
लोकसभा चुनाव के लिए पर्चा भरने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी. अगर वोटर ये जानना चाहें कि उनकी लोकसभा सीट से इलेक्शन लड़ रहे उम्मीदवार कितने दौलतमंद हैं, या उनके खिलाफ कोई मुकदमा है क्या, तो ये सारी जानकारी एफिडेविट को डाउनलोड करके हासिल की जा सकती है. अगर किसी को शक हो कि बताई गई बातों में कुछ हेरफेर है तो इलेक्शन कमीशन में इसकी कंप्लेन भी की जा सकती है.
क्या है एफिडेविट
ये एक कानूनी दस्तावेज है, जो किसी के बारे में कई तरह की सूचनाएं देता है. सूचना किस तरह की है, ये इसपर निर्भर करता है कि हलफनामे किस काम के लिए दिया जा रहा है. ये केवल नामांकन भर रहे नेताओं पर ही नहीं, आम लोगों पर भी लागू होता है. मसलन, अगर किसी दस्तावेज में नाम गलत आ जाए, या प्रॉपर्टी की बात हो, या फिर कॉलेज में एडमिशन- हर जगह इसी जरूरत होती है.
प्रत्याशियों के मामले में क्यों है बहुत जरूरी
चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार, चाहे वो विधानसभा स्तर पर हो, या राष्ट्रीय, एफिडेविट देना होता है, जिसे फॉर्म 26 कहते हैं. इसमें उसे रिश्ते, संपत्ति, देनदारियों, पढ़ाई-लिखाई जैसी बातों की जानकारी देनी होती है. साथ ही अगर कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड हो तो उसे भी साफ करना होगा. एफिडेविट का कोई भी कॉलम खाली नहीं छोड़ना होता. अगर किसी कॉलम में मांगी हुई जानकारी लागू नहीं होती तो वहां शून्य या लागू नहीं लिखना होता है.
ये इसलिए है ताकि वोट करने से पहले मतदाता पूरी तरह से साफ हो सकें कि उन्हें किसे वोट करना है, किसे नहीं. ये ठीक वैसा ही है, जैसे अपने घरों में शादी करते हुए हम दूसरे पक्ष की पड़ताल करते हैं. छवि ठीक होने पर ही रिश्ता करते हैं.
गलत जानकारी देने पर क्या एक्शन
कई बार उम्मीदवार सारी बातें सही-सही नहीं बताते. इसकी पुष्टि होने पर द रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट (RPA) 1951 की धारा 125ए के तहत अधिकतम 6 महीने की सजा हो सकती है. साथ में जुर्माना भी लगाया जा सकता है. लेकिन इससे कैंडिडेट को चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता. हालांकि RPA का सेक्शन 8ए कहता है कि अगर उम्मीदवार करप्ट प्रैक्टिस करता हो, यानी रिश्वत या फिर वोट के लिए धमकियां देता हो तो उसे चुनाव में शामिल होने से रोका भी जा सकता है.
इसी करप्ट प्रैक्टिस की परिभाषा पर विवाद भी है. बहुत से नेताओं का कहना है कि गलत जानकारी देने पर सजा बढ़ाई जानी चाहिए, खासकर आपराधिक मामलों को छिपाने वालों पर. साथ ही चुनाव लड़ने पर भी रोक लगनी चाहिए ताकि केवल साफ छवि वाले लोग ही लीडर हो सकें.
पार्लियामेंट्री कमेटी ने की कड़ी सजा की सिफारिश
इसे लेकर पिछले साल ही एक संसदीय कमेटी ने भाजपा सांसद सुशील मोदी की अध्यक्षता में रिपोर्ट सौंपी थी.
कमेटी ने सिफारिश की कि गलत चुनावी हलफनामा दायर करने की मौजूदा सजा को बढ़ा दिया जाना चाहिए.
उसका कहना था कि सजा की गंभीरता, अपराध की गंभीरता के आधार पर होनी चाहिए, न कि तयशुदा.
पार्लियामेंट्री कमेटी ने गलत जानकारी वाले मामले को 8(1) के तहत रखने को कहा.
ये वो सेक्शन है, जो उम्मीदवार को चुनाव के लिए अयोग्य बनाता है. फिलहाल इस रिकमंडेशन पर फैसला लंबित है.
क्या होता है क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले कैंडिडेट्स का
आमतौर पर पार्टियां खुद ही ऐसे लोगों को टिकट देने से बचती रहीं, खासकर अगर मामला काफी उछला हुआ हो. लेकिन अब ऐसी इमेज वाले भी काफी उम्मीदवार मैदान में आने लगे हैं. कई बार लोग दागी उम्मीदवारों का इतिहास नहीं जानते हुए उसे वोट कर देते हैं. मतदाता सोच-समझकर वोट दें, इसके लिए चुनाव आयोग ने बड़ा फैसला लिया. न केवल हलफनामे में क्रिमिकल रिकॉर्ड की बात बतानी होती है, बल्कि दागी उम्मीदवारों को 3 बार अपने आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी अखबार में देनी होगी.
क्या आप भी कर सकते हैं शिकायत
आमतौर पर चुनावी हलफनामे में गलत सूचनाओं संबंधित शिकायतें कोर्ट में दायर की जाती हैं. जिसे भी शक हो कि फलां जानकारी गलत है, वो उस तरह के प्रमाणों के साथ जनप्रतिनिधि कानून 1951 की धारा 125 के तहत जरूरी कार्रवाई के लिए अदालत में ऐसी शिकायत दर्ज करा सकता है. अगर आप भी अपने क्षेत्र के कैंडीडेंट्स का लेखा-जोखा चाहते हैं तो इंटरनेट पर जाकर चुनाव आयोग की वेबसाइट https://www.eci.gov.in/affidavit-portal पर जाना है. यहां पर उम्मीदवारों का हलफनामा देखा जा सकता है.
आम लोग भी नहीं दे सकते फर्जी जानकारी
झूठा हलफनामा फाइल करने पर आम लोगों को भी सजा हो सकती है. इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 के तहत अगर ये पाया जाए कि किसी ने अपनी कोई पब्लिक जानकारी झूठी दी तो सजा हो सकती है. सजा की अवधि इसपर निर्भर है कि झूठी जानकारी के चलते कितना नुकसान हुआ, या हो सकता था. आईपीसी के भी सेक्शन 193 में इसे ऑफेंस माना गया है. इसके लिए 3 से 5 साल तक सजा हो सकती है. कई मामलों में ये सजा बढ़कर 7 साल भी हो सकती है.