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क्या तटस्थ देश कर सकते हैं ICC के आदेश की अनदेखी, क्यों अरेस्ट वारंट के बाद भी मंगोलिया में सुरक्षित पुतिन?

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन मंगोलिया दौरे पर हैं. यूक्रेन से लड़ाई छिड़ने के बाद से ये पहला मौका है जब वे ऐसे मुल्क में है, जो इंटरनेशनल क्रिमिकल कोर्ट (आईसीसी) का सदस्य है. कोर्ट ने पिछले साल ही पुतिन का अरेस्ट वारंट जारी किया था. तो क्या मंगोलिया इस आदेश को नजरअंदाज कर सकता है. क्या है न्यूट्रल स्टेट होना, जो मंगोलिया को इसकी छूट देता है?

पुतिन मंगोलियाई पीएम लुवसन्नामस्रेन ओयुन-एर्डीन के साथ. (Photo- AFP) पुतिन मंगोलियाई पीएम लुवसन्नामस्रेन ओयुन-एर्डीन के साथ. (Photo- AFP)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 04 सितंबर 2024,
  • अपडेटेड 2:38 PM IST

रूस और यूक्रेन की लगभग ढाई सालों के चल रहे युद्ध के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन मंगोलिया पहुंचे. मंगोलिया इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट का सदस्य देश है, जो पिछले साल ही पुतिन को अरेस्ट करने की बात कह चुका. लेकिन मंगोलिया न केवल इस आदेश को नजरअंदाज कर रहा है, बल्कि पुतिन की जमकर मेहमाननवाजी जैसी तस्वीरें भी आ रही हैं. तो क्या आईसीसी के आदेश में कोई वजन नहीं, या फिर मंगोलिया के पास कोई खास ताकत है?

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क्यों निकला पुतिन की गिरफ्तारी का वारंट

रूस पर आरोप है कि उसकी सेना ने सरकारी आदेश पर यूक्रेन को तहस-नहस कर डाला. उसक इंफ्रास्ट्रक्चर ही तबाह नहीं हुआ, लाखों यूक्रेनी नागरिक घर छोड़ने या दूसरे देशों में शरण लेने पर मजबूर हो गए. वॉर क्राइम की एक लंबी लिस्ट है, जिसमें दो बड़े आरोप पुतिन के सिर आए हैं. कथित तौर पर उनके कहने पर यूक्रेनी मूल के बच्चों को जबरन रूस लाया गया. यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने ये मामला आईसीसी में उठाया था, जिसके बाद पुतिन के खिलाफ वारंट निकला.

क्या है आईसीसी और क्या करता है

आईसीसी नीदरलैंड में स्थित वो अदालत है, जहां इंटरनेशनल मामलों पर बात होती है. ये कोर्ट वॉर क्राइम, मानवीयता पर खतरे, नरसंहार और, दंगे-फसाद के अपराधियों पर कार्रवाई की बात करता है. लेकिन देश खुद भी तो ऐसा करते हैं, फिर आईसीसी की क्या जरूरत! तो ये कोर्ट तब दखल देती है, जब देश अपराधी पर खुद एक्शन न ले रहा हो, या फिर चाहकर भी ऐसा न कर पा रहा हो.

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मंगोलिया पर जबर्दस्ती क्यों है मुश्किल

कुल 123 देश इसके मेंबर हैं, जिनमें से मंगोलिया भी एक है. आरोपी अगर सदस्य देश में आए तो वारंट के मुताबिक उसकी गिरफ्तारी की जा सकती है. हालांकि मंगोलिया के मामले में ऐसा लगता नहीं. एक साफ वजह तो ये है कि पुतिन दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेताओं में से हैं, जिनपर हाथ डालना आसान नहीं. दूसरी बात- मंगोलिया ने खुद उन्हें इनवाइट किया है. तीसरी बड़ी वजह ये है कि मंगोलिया लगभग न्यूट्रल देश है. 

सबसे हैं अच्छे राजनैतिक संबंध

तीस लाख से कुछ ज्यादा आबादी वाला ये देश दो किनारों पर दो काफी बड़े देशों से घिरा है- रूस और चीन. ऐसे में दोनों से उसका डिप्लोमेटिक रिश्ता अच्छा रहा. हालांकि रूस (तब सोवियत संघ) ने चूंकि चीन से आजादी दिलाने में उसकी मदद की थी, इसलिए वो खुद को मॉस्को के ज्यादा करीब पाता रहा. 

सबसे खास बात ये है कि कम आबादी वाले इस देश ने  दूरदराज के देशों से भी अच्छे रिश्ते बना रहे हैं, जैसे भारत अमेरिका, जापान और जर्मनी. इनके साथ वो राजनैतिक और व्यापारिक संबंध रखता है. बात यहीं खत्म नहीं होती. इसके अपनी इमेज अनाधिकारिक तौर पर न्यूट्रल मुल्क की बना डाली. यहां पर इंटरनेशनल डिप्लोमेटिक मीटिंग होने लगीं.

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ऐसे नजर आता रहा न्यूट्रल

हर साल यहां की राजधानी ऊलानबटार में एक आयोजन होता है, जहां पड़ोसी देशों के साथ-साथ अमेरिका और यूरोपीय देश भी आते रहे. इस दौरान एक-दूसरे से दूर भागने वाले देश भी साथ बैठकर ग्लोबल मुद्दों पर बात करते हैं. बता दें कि स्विट्जरलैंड को सबसे ज्यादा तटस्थ माना जाता रहा, जहां सभी देशों के डिप्लोमेट खुद को सुरक्षित पाते हैं. यूएन और सभी बड़ी इंटरनेशनल संस्थाओं का ऑफिस भी यहां है. इसके अलावा इक्का-दुक्का यूरोपीय देश इस लिस्ट में हैं. 

कोल्ड वॉर के दौरान जब दुनिया रूस और अमेरिका के आगे-पीछे बंट गई थी, तब भी इस देश ने खुद को तटस्थ रखा. ऐसे में माना जा सकता है कि आईसीसी का वारंट मंगोलिया पर बेअसर ही रहेगा. खासकर तब, जब शीत युद्ध के दौरान भी उसने अपनी डिप्लोमेटिक तटस्थता बनाए रखी थी. 

कई और मौके थे, जब आधिकारिक तौर पर न्यूट्रल न होकर भी मंगोलिया ने अपना रुख साफ कर दिया. साल 1992 में संविधान में बदलाव करते हुए इस देश ने किसी भी देश के सैन्य गुट में शामिल होने से मना कर दिया. दो बड़े पड़ोसियों रूस और चीन के बीच वो लगातार संतुलन बनाए हुए है. साथ ही रूस से तनाव रखते अमेरिका से भी उसके ठीक रिश्ते रहे. 

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एक बड़ा कारण और है. रूस चूंकि आईसीसी का सदस्य नहीं, इसलिए उनकी गिरफ्तारी या मुकदमा चलाना उतना आसान नहीं. इसमें एक दिक्कत ये भी है कि खुद को पीड़ित बता रहा यूक्रेन भी कोर्ट का मेंबर नहीं. हां, ये बात जरूर है कि साल 2014 में रूस से लड़ाई के बाद उसने कोर्ट को आंशिक मंजूरी दी थी. इससे आईसीसी यूक्रेन में होने वाले मानवाधिकार अपराधों पर नजर रख सकती है.

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