
भारत ने विदेशी सरकारों को दी जाने वाली मदद में कटौती कर दी है. ये कटौती 850 करोड़ रुपये से ज्यादा की है. सबसे ज्यादा कटौती मालदीव की फंडिंग में की है. मालदीव के अलावा भूटान की फंडिंग में भी कटौती हुई है. दूसरी ओर, श्रीलंका को दी जाने वाली आर्थिक मदद में 300% से ज्यादा की बढ़ोतरी कर दी है.
23 जुलाई को पेश हुए मोदी सरकार 3.0 के पहले बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया है कि 2024-25 में विदेशी सरकारों को भारत 5,668 करोड़ रुपये की मदद करेगा. जबकि, 2023-24 में सरकार ने लगभग 6,542 करोड़ रुपये की मदद की थी. इस हिसाब से 2023-24 की तुलना में भारत ने 2024-25 में विदेशी सरकारों को दी जाने वाली आर्थिक मदद में 874 करोड़ रुपये की कटौती कर दी है.
किसमें कितनी कटौती हुई?
बजट दस्तावेज के मुताबिक, सबसे ज्यादा कटौती मालदीव की फंडिंग में ही हुई है. मालदीव को मिलने वाली आर्थिक मदद में 370 करोड़ रुपये की कटौती कर दी गई है.
2023-24 में सरकार ने मालदीव को 770 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद दी थी. लेकिन 2024-25 में सरकार ने मालदीव के लिए 400 करोड़ रुपये का फंड रखा है. हालांकि, अभी ये सिर्फ अनुमान है और इसमें कम-ज्यादा भी हो सकता है.
मालदीव के बाद सबसे ज्यादा कटौती भूटान की हुई है. नेपाल वो देश है, जिसकी भारत सबसे ज्यादा मदद करता है. 2023-24 में भारत ने भूटान को 2,399 करोड़ रुपये की मदद की थी, जबकि 2024-25 में उसे 2,068 करोड़ रुपये की मदद मिलेगी.
दूसरी तरफ, श्रीलंका को मिलने वाली आर्थिक मदद चार गुना से ज्यादा बढ़ी है. श्रीलंका को 2023-24 में भारत ने 60 करोड़ रुपये की ही मदद की थी. जबकि, 2024-25 में भारत उसकी 245 करोड़ रुपये की मदद करेगा.
भारत ने अपने पड़ोसियों में से मालदीव, भूटान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार की फंडिंग में कटौती की है. वहीं नेपाल और श्रीलंका को मिलने वाली आर्थिक मदद बढ़ाई गई है.
मालदीव की फंडिंग में कटौती क्यों?
बजट दस्तावेजों के मुताबिक, पांच साल में भारत ने मालदीव को लगभग 17सौ करोड़ रुपये की मदद दी है. इसके अलावा, अगले सालभर में 400 करोड़ रुपये और देगा. इस हिसाब से भारत के लिए मालदीव अहम रहा है. भारत हमेशा से मालदीव की मदद करते आया है. ये सिलसिला 1965 में मालदीव की आजादी के साथ ही शुरू हो गया है. भारत उन देशों में से एक था, जिसने सबसे पहले मालदीव को मान्यता दी थी.
मालदीव कई सारी जरूरतों के लिए भारत पर निर्भर है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया मालदीव का बड़ा फाइनेंसर रहा है. एसबीआई की बदौलत ही मालदीव की अर्थव्यवस्था मजबूत होती गई. इसके अलावा, मालदीव का बुनियादी ढांचा विकसित करने में भी भारत ने काफी मदद की है. भारत ने वहां अस्पताल से लेकर क्रिकेट स्टेडियम, ब्रिज, रोड, मस्जिद और कॉलेज तक बनाया है.
लेकिन अब मालदीव की फंडिंग में बड़ी कटौती हो गई है. ये कटौती ऐसे समय हुई है, जब भारत और मालदीव के रिश्ते पहले की तरह नहीं हैं. पिछले साल नवंबर में मोहम्मद मुइज्जू के राष्ट्रपति बनने के बाद से भारत और मालदीव के रिश्तों में खटास आई है.
ये खटास तब और बढ़ गई थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्षद्वीप दौरे के बाद मालदीव सरकार के तीन मंत्रियों ने पीएम मोदी और भारत के खिलाफ टिप्पणी की थी. इतना ही नहीं, मुइज्जू को चीन का समर्थक भी माना जाता है.
मुइज्जू से पहले इब्राहिम मोहम्मद सोलिह मालदीव के राष्ट्रपति थे. सोलिह को भारत का करीबी माना जाता है. उनके दौर में भारत और मालदीव के रिश्ते भी बेहतर हुए थे. तब भारत ने मालदीव की फंडिंग भी अच्छी खासी बढ़ा दी थी.
अब माना जा रहा है कि मुइज्जू के सत्ता में आने से दोनों मुल्कों के बीच बढ़ी खटास को ही फंडिंग में कटौती को बड़ी वजह माना जा रहा है.
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आर्थिक मदद से चीन को चुनौती!
- भूटानः चारों ओर से जमीन से घिरा हुआ भूटान अब चीन के करीब जाता दिख रहा है. चीन के साथ सीमा विवाद सुलझाने को लेकर बातचीत अंतिम दौर में है. भूटान ऐसा देश है, जिसे भारत सबसे ज्यादा मदद देता है. इस साल भारत ने भूटान के लिए दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का फंड रखा है.
