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भूख, दर्द और एक्सट्रीम मौसम... आखिर क्यों गुस्सैल हो रहे कुत्ते, कैसे जानें कि करेगा अटैक?

इन दिनों Dog bite की घटनाएं देशभर को दहला रही हैं. दिल्ली- एनसीआर, राजस्थान के साथ सुदूर प्रांत केरल में भी यही हाल है. वहां सरकार ने Court से आवारा डॉग्स को मारने की इजाजत चाही क्योंकि लोग सेफ महसूस नहीं कर रहे. लेकिन क्या वजह है जो डॉग बाइट के मामले एकाएक बढ़े? क्या है कुत्तों की साइकोलॉजी?

कुत्तों में बढ़ती आक्रामकता कई बातों का संकेत है (Getty Image) कुत्तों में बढ़ती आक्रामकता कई बातों का संकेत है (Getty Image)
मृदुलिका झा
  • नई दिल्ली,
  • 22 नवंबर 2022,
  • अपडेटेड 1:18 PM IST

हाल में जयपुर के सांगानेरी गेट अस्पताल में कुत्ता एक नवजात को मुंह में दबाए दिखा. लोगों के शोर मचाने के बाद वो बच्चे को वहीं गिराकर भाग गया. कहने की जरूरत नहीं, बुरी तरह नोंचे जाने से नवजात की मौत हो चुकी थी. लगभग हफ्तेभर पहले कर्नाटक में एक पांच-साल के बच्चे की डॉग बाइट से जान चली गई. ऐसे मामले लगातार आ रहे हैं. जैसे कोई साइंस फिक्शन मूवी चल रही हो, एकदम से देश के सारे कुत्तों में कोई चिप लगा दी गई, जिसके बाद वे गुस्सैल होकर हर किसी को फाड़ देने के लिए घूमने लगे. बहरहाल, ये साइंस फिक्शन तो नहीं, लेकिन मनोविज्ञान जरूर है. 

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होते हैं अनेक ट्रिगर

कई बातें हैं, जो डॉग्स के लिए ट्रिगर का काम कर रही हैं. आइए, उनके साथ ये भी जानते हैं कि कैसे समझा जाए, कोई कुत्ता आक्रामक हो सकता है, कैसे उससे बचा जाए, और अगर वो अटैक कर दे, तो सबसे पहले क्या किया जाना चाहिए. 

एग्जॉटिक नस्ल को रखने की सनक

पालतू कुत्तों की बात करें तो उनमें बढ़ते गुस्से की एक बहुत सीधी वजह है लोगों को एग्जॉटिक नस्ल को पालने का फितूर. उदाहरण के तौर पर, साइबेरियन हस्की ब्रीड बेहद ठंडी जगहों पर रहने वाले कुत्ते हैं, लेकिन अब ये भारत जैसे अमूमन गर्म देश में भी मिलने लगे हैं. लोग विदेशों से उन्हें मंगवाते और घरों पर रखते हैं. इसी तरह से पिटबुल या अमेरिकन बुलडॉग को लें तो ये भी जंगली ब्रीड हैं. इन्हें घर पर रखने से पहले पक्की ट्रेनिंग होती है, जिसके इन्हें इंसानों और छोटे बच्चों के साथ रहना सिखाया जाता है. 

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कुत्ते के मालिक को भी मिलती है ट्रेनिंग 

साथ ही साथ डॉग ओनर को भी प्रशिक्षण मिलता है कि वो इनके साथ कब-कैसा व्यवहार करे. इन्हें बाहर की हवा और खूब कसरत यानी भागदौड़ चाहिए होती है. अब घर के मालिक अगर इन्हें एक कमरे में रखेंगे, या सुबह-शाम थोड़ी देर टहलाने ले जाएंगे, तो ये इनके लिए काफी नहीं. तो होता ये है कि इनका स्वभाव गुस्सैल होता चला जाता है और अचानक बिना वजह से हमला बोल देते हैं. 

क्रॉस-ब्रीडिंग भी बड़ी समस्या 

क्रॉस ब्रीडिंग यानी दो अलग-अलग नस्लों को वंश बढ़ाने के लिए आपस में मिलाना. इसके कई नियम हैं, जैसे किन दो नस्लों की ब्रीडिंग खतरनाक हो सकती है, किन दो नस्लों के मिलने से कुत्तों में बीमारियां बढ़ सकती हैं. हमारे यहां बहुत से डॉग सेंटर चलाने वालों को न तो इस नियम की जानकारी है, न ही वे इसे समझना ही चाहते हैं. वे बस अपनी दुकान चलाए रखना चाहते हैं. यहां तक कि ऐसे बहुत से शॉप्स रजिस्टर्ड तक नहीं हैं. एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया इसपर वक्त-वक्त पर एक्शन लेता है, लेकिन कुछ दिन बंद रहने के बाद पेट-शॉप्स दोबारा चल पड़ती हैं. 

क्रॉस ब्रीडिंग का ध्यान न रखना और विदेशी नस्ल के कुत्तों की खरीद-फरोख्त ज्यादातर इन्हीं अनरजिस्टर्ड शॉप्स में होती है. प्रिवेंशन ऑफ क्रुएलिटी टू एनिमल्स (डॉग ब्रीडिंग एंड मार्केटिंग) 2017 के तहत इसपर जुर्माना और सजा दोनों का ही नियम है, खासकर अगर आपका बेचा कुत्ता आक्रामक प्रकृति का निकले. हालांकि इसपर भी कोई पुख्ता एक्शन नहीं लिया जा रहा. 

