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IAS परमपाल कौर के चुनाव लड़ने पर क्यों हुआ बखेड़ा? जानें- अफसरों का सर्विस रूल क्या कहता है

पंजाब सरकार ने बठिंडा सीट से बीजेपी उम्मीदवार परमपाल कौर सिद्धू को तुरंत ड्यूटी ज्वॉइन करने को कहा है. परमपाल कौर ने हाल ही में VRS लिया था. उन्होंने तीन महीने का नोटिस पीरियड माफ करने की भी अपील की थी. हालांकि, पंजाब सरकार का कहना है कि नोटिस पीरियड माफ नहीं किया गया है. राज्य सरकार ने VRS के लिए झूठे कारण बताने का आरोप भी लगाया है.

परमपाल कौर वीआरएस लेकर चुनाव लड़ रहीं हैं. (फाइल फोटो) परमपाल कौर वीआरएस लेकर चुनाव लड़ रहीं हैं. (फाइल फोटो)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 08 मई 2024,
  • अपडेटेड 4:42 PM IST

पंजाब की बठिंडा लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार परमपाल कौर सिद्धू के लिए नई मुसीबत खड़ी हो गई है. परमपाल कौर IAS अफसर भी हैं. हाल ही में वो VRS लेकर बीजेपी में शामिल हुई थीं. लेकिन अब पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार ने उनपर झूठ बोलकर रिटायरमेंट लेने का आरोप लगाया है. साथ ही पंजाब सरकार ने उन्हें तुरंत ड्यूटी पर लौटने को भी कहा है.

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2011 बैच की IAS अफसर परमपाल कौर ने पिछले महीने VRS लिया था. वो बठिंडा सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहीं हैं. इसके साथ ही उन्होंने तीन महीने का नोटिस पीरियड माफ करने की मांग भी की थी. केंद्र सरकार ने उनका इस्तीफा मंजूर कर रिटायरमेंट दे दिया था. 

लेकिन पंजाब सरकार का कहना है कि परमपाल कौर का तीन महीने का नोटिस पीरियड माफ नहीं किया गया है. साथ ही उनपर VRS लेने के लिए झूठे कारण बताने का आरोप भी लगाया है.

क्या है पूरा मामला?

पिछले महीने परमपाल कौर ने VRS के लिए केंद्र से मंजूरी मांगी थी. केंद्र से मंजूरी मिलने के बाद 11 अप्रैल को वो बीजेपी में शामिल हो गईं. अगले दिन पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बताया कि राज्य सरकार ने उनका इस्तीफा मंजूर नहीं किया है.

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परमपाल कौर अकाली दल के नेता सिकंदर सिंह मलूका की बहू हैं. उन्होंने अपनी VRS एप्लीकेशन में मां की तबियत खराब होने का दावा किया था. पंजाब सरकार ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उन्होंने झूठ बोलकर रिटायरमेंट लिया. 

पंजाब सरकार की ओर से परमपाल कौर को एक चिट्ठी भेजी गई है. इसमें लिखा है, 'आपने कहा था कि आपकी मां 81 साल की हैं और उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता. पिता और आपके छोटे भाई का कई साल पहले निधन हो चुका है और मां का ख्याल रखने के लिए भारत में कोई नहीं है. इसलिए मां का ख्याल रखने के लिए बठिंडा में अपने घर पर रहने की जरूरत है.'

इस पत्र में लिखा गया है, 'लेकिन बीते कई दिनों से आप राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं, जो VRS लेने के लिए बताए गए कारणों को झूठा साबित करता है.'

इसमें आगे कहा गया है, 'राज्य सरकार ने अभी भी तीन महीने के नोटिस पीरियड को माफ नहीं किया है, जो नियम 16(2) के तहत जरूरी है. VRS के लिए भी अभी तक कोई आदेश जारी नहीं किया गया है.'

