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रेवड़ी कल्चर: नेताओं के वादे बेशुमार, लेकिन खजाने पर पड़ रहा है भार, समझें फ्रीबीज की महंगी पॉलिटिक्स

चुनाव आते ही राजनीतिक पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए बड़े-बड़े वादे कर देती हैं. इसे ही राजनीतिक भाषा में फ्रीबीज या रेवड़ी कल्चर कहा जाता है. लेकिन ये रेवड़ी कल्चर की शुरुआत कैसे हुई? इसका राज्यों की आर्थिक सेहत पर क्या असर पड़ता है? चुनावों पर ये मुफ्त की रेवड़ियां कितना असर डालती हैं? जानते हैं...

वोटरों को लुभाने के लिए नेता फ्रीबीज का ऐलान करते रहते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर-AFP) वोटरों को लुभाने के लिए नेता फ्रीबीज का ऐलान करते रहते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर-AFP)
Priyank Dwivedi
  • नई दिल्ली,
  • 18 जून 2023,
  • अपडेटेड 7:50 PM IST

'गरीब की थाली में पुलाव आ गया है...लगता है शहर में चुनाव आ गया है'  भारत की राजनीति पर ये  दो पंक्तियां सटीक टिप्पणी हैं. चुनाव आते ही वोटरों को लुभाने के लिए जिस तरह राजनीतिक दल और उनके नेता वायदों की बरसात करते हैं, उससे एक नया शब्द ‘रेवड़ी कल्चर’ चर्चा में है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में इस रेवड़ी कल्चर को देश के लिए नुकसानदायक परंपरा बता चुके हैं.

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राजस्थान में कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वोटरों को फ्री में स्मार्टफोन और तीन साल के लिए फ्री इंटरनेट का वायदा किया है. इससे पहले गहलोत ने राज्य के हर परिवार को हर महीने 100 यूनिट तक फ्री बिजली फ्री देने का ऐलान किया था. 

राजस्थान के साथ मध्य प्रदेश में भी इस साल चुनाव होने हैं. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कांग्रेस की सरकार बनने पर हर परिवार को 100 यूनिट तक फ्री बिजली देने का वादा किया है. खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी हाल ही में 'लाडली बहना योजना' के तहत सवा करोड़ गरीब महिलाओं के खाते में एक हजार रुपये जमा कराए हैं. अब कांग्रेस कह रही है कि उसकी सरकार आई तो हजार नहीं बल्कि 1,500 रुपये दिए जाएंगे. शिवराज ने युवाओं को लुभाने के लिए 12वीं कक्षा के कुल 9000 टॉपर्स को एक-एक स्कूटी देने का भी ऐलान कर दिया है.

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चुनावी राज्यों में इस तरह 'मुफ्त बांटने' की योजनाएं आम बात है. विरोध करने वाले इन्हें 'फ्रीबीज' और रेवड़ी कल्चर कहते हैं तो समर्थन वाले इन्हें 'कल्याणकारी योजनाएं' बताते हैं. विरोध करने वालों का अक्सर कहना होता है कि इससे सरकारी खजाने पर बोझ पड़ेगा, कर्जा बढ़ेगा और सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए ऐसा किया जा रहा है. तो ऐसी योजनाएं लाने वाले कहते हैं कि इसका मकसद गरीब जनता को महंगाई से राहत दिलाना है. खास बात ये है कि एक पार्टी जिस तरह की योजना को एक राज्य में रेवड़ी कल्चर कहती है, वही दूसरे राज्य में उसे कल्याणकारी योजना कहकर लागू कर रही होती है.

यही तो है 'रेवड़ी कल्चर'...!

बीते साल जब श्रीलंका का आर्थिक संकट सामने आया तो इसने दुनियाभर की सरकारों को चेता दिया. 

सर्वदलीय बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि श्रीलंका से सबक लेते हुए हमें 'मुफ्त के कल्चर' से बचना चाहिए. जयशंकर ने कहा कि श्रीलंका जैसी स्थिति भारत में नहीं हो सकती, लेकिन वहां से आने वाला सबक बहुत मजबूत है. 

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक रैली में ' रेवड़ी कल्चर' पर सवाल उठाए थे. पीएम मोदी ने कहा था, 'आजकल हमारे देश में मुफ्त की रेवड़ी बांटकर वोट बटोरने का कल्चर लाने की भरसक कोशिश हो रही है. ये रेवड़ी कल्चर देश के विकास के लिए बहुत घातक है. रेवड़ी कल्चर वालों को लगता है कि जनता जनार्दन को मुफ्त की रेवड़ी बांटकर उन्हें खरीद लेंगे. हमें मिलकर रेवड़ी कल्चर को देश की राजनीति से हटाना है.' 

