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इंडिगो पायलट को यात्री ने जड़ा मुक्का, जानें इंतजार करते हुए हमें गुस्सा क्यों आ जाता है?

इंडिगो एयरलाइंस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, जिसमें उड़ान में देरी से गुस्साए एक यात्री ने पायलट को थप्पड़ जड़ दिया. कोहरे की वजह से ट्रांसपोर्ट प्रभावित है, जिसका असर लोगों के मूड पर साफ है. छोटी दूरी के ट्रैफिक में फंसने पर भी लोग भड़क उठते हैं. यहां तक कि इंतजार से बचने के लिए उन्हें खतरा लेने से भी परहेज नहीं. साइंस भी ये साबित कर चुका.

इंतजार पर भी वैज्ञानिक कई अध्ययन कर चुके. (Photo- Unsplash) इंतजार पर भी वैज्ञानिक कई अध्ययन कर चुके. (Photo- Unsplash)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 16 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 6:41 PM IST

खराब मौसम की वजह से लगातार ट्रेनें और विमान नियत समय से देर से चल रहे हैं. सर्दी में यात्री परेशान हैं. ऐसे ही परेशानहाल ट्रैवलर ने एक पायलट पर हमला कर दिया. ये वाकया इंडिगो एयरलाइंस की दिल्ली-गोवा फ्लाइट में हुआ, जब पायलट देरी की घोषणा कर रहा था. पहले से ही 10 घंटों से ज्यादा इंतजार कर चुके यात्रियों में से एक ने पायलट को थप्पड़ मार दिया. फिलहाल यात्री को नो-फ्लाई लिस्ट में डाला जा चुका है, लेकिन सोशल मीडिया पर लगातार लोग हमलावर यात्री के पक्ष में लिख रहे हैं. उनका कहना है कि वक्त की इतनी बर्बादी के बाद किसी को भी गुस्सा आ जाएगा. 

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क्यों समय धीरे चलता है

विज्ञान मानता है कि एम्प्टी यानी खाली समय, उस समय से धीरे बीतता लगता है, जिसमें हमारे पास कोई काम हो. ये काम मनोरंजन भी हो सकता है. वहीं एम्प्टी टाइम हमारे भीतर कई निगेटिव भावनाएं लाता है, जैसे डर, चिंता, उदासी और गुस्सा. लंबे इंतजार की बात छोड़ दें तो भी छोटे-मोटे इंतजार से भी निगेटिव इमोशन्स पैदा होते हैं. मसलन, डॉक्टर के क्यू में इंतजार करते लोग अक्सर अंगुलियां थपकते, बेचैनी से पैर हिलाते या सिर खुजलाते देखे जाते हैं. कई बार लोग जोर-जोर से आपस में ही लड़ जाते हैं. 

किसी-किसी को क्यों नहीं खलता वक्त

वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो उतने ही इंतजार के बाद शांत रहते हैं. यही टाइम परसेप्शन है. ये हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है. जैसे अलग किसी का मूड बहुत अच्छा हो, वो किसी मजेदार शख्स के साथ हो, या फिर जिसे कोई हड़बड़ी न हो, वो उतना ही इंतजार आसानी से कर लेता है. 

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पहले से परेशान शख्स को इंतजार ज्यादा भारी लगता है. ये तब भी होता है, जब वो पहले से कई मुश्किलें झेलकर आ रहा हो, या वापस मुश्किल में घिरने का अंदाजा हो. जैसे अगर किसी को फ्लाइट लेकर किसी बीमार दोस्त से मिलने जाना है तो वो जल्दी चिड़चिड़ाएगा. 

कितना गुस्सा आता है इंतजार करते लोगों को

इंतजार करना किसी को किस हद तक झल्ला सकता है, इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने कई स्टडीज कीं. यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया में एक दशक पहले एक प्रयोग हुआ, जिसका नाम था- थिंकिंग पीरियड्स. इसके लिए ग्रेजुएशन कर रहे स्टूडेंट्स को लिया गया. उन्हें सुंदर कमरों में बिठा दिया गया, लेकिन वहां फोन, अखबार या टीवी सेट नहीं था. उन्हें सिर्फ सोचना था.