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अक्सर डरे हुए कुत्ते अटैक करते हैं

उनके सामने अचानक से आ जाने पर वे तय नहीं कर पाते कि सामने वाला दोस्ताना है, या हमलावर, तो ऐसे में किसी निर्णय पर आने से पहले ही वे अटैक कर देते हैं. इसी तरह के कुछ ही समय पहले बच्चों को जन्म दे चुके डॉग पेरेंट्स भी हमला करने की प्रवृति रखते हैं. वे ऐसा अपने बच्चों की सेफ्टी के लिए करते हैं. तो अगर इंसानी बच्चे किसी स्ट्रे डॉग के पपी के साथ खेलता दिखे तो उसपर हमला हो सकता है. कई बार कुत्ते किसी दर्द में होने पर भी गुस्सैल हो जाते हैं. भूख और एक्सट्रीम मौसम भी कुछ वजहों में से हैं. 

किन नस्लों को घर पर रखना सही नहीं

हाल ही में गाजियाबाद में कुत्तों को 11 ब्रीड्स को घरों में रखने पर बैन लगा. ये हैं- अमेरिकन पिटबुल, डॉगो अर्जेंटिनो, रॉटवेलर, निएपॉलियन मेस्टिफ, बुअबुल, प्रेसा केनेरिओ, वोल्फ डॉग, बैंडॉग, अमेरिकन बुलडॉग, फाइला ब्रेसिलाइरो और केन कॉर्स. गाजियाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन पहले से पाले हुए कुत्तों को शेल्टर होम ले जाएगा और वहां चेक किया जाएगा कि उनकी अच्छी तरह ट्रेनिंग हो. बता दें कि सोशलाइजेशन एक ऐसी चीज है, जिसकी ट्रेनिंग इंसानी बच्चों की तरह ही डॉग्स को भी चाहिए होती हैं. आजकल बड़े शहरों में खुद को डॉग लवर्स कहने वाले बढ़े तो हैं लेकिन वे सुबह से शाम तक अपने दफ्तर से लिए जाते हुए उसे फ्लैट पर बंद करके जाते हैं. ऐसे में अकेलापन झेलते हुए भी वो गुस्सैल हो जाता है.

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होती है सेपरेशन एंजाइटी

डॉग्स भी बिल्कुल हम इंसानों की तरह होते हैं. अकेला छोड़ा जाना उन्हें भी परेशान करता है. यहां तक कि उन्हें सेपरेशन एंजाइटी भी होती है, यानी परिवार से अलग होने का डर. अमेरिकन केनल क्लब की स्टडी के मुताबिक, हर 10 में से 1 डॉग इस डर को झेलता है, जब भी परिवार का कोई सदस्य बाहर जाता है. ये डर और ज्यादा तब बढ़ जाता है जब घर में वो अकेला डॉग हो. ये आमतौर पर जन्म के तुरंत बाद अपनी मां से अलग कर दिया जाता है, जिस वजह से डर तो होता ही है, साथ ही इनकी इम्युनिटी भी कम होती है. ऐसे कुत्ते अच्छी देखरेख न मिलने पर बार-बार बीमार होते हैं और ज्यादा आक्रामक भी होते हैं. 

कैसे पहचानें कि डॉग अटैक कर सकता है

इसका कोई पक्का संकेत नहीं है. हालांकि स्ट्रे डॉग्स अगर आपको देखकर दूर से ही भौंक रहे हैं, या उनके हावभाव में बेचैनी हो, तो वे परेशान हैं, और उनके पास से गुजरने पर वे हमला भी कर सकते हैं. स्ट्रे डॉग्स का अपना एरिया भी होता है, ठीक वैसे ही जैसे हमारा घर होता है. वे अपने इलाके में घुसने वालों पर हमला कर सकते हैं. कई बार कुत्ते बड़ी तेजी से अपनी पूंछ मरोड़ते-काटते दिखते हैं, ये भी इशारा है कि वो आपको दूर रहने कह रहा है. 

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क्या करें जब कुत्ता अटैक कर ही दे 

तमाम सावधानियों के बाद भी डॉग अटैक कर दे तो जल्दी से जल्दी डॉक्टर के पास पहुंचे. लेकिन इससे भी पहले फर्स्ट एड लेना काम आएगा. मेयो क्लिनिक के मुताबिक, इससे रेबीज का खतरा लगभग अस्सी प्रतिशत तक कम हो जाता है. तो सबसे पहले तो उस जगह को साफ करें जहां कुत्ते ने काटा हो. इसके लिए हल्का साबुन या डेटॉल इस्तेमाल कर सकते हैं. लगभग 10 मिनट तक उस जगह को अच्छी तरह से साफ करें, लेकिन हाथों का दबाव सख्त न हो. अब साफ कपड़े से पोंछने के बाद वहां कोई एंटीसेप्टिक क्रीम लगाई जा सकती है, या आयोडिन अप्लाई कर सकते हैं.

इसके तुरंत बाद उस अस्पताल पहुंचे, जहां रेबीज का इंजेक्शन मिल सके. वहां डॉक्टर को सारी बात बताने के बाद ही इंजेक्शन लें. काटी हुई जगह पर अगर सूजन, लालिमा, त्वचा का गर्म होना या बुखार जैसे लक्षण हों, तो दोबारा अस्पताल में कंसल्ट करें. 

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