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ओडिशा ने ऐसा क्या कि हर साल आसानी से झेल लेता है तूफान? 25 साल पहले आए 'महातूफान' से क्या है कनेक्शन

25 साल पहले ओडिशा में अब तक का सबसे खतरनाक तूफान आया था. उस तूफान में लगभग 10 हजार लोग मारे गए थे. इसके बाद ओडिशा ने खुद को इस तरह तैयार किया कि वहां कितना भी बड़ा तूफान आ जाए, नुकसान बहुत ज्यादा नहीं होता है. ऐसे में जानते हैं कि ओडिशा ने ऐसा क्या किया, जिससे वो समंदर का गुस्सा झेल लेता है.

चक्रवाती तूफान दाना गुरुवार-शुक्रवार की रात टकरा सकता है. (फोटो-PTI) चक्रवाती तूफान दाना गुरुवार-शुक्रवार की रात टकरा सकता है. (फोटो-PTI)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 24 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 8:45 PM IST

बंगाल की खाड़ी से उठे चक्रवाती तूफान 'दाना' ने अब रफ्तार पकड़ ली है. गुरुवार सुबह से ही ओडिशा में तेज हवाओं के साथ भारी बारिश हो रही है. मौसम विभाग के मुताबिक, साइक्लोन दाना 12 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उत्तर-उत्तरपश्चिम की ओर बढ़ रहा है.

मौसम विभाग ने बताया कि दाना तूफान गुरुवार-शुक्रवार की रात भितरकनिका नेशनल पार्क और धामरा पोर्ट के पास टकराएगा. ये दोनों पुरी से सटे हुए हैं. इस दौरान 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलने की संभावना है.

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शुक्रवार सुबह साइक्लोन दाना के उत्तरी ओडिशा और पश्चिम बंगाल के तटों को पार करने की संभावना है. इस तूफान का सबसे ज्यादा असर ओडिशा में होगा. तूफान से पहले 10 लाख से ज्यादा लोगों को निकाला जाना है. ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन माझी ने बताया कि बुधवार सुबह तक 10 लाख में से 30 फीसदी लोगों को निकाला जा चुका है.

तूफान के चलते रेलवे ने 200 से ज्यादा ट्रेनें कैंसिल कर दी हैं. एनडीआरएफ की 56 टीमों को ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तैनात किया गया है. इनमें से 21 टीम ओडिशा और 17 पश्चिम बंगाल में हैं.

वैसे तो तूफान जब आता है तो तटीय राज्यों पर ही इसका सबसे ज्यादा असर दिखता है. लेकिन ओडिशा तूफानों को हर साल झेलता है. किसी भी तूफान का सबसे ज्यादा असर यहीं पड़ता है. ओडिशा सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि 100 साल में यहां 260 से ज्यादा तूफान आए हैं.

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मगर ओडिशा ही क्यों?

समंदर में तूफान तब आता है, जब इसकी सतह का पानी गर्म आ जाता है. पानी गर्म होकर उड़ता है और ऊपर की ठंडी हवा से टकराता है. भारत के एक तरफ अरब सागर तो दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी है. बंगाल की खाड़ी में बनने वाला तूफान अरब सागर की तुलना में काफी अलग होता है. 

ज्यादातर तूफान बंगाल की खाड़ी में ही बनते हैं. वो इसलिए क्योंकि बंगाल की खाड़ी अरब सागर की तुलना में ज्यादा गर्म होती है. बंगाल की खाड़ी में साल में दो बड़े चक्रवाती तूफान आने की आशंका रहती है. ये आमतौर पर मार्च से मई और अक्टूबर से दिसंबर के बीच आते हैं. 

वहीं, ओडिशा की जियोग्राफी इस तरह की है कि वो तूफान के लिए चुंबक की तरह काम करती है. बंगाल की खाड़ी में जब भी तूफान बनता है तो वो उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ता है. 

ओडिशा ऐसी जगह पर है, जहां भारत की कोस्टल लाइन यानी तटरेखा मुड़ती है, इसलिए इसका किनारा तूफानों से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है. 

