
47वें अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव हो चुका. डोनाल्ड ट्रंप के पद संभालने में अभी लगभग दो महीने का समय बाकी है. तब तक जो बाइडेन की ओपल ऑफिस से देश का कामकाज संभालेंगे. पुराने राष्ट्रपति के जाने और नए के आने के बीच का समय लेम-डक पीरियड कहलाता है. इस समय मौजूदा राष्ट्रपति कोशिश करता है कि सत्ता शांतिपूर्ण तरीके से ट्रांसफर हो सके. लेकिन क्या वे ऐसे फैसले ले सकता है जो विवादास्पद हैं. जैसे ट्रंप अबॉर्शन के सख्त खिलाफ हैं. तो क्या जाते-जाते बाइडेन ऐसा कोई नियम बना सकते हैं, जिससे यूएस में गर्भपात को कानूनी हामी मिल जाए?
आने-जाने के बीच इतना लंबा फर्क क्यों
दो राष्ट्रपति के आने-जाने के बीच का समय यानी लेम-डक पीरियड अमेरिका में कुछ ज्यादा ही लंबा है. बाकी देशों में भी सत्ता बदलने के बीच एक ट्रांजिशन दिया जाता है, लेकिन मियाद इतनी लंबी नहीं होती. यूएस में ढाई महीने के अंतर की वजह भी है. यहां नए राष्ट्रपति को अपनी पूरी प्रशासनिक टीम को नए सिरे से बनाना पड़ता है, जिसमें लगभग चार हजार नियुक्तियां शामिल हैं. यहां तक कि अगर राष्ट्रपति-इलेक्ट वर्तमान राष्ट्रपति की ही पार्टी का हो, तब भी वे अपनी अलग टीम लाता है. इसमें लंबा समय लगता है इसलिए ट्रांजिशन पीरियड भी लंबा दिया गया.
लेम-डक पीरियड के दौरान मौजूदा राष्ट्रपति के पास संवैधानिक रूप से सारे अधिकार होते हैं. ऐसे में वो चाहे तो अहम फैसले भी ले सकता है, जिसमें विदेश नीति से लेकर बड़े घरेलू निर्णय भी शामिल हैं. लेकिन इस निर्णय की वैधता यानी वो कितने समय के लिए लागू हो सकेगा, या कितना प्रैक्टिकल है, इसकी सीमाएं होती हैं. मिसाल के तौर पर मौजूदा प्रेसिडेंट ऐसा कोई फैसला लें, जिसके लागू होने में ही कई महीने या साल लगने वाला हो, तो ऐसे में उसका कोई मतलब नहीं रह जाता. अगर वो बात आने वाले राष्ट्रपति को पसंद न आए, या उसकी सोच से अलग हो, तो कुर्सी संभालते ही वो उसे खारिज कर सकता है.
ठन चुकी ओबामा और ट्रंप के बीच
वर्तमान राष्ट्रपति के पास संवैधानिक अधिकार है कि वो अपने कार्यकाल के आखिरी समय तक नए समझौते, नई डील कर सकता है लेकिन इसपर अक्सर विवाद हो जाता है. खासकर अगर डिसीजन नए लीडर की प्राथमिकताओं से मेल न खाता हो.
इसका एक उदाहरण बराक ओबामा से ट्रंप के बीच सत्ता ट्रांसफर में दिखा. साल 2016 में ओबामा ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में रूस की कथित दखलंदाजी पर सख्त कदम उठाते हुए उसपर कई प्रतिबंध लगाए. साथ ही लगभग 35 रूसी राजनयिकों को देश से निष्कासित कर दिया, जिन्हें जासूस माना जा रहा था. कई रूसी संपत्तियां फ्रीज भी कर दी गई.
ट्रंप ने ऑफिस संभालते ही ओबामा के इस फैसले का विरोध किया. साथ ही पाबंदियों में कुछ राहत दे दी, हालांकि उन्हें पूरी तरह से नहीं हटाया लेकिन उनके प्रशासन की नीति रूस के लिए काफी नरम रही. इससे यह साफ हो गया कि एक ही देश के दो राष्ट्रपति दूसरे देश को लेकर एक ग्राउंड पर नहीं हैं.
ट्रांजिशन पीरियड के दौरान लिए गए फैसलों की सीमाएं होती हैं
इस दौरान मौजूदा राष्ट्रपति को खयाल रखना होता है कि उनके लिए गए फैसले जनता और राजनीतिक सहयोगियों के बीच कितने पसंद किए जाएंगे. अगर ऐसा नहीं हो तो जाते हुए भी राजनैतिक दबाव बनेगा और पॉलिटिकल करियर में धब्बा लग सकता है. चूंकि मौजूदा राष्ट्रपति के पास सीमित समय है इसलिए बड़े फैसले लागू करना प्रैक्टिकल नहीं है. नया राष्ट्रपति अगर आते ही उसे रद्द कर दे तो इसमें लगे रिसोर्स बर्बाद हो सकते हैं. कुछ बड़े फैसलों के लिए द्विपक्षीय सहयोग जरूरी है जो लेम-डक फेज में मुश्किल है क्योंकि तब नए राष्ट्रपति के आने की तैयारियां चल रही होती हैं.
ट्रंप ने आते ही कौन से बड़े फैसले पलटे
- ओबामा प्रशासन ने 2015 में पेरिस जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, ट्रंप से इसे रद्द कर दिया.
- हेल्थकेयर की सुविधा पर बना कानून, जिसे ओबामाकेयर भी कहते थे, ट्रंप प्रशासन ने उसे कमजोर कर दिया.
- साल 2015 में ईरान के साथ परमाणु समझौता हुआ था, जिसे खारिज करते हुए ट्रंप ने यह तक कह दिया कि ये देश का सबसे खराब समझौता रहा.
- इमिग्रेशन पर भी ओबामा सरकार में ढिलाई थी, जिसे ट्रंप सरकार ने बदल दिया.