
मध्य प्रदेश कई दिन से भीग रहा है. महाराष्ट्र-गुजरात डूब रहा है. तमिलनाडु में हालात बिगड़ते जा रहे हैं. राजधानी दिल्ली के भी कुछ इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति बनी. पिछले हफ्ते महाराष्ट्र के पुणे में बाढ़ से हालात इतने बिगड़ गए थे कि सेना को उतारना पड़ गया था. फिर भी कई राज्य ऐसे हैं जहां सामान्य से थोड़ी कम-ज्यादा बारिश ही हुई है. जबकि, कुछ राज्य तो ऐसे भी हैं जो पानी को तरस रहे हैं.
भारत में कई जगह मूसलाधार बारिश और बाढ़ के हालातों के बीच एक सरकारी रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है. जल आयोग की रिपोर्ट में बताया गया बीते 37 साल में बाढ़ की वजह से देशभर की 2 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा की जमीन तबाह हो गई है.
बाढ़ प्रभावित इलाकों पर आई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 1986 से 2022 के बीच 712 जिलों की 2.05 करोड़ हेक्टेयर जमीन बर्बाद हो गई है. इसे ऐसे समझिए कि 37 साल में बाढ़ से जितनी जमीन बर्बाद हुई है, वो गुजरात के क्षेत्रफल से भी ज्यादा है. गुजरात का क्षेत्रफल 1.96 लाख वर्ग किमी है, जबकि बाढ़ से 2.05 करोड़ हेक्टेयर यानी 2 लाख वर्ग किमी की जमीन बर्बाद हो चुकी है.
नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) के मुताबिक, बाढ़ के मामले में भारत कुछ ज्यादा ही संवेदनशील है. भारत के कुल क्षेत्रफल 32.87 लाख वर्ग किमी में से 4 लाख वर्ग किमी का इलाका ऐसा है, जहां बाढ़ का खतरा बना रहता है.
बाढ़ से भारत कितना प्रभावित?
अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरे नंबर पर है, जहां सबसे ज्यादा प्राकृतिक आपदाएं आती हैं. इनमें भी बाढ़ सबसे खतरनाक है.
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि बाढ़ का सबसे बुरा असर चीन और भारत पर पड़ता है. भारत में हर साल कम से कम 17 जगहों पर बाढ़ आती है. इससे 34.5 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं. जबकि, चीन में हर साल औसतन 20 इलाकों में बाढ़ आती है और इसका असर 90 करोड़ लोगों पर पड़ता है.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, 2011 से 2020 तक बाढ़ की वजह से हर साल औसतन 15सौ भारतीयों की मौत हुई है. हालांकि, सरकारी आंकड़े इससे थोड़े अलग हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2017 से 2022 के बीच छह साल में बाढ़ ने 4,106 लोगों की जान ली है. यानी, हर साल औसतन 684 लोगों की मौत हुई.
बाढ़ से कितने बुरे हालात?
भारत दुनिया के उन देशों में है जहां बाढ़ से हालात बहुत ज्यादा खराब हैं. पिछले हफ्ते आई जल आयोग की रिपोर्ट बताती है कि 1986 से 2022 के बीच 2 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा की जमीन बाढ़ से प्रभावित हुई है.
रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी और बिहार के सारे के सारे जिले बाढ़ प्रभावित हैं. यूपी के 75 जिलों का 50 लाख हेक्टेयर से ज्यादा की जमीन बाढ़ से प्रभावित है. वहीं, बिहार के 38 जिलों की 29 लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन प्रभावित हुई है. जबकि, असम के सभी 33 जिलों का 24 लाख हेक्टेयर से ज्यादा इलाका बाढ़ से प्रभावित है. यानी, देश में बाढ़ प्रभावित जितना इलाका है, उसका आधा इन्हीं तीन राज्यों में है.
इनके अलावा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे तटीय राज्यों पर भी बाढ़ का खतरा बना रहता है.
ये नदियां बनती हैं बाढ़ का कारण
- गंगा नदीः उत्तराखंड के हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैली गंगा भारत की सबसे बड़ी नदी है. ये ढाई हजार किलोमीटर लंबी नदी है. गंगा नदी के कारण उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में बाढ़ आती है. जल आयोग के मुताबिक, गंगा बेसिन में पड़ने वाले राज्यों का 54% इलाका बाढ़ प्रभावित है.
- ब्रह्मपुत्रः चीन से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र दुनिया की नौंवीं सबसे लंबी नदी है. ब्रह्मपुत्र हर साल में असम में बाढ़ का कारण बनती है. ब्रह्मपुत्र के कारण भारत का 13% इलाका बाढ़ प्रभावित है. इस साल भी ब्रह्मपुत्र के कारण असम में बाढ़ आई. इस साल असम में बाढ़ के कारण 66 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित हुए.
