
वाइट हाउस ने हाल ही में रूस की स्टेट मीडिया पर आरोप लगाया कि वो अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों पर असर डालने की कोशिश कर रहा है. साल 2020 में हुए इलेक्शन के दौरान भी अमेरिका ने यही इलजाम लगाया था. आरोप कितने सही या गलत हैं, इसे छोड़ भी दें तो ये सच है कि बहुत से देश दूसरों के इलेक्शन पर असर डालने की कोशिश करते रहे.
बहुत से देश अपने पड़ोसियों या दुश्मन देशों के चुनाव में दखल देते रहे. इसमें सबसे ऊपर अमेरिका रहा. एक किताब 'मेडलिंग इन द बैलट बॉक्स' के लेखक डव एच लेविन कहते हैं कि साल 1946 से लेकर 2000 के भीतर दुनिया में लगभग 939 इलेक्शन हुए. इसमें अमेरिका ने 81 फॉरेन इलेक्शन्स के नतीजों पर असर डाला. वहीं रूस (तब सोवियत संघ) ने 36 चुनावों से छेड़खानी की. यानी कुल मिलाकर हर 9 में से 1 देश के चुनाव पर अमेरिका या रूस का असर रहा. कम से कम किताब में यही बताया गया है.
प्रत्यक्ष दखल से बचते हैं सभी
कोई भी देश फॉरेन इलेक्टोरल इंटरवेंशन सीधे-सीधे नहीं करता ताकि उसकी इमेज खराब न हो. वो चुपके से चुनावों पर असर डालता है. ये भी दो तरीकों से होता है. जब विदेशी ताकतें तय करती हैं कि उन्हें किस एक का साथ देना है. दूसरे तरीके में विदेशी शक्तियां लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव के लिए देशों पर दबाव बनाती हैं. सब कुछ गुपचुप ढंग से ताकि काम भी हो जाए और कोई सुराग भी न मिल सके.
क्या फायदे हैं फॉरेन इलेक्टोरल इन्टरवेंशन के
दूसरे देश के फटे में टांग अड़ाने से वैसे तो सारे देश बचते हैं लेकिन चुनाव अलग मुद्दा है. इसमें जो सरकार चुनकर आती है, उसकी फॉरेन पॉलिसी सिर्फ उसे ही नहीं, पड़ोसियों से लेकर दूर-दराज को भी प्रभावित करती है. वो किससे क्या आयात करेगा, क्या एक्सपोर्ट करेगा, किसका साथ देगा, या किसका विरोध करेगा, ये सारी बातें इसपर तय करती हैं कि वहां सेंटर में कौन बैठा है. ये वैसा ही है, जैसे पावर सेंटर पर किसी दोस्त का होना.
इस बार रूस-अमेरिका के बीच क्या हुआ
यूएस ने रूस से संचालित कई इंटरनेट डोमेन्स का पता लगाया जो यही काम कर रहे थे. साथ ही लगभग 10 लोगों के अमेरिका आने पर पाबंदी लगा दी. द कन्वर्सेशन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सरकार ने साथ ही साथ संबंधित लोगों की यूएस में मौजूद संपत्ति को फ्रीज करने को कह दिया.
मॉस्को बेस्ड मीडिया चैनलों भी घेरे में हैं, जो कथित तौर पर यूएस के कंटेंट क्रिएटर्स को चुनाव पर असर डालने के लिए पैसे दे रहे थे. बता दें कि रूस का झुकाव रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप की तरफ माना जाता रहा है.
दूसरे देश कैसे करते रहे चुनावों में हेरफेर
इनमें से एक है लोकल इंफ्यूएंसरों की मदद लेना. यूएस डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने आरोप लगाया कि रूसी टीवी ने अमेरिका की एक कंपनी को 10 मिलियन डॉलर दिए ताकि वो ऐसे सोशल मीडिया कंटेंट बनाए, जो रूस के हित में हों. यानी ऐसे कैंडिडेट के पक्ष में माहौल बनाए जो रूस से दोस्ती रखता हो.
फेक न्यूज आउटलेट खड़ा किया जाता है
अमेरिका ने कई इंटरनेट डोमेन पकड़े जो झूठी जानकारियां फैला रहे थे. ये किसी एक पार्टी और उसके उम्मीदवारों की विवादित बातों को उधेड़ते थे और ऐसी कहानी बनाते थे कि पढ़ने वाले उसपर यकीन कर लें, या लंबे समय तक वे सूचना को क्रॉस चेक न करें. खास बात ये है कि ऐसे लोग असल और झूठी दोनों ही जानकारियां देते हैं ताकि लोग यकीन करें.
आग में घी डालना भी आजमाया हुआ तरीका
मतलब किसी ऐसे मुद्दे को हवा देना, जो वोटरों के लिए काफी अहम हो. रूसी मीडिया कथित तौर पर पूरी पड़ताल करती है, और फिर अपने टारगेट ग्रुप की चिंताओं को नई-नई सूचनाओं से और बढ़ाती है. मसलन, किसी देश में प्रवासियों का मुद्दा है तो दखल देने वाला देश इस मुद्दे को और उछालेगा ताकि उस उम्मीदवार को वोट मिले, जो प्रवासियों के खिलाफ हो.
साइबर डिसरप्शन से भी लगती रही सेंध
सके तहत खुफिया एजेंसियां अपने हैकर्स के जरिए चुनाव की बड़ी जानकारियां हैक कर लेते हैं. इसके बाद उसमें सेंध लगाना आसान हो जाता है. सिक्योरिटी ब्रीच के बाद गलत प्रेस रिलीज जारी हो सकती है, या फिर डेटा से छेड़छाड़ कर दी जाती है.