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बाद में चुनावों से पहले इस तरह के ऐलानों का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने इसे 'गंभीर मुद्दा' बताया. अदालत ने कहा था, 'ये एक गंभीर मुद्दा है. जिन्हें ये मिल रहा है, वो जरूरतमंद हैं. कुछ टैक्सपेयर कह सकते हैं कि इसका इस्तेमाल विकास के लिए किया जाए. इसलिए ये गंभीर मुद्दा है. अर्थव्यवस्था को हो रहे नुकसान और वेलफेयर में बैलेंस की जरूरत है. दोनों ही पक्षों को सुना जाना चाहिए.'

कैसे हुई इस 'रेवड़ी कल्चर' की शुरुआत?

दुनियाभर में राजनीतिक पार्टियां वोटरों को रिझाने के लिए मुफ्त की योजनाओं या यूं कहें कि फ्रीबीज का ऐलान करती रहती हैं.

भारत में इसकी शुरुआत तमिलनाडु से मानी जाती है. 2006 में तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होने थे. तब डीएमके ने सरकार बनने पर सभी परिवारों को फ्री कलर टीवी देने का वादा कर दिया. पार्टी ने तर्क दिया कि हर घर में टीवी होने से महिलाएं साक्षर होंगी. 

डीएमके के इस चुनावी वादे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. हालांकि, डीएमके जीत गई. वादा पूरा करने के लिए 750 करोड़ रुपये का बजट लगाया गया. 

मामला सुप्रीम कोर्ट में चल ही रहा था कि 2011 के विधानसभा चुनाव आए. विपक्षी अन्नाद्रमुक ने टीवी के जवाब में मिक्सर ग्राइंडर, इलेक्ट्रिक फैन, लैपटॉप, कम्प्यूटर, सोने की थाली आदि बांटने का वादा भी कर दिया. शादी होने पर महिलाओं को 50 हजार रुपये और राशन कार्ड धारकों को 20 किलो चावल देने का वादा भी किया. नतीजे आए तो अन्नाद्रमुक की सरकार बन गई.

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2006 के चुनावी वादे पर जुलाई 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'फ्रीबीज सभी लोगों को प्रभावित करती है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ को काफी हद तक हिला देती हैं.'

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को भी आदेश दिया कि वो सभी राजनीतिक पार्टियों से सलाह-मशविरा कर एक आचार संहिता बनाए. इसके बाद 2015 में चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए आचार संहिता जारी भी की, लेकिन उसके बावजूद चुनावों में फ्रीबीज का ऐलान होता ही रहा है.

फ्रीबीज या रेवड़ी कल्चर माने क्या?

फ्रीबीज क्या है? इसकी कोई साफ-साफ परिभाषा नहीं है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने हलफनामे में बताया था कि अगर प्राकृतिक आपदा या महामारी के समय दवाएं, खाना या पैसा मुफ्त में बांटा जाए तो ये फ्रीबीज नहीं है. लेकिन आम दिनों में ऐसा होता है तो उसे फ्रीबीज माना जा सकता है.

वहीं, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने कहा था, ऐसी योजनाएं जिनसे क्रेडिट कल्चर कमजोर हो, सब्सिडी की वजह से कीमतें बिगड़ें, प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में गिरावट आए और लेबर फोर्स भागीदारी कम हो तो वो फ्रीबीज होती हैं.

अब ऐसे में सवाल उठता है क्या फ्रीबीज और सरकार की कल्याणकारी योजनाएं एक ही हैं या अलग-अलग? आमतौर पर फ्रीबीज का ऐलान चुनाव से पहले किया जाता है, जबकि कल्याणकारी योजनाएं या वेलफेयर स्कीम्स किसी भी समय लागू कर दी जाती हैं. 

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सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा था कि आजीविका चलाने के लिए या आजीविका मिशन के तहत ट्रेनिंग देने के लिए लागू की गई योजनाओं को फ्रीबीज नहीं कहा जा सकता. कल्याणकारी योजनाएं लोगों के जीवन को बेहतर बनाती हैं, उनके जीने का स्तर सुधारती हैं. इससे रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर करने में मदद मिलती है. 

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा था कि सभी वादों की तुलना फ्रीबीज से नहीं की जा सकती, क्योंकि कुछ कल्याणकारी योजनाएं जनता की भलाई से जुड़ी होती हैं.