- कोसीः नेपाल के हिमालय से निकलने से निकलने वाली कोसी नदी बिहार के लिए हर साल आफत लाती है. खासकर सहरसा, सुपौल, मधेपुरा और आसपास के जिलों में. कोसी नदी की लंबाई 720 किलोमीटर है, जिसमें से 260 किमी नेपाल और 460 किमी बिहार में बहती है. कोसी को बिहार की लाइफलाइन भी माना जाता है, लेकिन इसकी वजह से हर साल बाढ़ भी आती है.
- नर्मदाः मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से गुजरने वाली नर्मदा भारत के अंदर बहने वाली तीसरी सबसे लंबी नदी है. इसकी लंबाई 13सौ किलोमीटर से ज्यादा है. हर साल बारिश के कारण नर्मदा की वजह से मध्य प्रदेश और गुजरात के कई इलाकों में बाढ़ आती है.
- कावेरी और गोदावरीः कर्नाटक से निकलने वाली कावेरी नदी तमिलनाडु से होकर गुजरती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है. ये लगभग 800 किमी लंबी है. कावेरी के कारण कर्नाटक और तमिलनाडु में बाढ़ का खतरा बना रहता है. वहीं, गोदावरी महाराष्ट्र के नासिक से निकलती है और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से गुजरती है. गोदावरी 1,465 किमी लंबी है.
... लेकिन अब भी कई इलाके सूखे
भारत में मॉनसून का सीजन जून से सितंबर तक होता है. मॉनसून को लगभग दो महीने होने वाले हैं. इन दो महीनों में देश के कई इलाकों में तो बारिश जमकर हो रही है, लेकिन अब भी ज्यादातर इलाके ऐसे हैं जो सूखे हैं.
मौसम विभाग के मुताबिक, देशभर के 729 जिलों में से 214 यानी 30% जिले ऐसे हैं, जहां बहुत जमकर बारिश हुई है. जबकि, 237 यानी 33% जिलों में सामान्य बारिश हो चुकी है. लेकिन 279 यानी 37% जिले ऐसे भी हैं जहां अब तक बहुत कम बारिश हुई है. इनमें ज्यादातर यूपी, बिहार, झारखंड और बंगाल जैसे राज्य हैं.
कई इलाकों में बहुत कम बारिश होने के बावजूद इन राज्यों में बाढ़ जैसी स्थिति बनी है. उसकी वजह ये है कि यहां एक ही दिन में बहुत ज्यादा बारिश हो गई. इसे फ्लैश फ्लड कहा जाता है. कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने के कारण पानी को निकलने की जगह नहीं मिल पाती और इससे बाढ़ आ जाती है. बीते कई सालों में ये ट्रेंड ज्यादा बढ़ा है.
पर ऐसा क्यों हो रहा?
दरअसल, मॉनसून का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनियाभर के कई हिस्सों में यही ट्रेंड देखने को मिल रहा है.
सालों पहले तक ऐसा होता था कि चार महीने तक बारिश होती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं होता. अब कुछ ही समय में बहुत ज्यादा बारिश हो जाती है. कम समय में जरूरत से ज्यादा बारिश होने पर बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं.
मौसम विभाग ने 1989 से 2018 तक के साउथ वेस्ट मॉनसून के डेटा का एनालिसिस कर मार्च 2020 में अपनी रिपोर्ट पेश की थी. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि देश के कई राज्यों में मॉनसून का पैटर्न बदल रहा है. इन 30 सालों में (1989 से 2018) उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मेघालय और नागालैंड में साउथ वेस्ट मॉनसून में भारी कमी देखी गई है.
या तो बारिश ही कम हो रही है, या फिर कम समय में ज्यादा बारिश हो रही है, दोनों ही कारणों से सूखा बढ़ रहा है. 1951 से 2016 के बीच हर दशक में औसतन 2 से ज्यादा बार सूखे का अनुभव हुआ है. इसी दौरान सूखे से प्रभावित इलाकों में भी हर दशक 1.3% की बढ़ोतरी हुई है.
बारिश कैसे कम होती जा रही है? इसे ऐसे भी समझिए. मौसम विभाग के मुताबिक, 1961 से 2010 के बीच हर साल औसतन 1176.9 मिमी बारिश हुई थी. वहीं, 1971 से 2020 के बीच 1160.1 मिमी बारिश हुई.
बारिश कम होने की वजह से अब सामान्य बारिश को मापने का स्तर भी कम हो गया है. पहले साउथ वेस्ट मॉनसून सीजन में 880.6 मिमी बारिश को सामान्य माना जाता था. लेकिन अब 868.6 मिमी बारिश को सामान्य माना जाता है.