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हमेशा से पॉल्यूशन फैलाने वाले देशों में रहा अमेरिका, फिर क्यों ट्रंप ने बनाई पेरिस एग्रीमेंट से दूरी?

डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी पर्यावरण-प्रेमी 'क्लाइमेट-डिनायर' मानते रहे, यानी वो शख्स, जो इससे जुड़े मुद्दों से बचता है. राष्ट्रपति बनते ही ट्रंप ने न केवल पेरिस एग्रीमेंट से दूरी बनाई, बल्कि देश को उन सारे वादों से मुक्त कर दिया, जो पिछली सरकार ने पर्यावरण पर किए थे. एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर दस्तखत करते हुए राष्ट्रपति ने इन अनुबंधों को एकतरफा भी बता दिया.

डोनाल्ड ट्रंप इस टर्म में भी पेरिस समझौते से बाहर हो गए. (Photo- Getty Images) डोनाल्ड ट्रंप इस टर्म में भी पेरिस समझौते से बाहर हो गए. (Photo- Getty Images)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 24 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 6:58 PM IST

राष्ट्रपति पद के चुनावों से पहले कुछ मुद्दों पर खूब हल्ला था. डेमोक्रेट्स का कहना था कि ट्रंप सत्ता में आए तो पर्यावरण की हालत और खराब हो जाएगी. यहां तक कि ट्रंप को क्लाइमेट डिनायर कहा गया. वहीं रिपब्लिकन्स के नेता ट्रंप इसे अपनी खूबी मानते रहे. उनका सीधा तर्क था कि क्लाइमेट चेंज बेवजह का मुद्दा है, जिसपर अमेरिकी पैसे निचोड़े जा रहे हैं. उन्होंने पेरिस एग्रीमेंट खत्म करने की बात कही, और यही किया भी. एग्जीक्यूटिव ऑर्डर साइन करके वे अपने देश को पर्यावरण से जुड़े ग्लोबल कमिटमेंट से अलग कर चुके. 

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तो क्या क्लाइमेट चेंज पर बहस वाकई वक्त की बर्बादी है, या फिर ट्रंप ही जरूरी मसले से बच रहे हैं?

ये पहली बार नहीं, साल 2017 में भी ट्रंप ने पेरिस समझौते से देश को अलग कर लिया था. वे बार-बार इस एग्रीमेंट पर नाराजगी जताते रहे. दरअसल साल 2015 में हुए इस समझौते का बड़ा मकसद है, ग्लोबल तापमान पर काबू करना. इसके लिए कोयला, गैस और तेल से होने वाले प्रदूषण को कम करना होगा. हर देश ने वादा किया कि वो अपनी तरफ से इसकी पूरी कोशिश करेगा. अमेरिका में चूंकि इंडस्ट्रीज के चलते ग्रीन हाउस एमिशन ज्यादा है, लिहाजा उसका टारगेट भी बड़ा था. लेकिन वो बराक ओबामा का कार्यकाल था. ट्रंप ने आते ही इसका विरोध किया और समझौते से दूर हो गए. 

ट्रंप का कहना था कि ये एग्रीमेंट अनफेयर है, जो अमेरिका पर गैरजरूरी दबाव बनाता है.

- पेरिस समझौते के तहत देश को अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करना होगा. ट्रंप को डर था कि इससे कई इंडस्ट्रीज पर असर होगा और नौकरियां खत्म हो जाएंगी. 

- बकौल ट्रंप, समझौता चीन और भारत समेत बाकी देशों के लिए नरम रवैया रखता था, जबकि यूएस को सबसे ज्यादा जिम्मेदारी लेनी पड़ रही थी. 

- ट्रंप ने ऐसे किसी समझौते को अमेरिका फर्स्ट के खिलाफ बताते हुए कहा कि देश को अपनी शर्तों पर जीना चाहिए. 

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पिछले टर्म में क्या किया

डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2017 में ही एलान किया कि देश पेरिस समझौते से बाहर निकल जाएगा. साल 2020 में यह लागू भी हो गया, हालांकि अगले ही साल सत्ता बदलने पर बाइडेन सरकार ने खुद को इससे फिर एक बार जोड़ लिया. अब दोबारा ट्रंप पीछे हट चुके. पहले भी उन्होंने एनर्जी के पारंपरिक स्त्रोतों जैसे तेल और नेचुरल गैस के खर्च को बढ़ावा दिया. कोयला उद्योग के लिए कई नियमों में छूट दी, जैसे पॉल्यूशन कंट्रोल से सख्ती हटाई. यहां तक कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कई बार ग्लोबल वार्मिंग को भ्रम बताते हुए कह दिया कि इसे फालतू में मुद्दा बनाया जा रहा है.