एक और ग्रुप था, जिसे कोई काम दिया गया, जैसे खेलना या खाना. इसके साथ उन्हें सोचना था. सोचने का सबजेक्ट तय था. लेकिन तय समय खत्म होने के बाद जब जांचा गया तो पता लगा कि खाली बैठकर सोचने वालों ने खराब परफॉर्म किया था. 50% लोगों ने टेस्ट देने तक से इनकार कर दिया. 

स्टडी का अगला हिस्सा खतरनाक था

इस बार कमरों में वो डिवाइस रखी गई, जिससे बिजली का झटका दिया जा सके. वैज्ञानिकों ने कहा कि थिंकिंग पीरियड के लोग चाहें तो खुद को शॉक भी दे सकते हैं. ये जबर्दस्ती नहीं थी, बल्कि उनकी मर्जी थी. टाइम खत्म होने से पहले ही 67% पुरुष और 25% स्त्रियां खुद को बिजली का झटका दे चुकी थीं. ये स्टडी साइंस जर्नल में 'जस्ट थिंक- द चैलेंजस ऑफ डिसएंगेज्ड माइंड' नाम से साल 2014 में प्रकाशित हुई. 

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इंतजार करते लोगों को गुस्सा कम आए, इसके लिए अलग-अलग कंपनियां कई कोशिशें कर रही हैं. जैसे, क्यू मैनेजमेंट सिस्टम के तहत कई एप बनाए गए जो लोगों को वर्चुअल क्यू से जोड़ देते हैं. इससे उन्हें लगता रहता है कि वे धीरे-धीरे अपॉइंटमेंट के करीब जा रहे हैं. ये रियल टाइम अपडेट भी देता है. 

बोरियत बना सकती है क्रिएटिव अगर...

इंतजार करना लोगों को बुरा लगता है, वहीं बोरियत क्रिएटिव भी बनाती है. बोरियत को वैज्ञानिक दो स्तर में बांटते हैं. एक सुपरफिशियल बोरडम, यानी वो स्टेट जो शुरुआत में आती है. जैसे आप किसी लाइन में खड़े होकर इंतजार करते हैं तो जो महसूस होता है, वो भाव इसी श्रेणी में आता है. इसी दौरान आप मोबाइल पर बिल्ली की क्यूट वीडियो या बच्चों की तुतलाहट देखने लगेंगे. इससे आप बोरियत से बच तो जाएंगे लेकिन क्रिएटिविटी से भी रह जाएंगे. 

क्या है प्रोफाउंड बोरडम

इसी सुपरफिशियल स्टेट के बाद प्रोफाउंड बोरडम आता है. ये वो अवस्था है, जिसमें पहुंचने के बाद हम कुछ नया करने की सोचते हैं. ये बात आउट ऑफ माय स्कल- द साइकोलॉजी ऑफ बोरडम में कही गई है. कोविड के पहले लॉकडाउन के दौरान लिखी और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से छपी इस किताब में ढेरों ऐसे हवाले हैं, जो बताते हैं कि बोर होना कितना जरूरी है.

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बोरियत से दिमाग का ये हिस्सा एक्टिव 

बोरियत पर वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी ने एक बड़ी स्टडी की थी, जिसमें ब्रेन मैपिंग के जरिए देखा गया कि ऊबभरा कोई काम करते हुए दिमाग में क्या बदलता है. इसके तहत 54 लोगों को एक सर्वे के नतीजे भरने को कहे गए, जिसमें कुछ भी नया नहीं था. इस दौरान 128 पॉइंट्स पर उनकी ब्रेन वेव्स पर नजर रखी गई. तब नजर आया कि बेहद ऊबे हुए लोगों के दिमाग का लेफ्ट फ्रंटल हिस्सा एक्टिव हो गया. ये वो हिस्सा है, जो कुछ नया सोचने या करने को उकसाता है.

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