस्ट किया गया. ये इस्लामिक स्टेट से जुड़े हुए थे और जर्मनी समेत कई देशों में हाई-प्रोफाइल अटैक की तैयारी में थे. इसी महीने जर्मनी में ही दो अफगान नागरिकों को पकड़ा गया, जो स्वीडन की पार्लियामेंट को दहलाने की प्लानिंग कर रहे थे. 

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दस्तावेज भी डरा रहे 

कुछ समय पहले यूएस डिफेंस डिपार्टमेंट से एक क्लासिफाइड पेपर लीक हो गया. वॉशिंगटन पोस्ट में इस क्लासिफाइड दस्तावेज, जो कि पेंटागन ने जारी किया था, के हवाले से कहा गया कि ISIS एक कॉस्ट इफेक्टिव मॉडल बना रहा ताकि कम खर्च पर टारगेट देशों को दहला सके. जैसे ISIS के का सेंटर अफगानिस्तान में है, लेकिन उसके लड़ाके सीमित हैं. ऐसे में वो अपने जैसी सोच वाले इस्लामिक चरमपंथी गुटों को उकसाएगा और टारगेट देशों में आतंक बढ़ाएगा. 

लीक्ड कागजों के मुताबिक, ISIS इसपर साफ है कि उसे किन जगहों को निशाना बनाना है. इसमें एंबेसी, चर्च, बिजनेस सेंटर और बाजार शामिल हैं. कोई बड़ा खेल आयोजन भी वो जगह हो सकता है, जहां आतंकी दहशतगर्दी फैलाएं. फ्रांस में इस साल ओलंपिक होने वाला है, यानी ये देश भी इस्लामिक स्टेट के निशाने पर आ सकता है. 

रूस से क्यों उखड़ा हुआ है ISIS-K

इस देश पर पहले भी इस गुट के हमले होते रहे. इसके पीछे इस्लामिक स्टेट के लीडर अबू बक्र अल बगदादी का बड़ा हाथ रहा. उसने एलान किया था कि इस्लामिक स्टेट का रूस और अमेरिका से धर्मयुद्ध होगा, जिसमें इस्लामिक स्टेट को ही जीतना होगा. एलान के सालभर के भीतर रशियन विमान में ब्लास्ट में 224 लोग मारे गए. इसकी जिम्मेदारी इसी गुट ने ली थी. दरअसल आतंकियों को इस बात पर गुस्सा है कि सीरिया से इस्लामिक स्टेट को खत्म करने में रूस ने अमेरिका का साथ दिया. इसके अलावा ये गुट ऐसे आरोप भी लगाता है कि रूस में चेचन्या के मुस्लिमों के साथ नाइंसाफी हो रही है. 

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क्या है ISIS-K

ISIS खुरासान, इस्लामिक स्टेट का ही हिस्सा है, जिसे अफगानिस्तान-पाकिस्तान के आतंकवादी चलाते हैं. इसका मुख्यालय अफगानिस्तान के ही नांगरहार राज्य में है जो पाकिस्तान के बेहद नजदीक है. तालिबानी कमांडर मुल्ला उमर की मौत के बाद तालिबान के बहुत से खूंखार आतंकवादी ISIS खुरासान में शामिल हो गए. इस तरह ये तालिबान से ही निकला ग्रुप कहा जा सकता है.

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