कैसे संभाल पाता है ओडिशा खुद को?

ओडिशा में हर साल तूफान आते हैं. लेकिन 1999 में यहां एक ऐसा तूफान आया था, जिसने सबकुछ बदल कर रख दिया. इसे 'सुपर साइक्लोन' भी कहा जाता है. 

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सरकारी रिपोर्ट बताती है कि उस तूफान में ओडिशा में 9,885 लोग मारे गए थे. साढ़े 4 लाख जानवरों की भी मौत हुई थी. इतना ही नहीं, 17 हजार से ज्यादा स्कूल और 12 हजार किलोमीटर की सड़क भी बर्बाद हो गई थी.

इस तूफान से सबक लेकर ओडिशा की सरकार ने 'जीरो कैजुअलिटी' का टारगेट सेट किया. सबसे पहले तो सरकार ने ओडिशा स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (OSDMA) का गठन किया. देश का ये पहला राज्य था, जहां डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी का गठन हुआ था. जबकि, केंद्रीय स्तर पर नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) का गठन 2005 में हुआ था. 

ओडिशा की सरकार ने लोगों को न सिर्फ प्राकृतिक आपदाओं को लेकर लोगों को जागरूक किया, बल्कि इनसे निपटने की ट्रेनिंग भी दी.

इसका नतीजा क्या हुआ?

ये ओडिशा सरकार की सालों की मेहनत और तैयारियां ही थीं कि तूफान में होने वाली मौतों को डबल डिजिट में लेकर आ गई.

साल 2013 में ओडिशा में 'फैलिन' नाम का तूफान आया था. ये तूफान भी 1999 की तरह ही था. जब ये तूफान आया था तो ओडिशा में 250 किलोमीटर प्रति घंटे से भी ज्यादा की रफ्तार से हवा चल रही थी. लेकिन सरकार तैयार थी तो उसने पहले ही 11 लाख लोगों को प्रभावित इलाकों से निकाल लिया. इसका नतीजा ये हुआ कि उस तूफान में 44 लोगों की ही मौत हो गई. इनमें से 23 की मौत तूफान के बाद आई बाढ़ की वजह से हुई थी. ओडिशा सरकार को इसके लिए संयुक्त राष्ट्र ने भी सम्मानित किया था. 

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फिर 2014 में 'हुदहुद' तूफान आया था, जिसमें दो मौतें हुई थीं. 2019 में जब 'फैनी' तूफान आया था तो सरकार ने 12 लाख से ज्यादा लोगों को प्रभावित इलाकों से निकाल लिया था.

कैसे हुआ ये सब?

1999 के तूफान से सबक लेते हुए सरकार ने जमीनी स्तर पर जाकर लोगों को ट्रेनिंग दी है. गांवों में जाकर महिलाओं तक को तूफान और प्राकृतिक आपदा से निपटने की ट्रेनिंग दी गई है. अब भी साल में दो बार जून और नवंबर में मॉक ड्रिल की जाती है. 

लेकिन सिर्फ लोगों को ट्रेनिंग देने से तूफान से निपटा नहीं जा सकता. इसके लिए सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया है. 

पिछले साल आई वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट बताती है कि सरकार ने ओडिशा में पूरी कोस्टल लाइन में एक रोड नेटवर्क तैयार किया है, जिसका इस्तेमाल लोगों को प्रभावित इलाकों से सुरक्षित निकालने में किया जाता है. इसके साथ ही 800 से ज्यादा शेल्टर होम भी बनाए हैं.

तटीय गांवों में समंदर के पानी को घुसने से रोकने के लिए तटबंध बनाए गए हैं. गांवों में जो लोग कच्ची झोपड़ियों में रहते थे, उनके लिए घर तैयार किए गए हैं. इतना ही नहीं, तटीय इलाकों के 1200 गांवों में वॉर्निंग सिस्टम भी लगाया गया है, जो बाढ़, तूफान या आपदा आने की स्थिति में सायरन बजाकर अलर्ट करता है. 120 से ज्यादा तटीय इलाकों में मॉनिटरिंग टॉवर भी लगाए गए हैं.

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