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बीते हुए को भुलाकर अमेरिका करेगा तालिबान से दोस्ती, क्या होगा अगर काबुल में US एंबेसी खुल जाए?

अमेरिका ने तीन तालिबानी नेताओं, जिनमें अफगानिस्तान के गृह मंत्री और हक्कानी नेटवर्क के प्रमुख सिराजुद्दीन हक्कानी भी शामिल हैं, पर लगाए गए इनाम हटा दिए. साथ ही एक बड़ी रकम अनफ्रीज कर दी. यह पॉलिसी में बड़े शिफ्ट का संकेत है. तो क्या दशकों बाद यूएस भी तालिबान को अपना सकता है?

अमेरिकी सरकार के तेवर तालिबान को लेकर ढीले पड़ते दिख रहे हैं. (Photo- AFP) अमेरिकी सरकार के तेवर तालिबान को लेकर ढीले पड़ते दिख रहे हैं. (Photo- AFP)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 24 मार्च 2025,
  • अपडेटेड 6:32 PM IST

अगस्त 2021 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाई तो देश में बड़ा बदलाव हुआ. तुरंत ही तालिबान ने उसपर कब्जा कर लिया. तब से काबुल पर उसी का राज है. हालांकि लगभग किसी भी देश ने इसे सरकार के तौर पर मान्यता नहीं दी. अब अमेरिका अगर तालिबान को लेकर नर्म पड़े तो दुनिया के सारे देशों पर उससे दोस्ती का दबाव बनेगा. ऐसे संकेत दिखने शुरू भी हो चुके. 

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यूएस ने तालिबान के तीन नेताओं पर से इनामी राशि हटा ली. इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जिनपर अफगानिस्तान की पूर्व सरकार के खिलाफ हमलों का आरोप है, जिसे खुद अमेरिका का सपोर्ट था. हमले में अमेरिकी नागरिक समेत छह लोग मारे गए थे. अब इनाम हटाने के बाद रिवार्ड्स फॉर जस्टिस वेबसाइट से उनके नाम हट जाएंगे.

अमेरिका ने यह कदम अमेरिकी कैदी जॉर्ज ग्लेजमैन की रिहाई के बाद उठाया, जो दो साल से ज्यादा समय से काबुल की जेल में थे. कई और रिपोर्ट्स भी हैं, जो दावा कर रही हैं कि यूएस ने अफगान सेंट्रल रिजर्व में से लगभग साढ़े 3 बिलियन डॉलर पर से पाबंदी हटा दी, मतलब अफगानी सरकार अब इसका अपनी तरह से इस्तेमाल कर सकती है. 

दोनों के बीच रिश्ते आखिर खराब क्यों थे

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इसकी शुरुआत लगभग दो सदी पहले हुई थी, जब अमेरिका ने 9/11 हमले झेले. इसके बाद वो पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान तक उन सारे देशों में पहुंचने लगा, जहां उसे आतंकियों के होने के सुराग मिलते. हमलों को चूंकि अलकायदा ने अंजाम दिया था, लिहाजा यूएस सरकार उससे ओसामा बिन लादेन के सरेंडर की बात करने लगी. इसी मकसद को पाने के लिए यूएस आर्मी भी वहां तैनात हो गई. तालिबान तब अफगानिस्तान में सत्ता में था. उसे हटाकर अमेरिकी सहयोग से एक नई सरकार आई. 

दो दशक बाद अमेरिका पर दबाव बढ़ा कि वो अपने सैनिकों को देश से बुला ले. हालांकि यूएस आर्मी के लौटते- न लौटते काबुल में एक बार फिर तालिबान लौट आया. इस बार भी उसके तौर-तरीके उतने ही चरमपंथी थे. वो न केवल ह्यूमन राइट्स को ताक पर रखे हुए था, बल्कि उसकी जमीन पर आतंकवाद एक बार फिर फलने-फूलने लगा. अफगानिस्तान फिर से आतंकी गतिविधियों का अड्डा न बन जाए, इसी डर से यूएस ने उसपर कई पाबंदियां लगा दीं, जिसमें आतंकियों पर इनाम लगाने से लेकर उनकी संपत्ति फ्रीज करना तक शामिल थे. अब यही बर्फ कुछ पिघलती दिख रही है. 