फ्रीबीज का क्या असर होता है?

राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने के लिए वादों की बौछार तो कर देती हैं, लेकिन इसका बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि टैक्सपेयर के पैसे का इस्तेमाल कर बांटी जा रहीं फ्रीबीज सरकार को 'दिवालियेपन' की ओर धकेल सकती हैं.

इतना ही नहीं, पिछले साल आरबीआई की भी एक रिपोर्ट आई थी. इसमें कहा गया था कि राज्य सरकारें मुफ्त की योजनाओं पर जमकर खर्च कर रही हैं, जिससे वो कर्ज के जाल में फंसती जा रही हैं.

'स्टेट फाइनेंसेस: अ रिस्क एनालिसिस' नाम से आई आरबीआई की इस रिपोर्ट में उन पांच राज्यों के नाम दिए गए हैं, जिनकी स्थिति बिगड़ रही है. इनमें पंजाब, राजस्थान, बिहार, केरल और पश्चिम बंगाल शामिल हैं.

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आरबीआई ने अपनी इस रिपोर्ट में CAG के डेटा के हवाले से बताया है कि राज्य सरकारों का सब्सिडी पर खर्च लगातार बढ़ रहा है. 2020-21 में सब्सिडी पर कुल खर्च का 11.2% खर्च हुआ था, जबकि 2021-22 में 12.9% खर्च किया गया.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अब राज्य सरकारें सब्सिडी की बजाय मुफ्त ही दे रही हैं. सरकारें ऐसी जगह पैसा खर्च कर रही हैं, जहां से उन्हें कोई कमाई नहीं हो रही. फ्री बिजली, फ्री पानी, फ्री यात्रा, बिल माफी और कर्ज माफी, ये सब 'freebies' हैं, जिन पर राज्य सरकारें खर्च कर रही हैं. 

कैसे राज्यों को कर्जदार बना रहा रेवड़ी कल्चर?

सिम्पल सा गणित है. कमाई कम है और खर्चा ज्यादा. तो इस खर्च को पूरा करने के लिए कर्ज लेना होगा. लेकिन खर्च और कर्ज को सही तरीके से मैनेज नहीं किया तो हालात ऐसे हो जाएंगे कि फिर न तो खर्च करने के लायक होंगे और न ही कर्ज लेने के. 

ऐसा ही श्रीलंका के साथ हुआ. पाकिस्तान के साथ हो रहा है. अमेरिका के साथ भी लगभग ऐसा हो ही गया.

हमारे देश में भी सरकारों का कर्जा बढ़ता जा रहा है. सरकारें सब्सिडी के नाम पर फ्रीबीज पर बेतहाशा खर्च कर रही हैं. 

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इन्हें दो आंकड़ों से समझिए. पहला कि पांच साल में राज्य सरकारों का सब्सिडी पर खर्च 60% से ज्यादा बढ़ गया है. और दूसरा कि पांच साल में ही राज्य सरकारों पर कर्ज भी लगभग 60% तक बढ़ा है.

आरबीआई के मुताबिक, 2018-19 में सभी राज्य सरकारों ने सब्सिडी पर 1.87 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे. ये खर्च 2022-23 में बढ़कर 3 लाख करोड़ रुपये के पार चला गया है. इसी तरह से मार्च 2019 तक सभी राज्य सरकारों पर 47.86 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था, जो मार्च 2023 तक बढ़कर 76 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया.

फ्रीबीज का चुनावी नतीजों पर क्या असर?

इसका मिला-जुला असर देखने को मिलता है. इसे ऐसे समझिए कि 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव बीजेपी ने राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के मुद्दे पर लड़ा. दूसरी ओर, 2019 में कांग्रेस ने 'न्याय योजना' के तहत चुनिंदा लोगों को सालाना 72 हजार रुपये देने का वादा किया था. उसके बावजूद 2019 में बीजेपी ने 303 सीटें जीत लीं और कांग्रेस को कुछ खास फायदा नहीं मिला.

इसी तरह 2022 में आम आदमी पार्टी ने पंजाब, उत्तर प्रदेश और गोवा जैसे राज्यों के चुनावों में फ्री बिजली जैसी कई चीजें मुफ्त देने का वादा किया था. इसके बावजूद पंजाब को छोड़कर आम आदमी पार्टी को किसी और राज्य में कुछ फायदा नहीं मिला.