- नेपालः भूटान के बाद नेपाल ऐसा देश है, जिसे भारत सबसे ज्यादा मदद करता है. नेपाल में पिछले साल भारत ने 650 करोड़ रुपये खर्च किए थे और इस साल 700 करोड़ खर्च करेगा. नेपाल में भी कुछ साल में चीन का दखल बढ़ा है और वहां चीन ने अरबों डॉलर खर्च किए हैं.
- बांग्लादेशः भारत का सबसे अच्छा पड़ोसी है. 2009 से वहां शेख हसीना की अगुवाई वाली आवामी लीग पार्टी की सरकार है, जिसे 'प्रो-इंडिया' माना जाता है. लेकिन वहां की अर्थव्यवस्था भी अब खराब हो रही है और उसकी मदद के लिए चीन आगे आ रहा है. चीन ने हाल ही में कहा था कि वो बांग्लादेश के विदेशी मुद्रा भंडार के संकट में उसके साथ खड़ा है. बांग्लादेश बीआरआई का सदस्य भी है. बांग्लादेश में भारत इस साल 120 करोड़ रुपये खर्च करेगा. ये पिछले साल के मुकाबले 10 करोड़ कम है.
- म्यांमारः साल 2017 से म्यांमार चीन के बीआरआई का सदस्य है. उस पर चीन का कर्ज बढ़ता जा रहा है. इतना ही नहीं, म्यांमार की सियासत और अर्थव्यवस्था में भी चीन का दखल बढ़ा है. म्यांमार में तीन साल से सेना ही सरकार चला रही है. इस दौरान उसकी करीबी चीन से और बढ़ी है. चीन का मुकाबला करने के लिए भारत वहां भी हर साल करोड़ों रुपये खर्च करता है. इस साल म्यांमार के लिए भारत ने 250 करोड़ रुपये का फंड रखा है.
- श्रीलंकाः महिंदा राजपक्षे की सरकार में श्रीलंका चीन के बहुत करीब चला गया था. नतीजा ये हुआ कि चीन के कर्ज के तले उसकी अर्थव्यवस्था तबाह हो गई. श्रीलंका भी बीआरआई का सदस्य है. 2022-23 में भारत ने श्रीलंका के लिए 150 करोड़ रुपये रखे थे, लेकिन 60 करोड़ ही खर्च किए. इस साल भारत ने 245 करोड़ रुपये श्रीलंका के लिए रखे हैं.
- अफगानिस्तानः यहां भारत कई सारे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है. तालिबान का शासन आने के बावजूद भारत ने इससे दूरी नहीं बनाई है. इसे ऐसे समझिए कि अफगानिस्तान को दी जाने वाली मदद में बहुत ज्यादा कटौती नहीं हुई है. भारत ने 2023-24 में अफगानिस्तान में 220 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जबकि 2024-25 के लिए 200 करोड़ रुपये का बजट रखा है.
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पड़ोसियों को साथ रखना क्यों जरूरी?
एक समय था जब भारत दूसरे देशों से आर्थिक मदद मांगता था, लेकिन कुछ सालों में भारत ने खुद को बड़े 'डोनर' के रूप में तब्दील कर लिया है. भारत ने दुनिया के कई हिस्सों में देशों को विकास के लिए आर्थिक सहायता दी है.
भारत जिन देशों को आर्थिक मदद देता है, उनमें लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी देश भी शामिल हैं. लेकिन भारत से सबसे ज्यादा मदद साउथ एशियाई देशों को मिलती है.
पाकिस्तान को छोड़ दिया जाए तो भारत ने अपने सभी पड़ोसियों पर बीते सालों में हजारों करोड़ रुपये खर्च किए हैं. दरअसल, देखा जाए तो दक्षिण एशिया चीन और भारत के लिए एक 'जंग का अखाड़ा' भी बनता जा रहा है.
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए चीन सभी दक्षिण एशियाई देशों तक पहुंच चुका है. ऐसा करके उसने भारत को चारों तरफ से घेर रखा है. ऐसे में इन देशों में चीन का प्रभाव कम करने के लिए भारत को आर्थिक मदद देना जरूरी है.
यही वजह है कि भूटान और नेपाल से लेकर म्यांमार और मालदीव तक में भारत हजारों करोड़ रुपये खर्च करता है.
कहां खर्च होता है ये पैसा?
भारत लंबे समय से पाकिस्तान को छोड़कर बाकी सभी दक्षिण एशियाई देशों को आर्थिक मदद दे रहा है. भारत से मिलने वाली ये मदद वहां के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च होती है. इससे वहां स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, सड़क, पुल, रेल नेटवर्क वगैरह तैयार किया जाता है.
एनडीए सरकार आने के बाद साउथ एशियाई देशों को दी जाने वाली आर्थिक मदद काफी बढ़ी है. एनडीए सरकार 'नेबर फर्स्ट पॉलिसी' के जरिए पड़ोसियों को अपने साथ रखने की कोशिश कर रही है. उसकी वजह चीन भी है, क्योंकि धीरे-धीरे ही सही लेकिन इन देशों में चीन का दखल बढ़ा है. और चीन के प्रभाव को कम करने के लिए भारत को इन देशों को अपने करीब रखना जरूरी है.