अमेरिका ने अफगान सेंट्रल बैंक की एक बड़ी रकम से पाबंदी हटा ली. अब वर्ल्ड बैंक और यूएन एजेंसियां भी लिमिटेड एड ऑपरेशन शुरू कर सकती हैं. इससे अफगानिस्तान में गिरती इकनॉमी सुधर सकेगी. 

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अमेरिका क्यों पड़ा तालिबान को लेकर नर्म 

इसके पीछे बड़ी वजह रिफ्यूजी क्राइसिस भी है. तालिबान ने कुछ समय पहले ही चेतावनी दी थी कि उनके यहां इकनॉमिक संकट की वजह से बड़ी संख्या में लोग भागकर अमेरिका समेत पूरे पश्चिम में फैल जाएंगे. ये आशंका से ज्यादा एक किस्म की चेतावनी थी. इसके बाद से ही वॉशिंगटन ने डिप्लोमेटिक एंगेजमेंट शुरू की. इसके अलावा तालिबान के दौर में आतंकवादी गतिविधियां दोबारा शुरू न हो जाएं, इसके लिए जरूरी है कि अमेरिका की वहां आवाजाही रहे. नजर रखने के लिए भी वो ऐसा कर रहा है. 

ग्लोबल स्तर पर तालिबान कहां है

अगस्त 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान आया. इसके बाद से उसे इंटरनेशनल अलगाव झेलना पड़ रहा है. कोई भी देश उसे सरकार के तौर पर मान्यता देने को तैयार नहीं था. हाल-हाल के समय में इस सीन में कई बदलाव आए. जनवरी 2024 में चीन वो पहला देश बन गया, जिसने तालिबान को राजनीतिक मान्यता दी. इसके बाद यूएई भी इस कतार में आ गया. रूस ने भी इशारा दिया कि वो तालिबान को आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली लिस्ट से हटा सकता है. इसके बाद से कई देश तालिबान से मुलाकात के लिए काबुल में जा चुके. 

लेकिन क्यों आई थी दूरी

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तालिबान असल में इस्लामिक चरमपंथी गुट है. नब्बे के दशक में सुन्नी इस्लामिक शिक्षा के नाम पर ये आगे बढ़ा और जल्द ही अपना असली चेहरा दिखाने लगा. सत्ता में आने पर उसने इस्लामिक कानून शरिया लागू कर दिया. यहां तक तो फिर भी ठीक था, लेकिन दुनिया को असल एतराज महिलाओं को लेकर उसके रवैए से था. उसने महिलाओं के चलने-घूमने और कपड़े पहनने तक पर पाबंदी लगा दी. साथ ही उसने ज्यादातर इलाकों में टीन-एज लड़कियों के पढ़ने पर भी मनाही कर दी. ऐसा करने पर कोड़े या पत्थर मारकर जान लेने जैसी सजाएं तक हैं. इन बातों को देखते हुए आनन-फानन सारे देशों ने अफगानिस्तान में अपनी एंबेसी बंद कर दी. साथ ही तालिबान को देश के नेचुरल रूलर के तौर पर मान्यता देने से भी मना कर दिया.

क्या नुकसान हैं इसके

तालिबान को मान्यता न मिलने का खामियाजा उसे ही नहीं, बल्कि पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है. उसे वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (IMF) से तब तक कोई मदद नहीं मिलेगी, जब तक कि आधिकारिक दर्जा नहीं मिल जाए. IMF ने देश के लिए तय हुए सारे फंड निरस्त कर दिए. अमेरिका समेत कई पश्चिमी देश अफगानिस्तान को सबसे ज्यादा लोन दे रहे थे. उसपर भी रोक लगा दी गई.

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क्या होता है मान्यता मिलने पर 

मान्यता या आधिकारिक दर्जा देना वो कंडीशन है, जिसमें दो देश एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं. इसके बाद वे आर्थिक और राजनैतिक रिश्ते रख सकते हैं. दोनों के दूतावास होते हैं और वहां तैनात लोगों को डिप्लोमेटिक इम्युनिटी भी मिलती है. इसके बाद ही इंटरनेशनल लोन मिल पाता है.

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