पंजाब सरकार ने बताया कि राज्य में IAS की कमी है. 231 की बजाय 192 IAS ही पंजाब के पास हैं. पंजाब सरकार ने परमपाल कौर को तुरंत ड्यूटी ज्वॉइन करने का आदेश दिया है. ऐसा नहीं करने पर जरूरी कार्रवाई करने की चेतावनी भी दी है.

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क्या IAS अफसर चुनाव नहीं लड़ सकते?

कोई भी व्यक्ति अगर सरकारी नौकरी में है तो उसके न सिर्फ चुनाव लड़ने, बल्कि किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल होने पर भी रोक रहती है. फिर चाहे वो IAS या IPS अफसर ही क्यों न हो.

केंद्र सरकार के अफसरों और कर्मचारियों पर सेंट्रल सिविल सर्विसेस (कंडक्ट) रूल्स, 1964 के तहत चुनाव लड़ने पर रोक है. इसमें नियम 5 में ये प्रावधान किया गया है. इसके तहतः- 

- कोई भी सिविल सर्वेंट किसी भी राजनीतिक पार्टी या संगठन का न तो हिस्सा होगा, न ही राजनीति से जुड़ेगा और न ही किसी तरह से किसी राजनीतिक आंदोलन या गतिविधि से जुड़ेगा. 

- ये हर सरकारी कर्मचारी की जिम्मेदारी है कि वो अपने परिवार के सदस्य या सदस्यों को किसी राजनीतिक आंदोलन या गतिविधि में शामिल नहीं होने देगा. अगर फिर भी ऐसा होता है तो सरकारी कर्मचारी को इस बात की जानकारी सरकार को देनी होगी. 

- कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी राजनीतिक व्यक्ति के लिए न तो प्रचार करेगा और न ही अपने प्रभाव का इस्तेमाल करेगा.

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राज्य सरकार के कर्मचारियों पर क्या नियम?

जिस तरह से केंद्र सरकार के अफसरों और कर्मचारियों के चुनाव लड़ने या राजनीतिक गतिविधि में शामिल होने की मनाही है, उसी तरह राज्य सरकार के कर्मचारियों और अफसरों के लिए भी यही नियम है.

राज्य सरकार के अफसर या कर्मचारी भी न तो चुनाव लड़ सकते हैं और न ही किसी तरह की राजनीतिक गतिविधि में शामिल हो सकते हैं. इसके लिए हर राज्य के अलग-अलग सिविल रूल्स हैं.

कोई भी सरकारी कर्मचारी राजनीतिक रैली में भी शामिल नहीं हो सकता. अगर किसी राजनीतिक रैली में उसकी ड्यूटी लगती है तो वो वहां न तो भाषण दे सकता है, न ही नारे लगा सकता है और न ही पार्टी का झंडा उठा सकता है.

फिर क्या तरीका है?

साफ है कि कोई भी सरकारी अफसर या कर्मचारी पद पर रहते हुए तो चुनाव नहीं लड़ सकता. वो तभी चुनाव लड़ सकता है जब या तो उसने पद से इस्तीफा दे दिया हो या फिर रिटायर हो गया हो.

हालांकि, कभी-कभी अदालतें पद पर रहते हुए भी चुनाव लड़ने की इजाजत दे देती हैं. पिछले साल राजस्थान हाईकोर्ट ने दीपक घोघरा नाम के सरकारी डॉक्टर को विधानसभा चुनाव लड़ने की इजाजत दे दी थी. हाईकोर्ट ने ये भी कहा था कि अगर दीपक चुनाव हार जाते हैं तो वो दोबारा ड्यूटी ज्वॉइन कर सकते हैं. हालांकि, दीपक घोघरा ये चुनाव हार गए थे.

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कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई थी. इसमें मांग की गई थी कि रिटायरमेंट या इस्तीफे के तुरंत बाद सरकारी अफसर या कर्मचारी को चुनाव लड़ने की मंजूरी न दी जाए. रिटायरमेंट या इस्तीफे और चुनाव लड़ने के बीच कुछ गैप होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया था.

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