कहां-कहां हो सकता है बदलाव 

अप्रैल 2024 में अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) ने ऐसा नियम बनाया जिसमें कोयला प्लांट्स को नई तकनीक अपनाने को कहा जा रहा है ताकि ग्रीन हाउस गैस कम बने. अगर कोई ऐसा न करे तो उसका प्लांट बंद कर दिया जाएगा. बाइडेन प्रशासन का अनुमान था कि इससे साल 2047 तक कार्बन उत्सर्जन में काफी कमी आ जाएगी. ट्रंप इसे बदल सकते हैं ताकि अमेरिकियों को कम कीमत पर बिजली मिल सके. इसके अलावा ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में भी बदलाव का इशारा ट्रंप दे चुके. कुल मिलाकर उनके टर्म में देश को खुली छूट होगी कि वे चाहे जितना प्रदूषण करें, लेकिन पैसे बना सकते हैं. 

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क्या वाकई प्रदूषण में यूएस का कोई हाथ नहीं

नए राष्ट्रपति क्लाइमेट चेंज को चाहे जितना गैरजरूरी बताएं, ये तो तय है कि अमेरिका का ग्लोबल पॉल्यूशन में बड़ा योगदान रहा. साल 2022 में यूएस का ग्लोबल प्रदूषण में 14 प्रतिशत हिस्सा रहा. ये तब हुआ, जब बाइडेन पेरिस एग्रीमेंट से जुड़े हुए थे.

ऐतिहासिक रूप से भी अमेरिका सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले देशों में रहा. साल 1850 से उसके कारखाने ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार रहे. यहां तक कि दुनिया में हो रहे कुल पॉल्यूशन में 20 फीसदी अमेरिकी देन था. तो इसका मतलब ये है कि अमेरिका को अपना फैलाया रायता समेटना भी चाहिए था, लेकिन वो बार-बार इससे बचता रहा. 

ट्रंप का कदम क्या असर डाल सकता है

पेरिस समझौते से अमेरिका का बाहर होना अगले साल औपचारिक तौर पर लागू हो जाएगा. साल 2026 की शुरुआत में ही यूएन की एक बड़ी मीटिंग है, जिसमें कई मुद्दों पर बात होगी. साथ ही ये भी देखा जाएगा कि आगे क्या किया जाए. अमेरिका इसमें शायद ही शामिल हो, और होता भी है तो ये रस्म अदायगी से ज्यादा नहीं होगा. उसे सालाना अपडेट देने की जरूरत नहीं रहेगी कि पॉल्यूशन पर उसने कितना कंट्रोल किया. कोयला और गैस जैसे रिसोर्सेज का वो दिल खोलकर इस्तेमाल कर सकेगा.

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चूंकि यूएस बड़ा पॉल्यूटर रहा, लिहाजा उसके पीछे हटना ग्लोबल उद्देश्य पर भी बड़ा प्रभाव डालेगा. 

क्या बाकी देश भी समझौते से दूर होना चाहेंगे

अमेरिका दुनिया के लिए लगभग रोल मॉडल है. वो जो करता है, असर बाकियों पर भी होता है. अब पेरिस एग्रीमेंट को लेकर भी ये डर दिख रहा है. उसका बाहर होना, उसके पदचिन्हों पर चलते कई और देशों को भी उकसा सकता है. द कन्वर्सेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइली ने हाल में क्लाइमेट चेंज को सोशलिस्ट झूठ बताते हुए उसपर नाराजगी दिखाई. आशंका है कि कई और देश भी इस रास्ते पर चल सकते हैं. 

यूरोप हो सकता है नया लीडर

हालांकि हर मुश्किल में सबक देखने वाले लोग यहां भी कुछ अच्छा देख रहे हैं. माना जा रहा है कि अमेरिका का एग्रीमेंट से जाना, बाकी देशों को मजबूती से जोड़ेगा. चूंकि विरोध करने वाला कोई खास होगा नहीं, तो काम भी आसानी से होगा और ट्रांसपरेंसी भी रहेगी. ये भी हो सकता है कि यूरोपियन यूनियन खाली जगह को भरे. यूरोप पहले भी पर्यावरण को लेकर ज्यादा संजीदा रहा, ऐसे में उसका लीडरशिप रोल में आना फायदेमंद हो रहेगा. साथ ही एक उम्मीद ये भी है कि ट्रंप के कार्यकाल के बाद नए राष्ट्रपति दोबारा एग्रीमेंट से जुड़ जाएंगे. 

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