हिमाचल प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस ने पुरानी पेंशन को बहाल करने का वादा किया. कर्नाटक में तो कांग्रेस ने बाकायदा पांच गारंटी दे दीं. इन गारंटियों में 200 यूनिट तक फ्री बिजली, महिलाओं को फ्री बस यात्रा और हर महीने दो हजार रुपये जैसे वादे शामिल थे. दोनों ही राज्यों में कांग्रेस को फायदा हुआ और उसकी सरकार बन गई. 

वहीं, राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी तो फ्री बिजली, फ्री पानी जैसे वादे करके ही सत्ता में आई है. इसके बचाव में पार्टी कहती है कि इससे लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट मान चुका है कि इस तरह की फ्रीबीज का प्रभाव सभी लोगों पर पड़ता है. 

कुछ फ्रीबिज जो बनी राष्ट्रीय योजनाएं

फ्रीबीज क्या है? इसकी कोई परिभाषा तो नहीं है. लेकिन जिसे आज फ्रीबीज कहा जा रहा है, हो सकता है कि कल को वो राष्ट्रीय स्तर की कोई योजना बन जाए. इतिहास में ऐसा कई बार हो चुका है.

तमिलनाडु के तीसरे मुख्यमंत्री के. कामराज ने 1960 के दशक में स्कूल आने वाले बच्चों के लिए फ्री खाने की योजना शुरू की थी. नतीजा ये हुआ कि तमिलनाडु में स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या भी बढ़ गई. बाद में केंद्र सरकार ने 'मिड-डे मील' नाम से योजना शुरू की. इसके तहत सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को दोपहर का खाना मुफ्त दिया जाता है.

इसी तरह से एनटी रामाराव जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तो उन्होंने फ्री राशन की एक योजना शुरू की. इसके तहत लोगों को 2 किलो चावल मुफ्त दिया जाता था. इसी की तर्ज पर केंद्रीय स्तर में नेशनल फूड सिक्योरिटी प्रोग्राम शुरू किया गया.

इतना ही नहीं, फरवरी 2018 में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने किसानों के लिए 'रायथू बंधू' नाम से योजना शुरू की. इसके तहत पात्र किसानों को सालाना 10 हजार रुपये की मदद दी जाती है. बाद में 2019 में केंद्र सरकार ने 'पीएम सम्मान निधि' नाम से योजना लॉन्च कर दी. 

हालांकि, हर फ्रीबीज अच्छी हो, ये जरूरी नहीं है. 1990 के दशक में अकाली दल ने फ्री बिजली की सुविधा देनी शुरू की. मुफ्त बिजली की सुविधा आर्थिक तौर पर सबसे ज्यादा चोट पहुंचाने वाली योजना है. वो इसलिए, क्योंकि इससे बिजली कंपनियां बुरी तरह घाटे में चली जाती हैं.

समाधान क्या है?

राज्यों के घटते राजस्व में इजाफे के लिए एन.के. सिंह की अगुआई वाले 15वें वित्त आयोग ने संपत्ति कर में धीरे-धीरे बढ़ोतरी, पानी जैसी विभिन्न सरकारी सेवाओं का शुल्क नियमित तौर पर बढ़ाने के साथ शराब पर उत्पाद कर बढ़ाने और स्थानीय निकायों तथा खाता-बही में सुधार करने की सलाह दी है.

आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी. सुब्बाराव ने मीडिया में एक लेख में लिखा था, 'चाहे निजी कंपनी हो या सरकार, आदर्श तो यही है कि किसी कर्ज का भुगतान भविष्य में राजस्व पैदा करके खुद करना चाहिए. दूसरी तरफ, अगर कर्ज की रकम मौजूदा खपत में खर्च की जाती है और भविष्य की वृद्धि पर कोई असर नहीं होता, तो हम कर्ज भुगतान का बोझ अपने बच्चों पर डाल रहे हैं. इससे बड़ा पाप और कुछ हो नहीं सकता.'

पिछले साल जून में आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में श्रीलंका के आर्थिक संकट का उदाहरण देते हुए सुझाव दिया है कि राज्य सरकारों को अपने कर्ज में स्थिरता लाने की जरूरत है, क्योंकि कई राज्यों के हालात अच्छे संकेत नहीं हैं.

आरबीआई का सुझाव है कि सरकारों को गैर-जरूरी जगहों पर पैसा खर्च करने से बचना चाहिए और अपने कर्ज में स्थिरता लानी चाहिए. इसके अलावा बिजली कंपनियों को घाटे से उबारने की जरूरत है. इसमें सुझाव दिया गया है कि सरकारों को पूंजीगत निवेश करना चाहिए, ताकि आने वाले समय में इससे कमाई हो सके.

 

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