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3.16 एकड़ जमीन, 3 एक्टिविस्ट और हाईकोर्ट का फैसला... MUDA स्कैम में ऐसे फंस गए कर्नाटक सीएम सिद्धारमैया

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है. MUDA स्कैम की जांच वाले गवर्नर के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है. हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले की जांच की जरूरत है. ऐसे में समझते हैं कि ये MUDA स्कैम क्या है? और सिद्धारमैया कैसे इसमें फंस गए?

कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया. (फाइल फोटो) कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया. (फाइल फोटो)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 25 सितंबर 2024,
  • अपडेटेड 2:28 PM IST

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया फंसते नजर आ रहे हैं. कर्नाटक हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ केस चलाने की मंजूरी दे दी है. इसके बाद सिद्धारमैया के खिलाफ मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MUDA) स्कैम मामले में केस चलाया जा सकता है.

राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने सीएम सिद्धारमैया के खिलाफ MUDA स्कैम में केस चलाने को मंजूरी दी थी. सिद्धारमैया ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. राज्यपाल के आदेश संवैधानिकता को सिद्धारमैया ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि उन्होंने राज्यपाल की मंजूरी के बिना जांच को मंजूरी दी थी. 

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हालांकि, कर्नाटक हाईकोर्ट ने सिद्धारमैया के इस तर्क को खारिज कर दिया कि मामले की जांच की जाने की जरूरत है.

ये MUDA स्कैम क्या है? सीएम सिद्धारमैया इस मामले में कैसे फंस गए? और अब आगे क्या होगा? जानते हैं...

3 एक्टिविस्ट की शिकायत पर कार्रवाई

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया लंबे समय से MUDA स्कैम के आरोपों का सामना कर रहे थे. लेकिन केस चलाने की ये कार्रवाई तीन एक्टिविस्ट की शिकायत पर हुई.

बेंगलुरु के दो एक्टिविस्ट- प्रदीप कुमार एसपी, टीजे अब्राहम और मैसूर के एक्टिविस्ट स्नेहमयी कृष्णा ने सिद्धारमैया के खिलाफ राज्यपाल थावरचंद गहलोत के सामने शिकायत दर्ज करवाई थी.

अलग-अलग शिकायतों में तीनों ने आरोप लगाया था कि सिद्धारमैया ने विजयनगर लेआउट के तीसरे और चौथे चरण में MUDA से जमीन हासिल करने के लिए कथित रूप से पद का दुरुपयोग किया था.

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इस शिकायत के आधार पर राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने सीएम सिद्धारमैया के खिलाफ केस चलाने की मंजूरी दी थी. उन्होंने प्रिवेन्शन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 17A और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218 के तहत केस चलाने का आदेश दिया था.

पर ये MUDA स्कैम क्या है?

जब सरकार किसी जमीन का अधिग्रहण करती है तो मुआवजे के तौर पर दूसरी जगह जमीन देती है. पूरा कथित MUDA स्कैम भी इसी से जुड़ा है. ये पूरा मामला सिद्धारमैया की पत्नी बीएम पार्वती को मुआवजे के रूप में मिली 14 प्रीमियम साइट से जुड़ा है. ये प्लॉट मैसूर में हैं.

आरोप है कि सिद्धारमैया और उनकी पत्नी पार्वती ने MUDA से गैरकानूनी तरीके से जमीन ली. दावा है कि इसमें 4 हजार करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है.

जिस जमीन की यहां बात हो रही है वो केसारू गांव की 3.16 एकड़ का प्लॉट है. साल 2005 में इस जमीन को सिद्धारमैया के बहनोई मल्लिकार्जुन स्वामी देवराज को ट्रांसफर कर दिया गया था. दावा है कि मल्लिकार्जुन स्वामी ने 2004 में सरकारी अफसरों और जाली दस्तावेजों की मदद से इस जमीन को अवैध रूप से अपने नाम करवा लिया था.

ऐसे हुआ पूरा खेल?

ऐसा दावा है कि मल्लिकार्जुन ने वो जमीन 2010 में सिद्धारमैया की पत्नी पार्वती को तोहफे में दे दी. हालांकि, बाद में इस जमीन का MUDA ने अधिग्रहण कर लिया. इस जमीन के बदले में पार्वती को दूसरी जगह जमीन दी जानी थी.

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2014 में जब सिद्धारमैया कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे, तब उनकी पत्नी पार्वती ने MUDA की 50:50 स्कीम के तहत मुआवजे का आवेदन दिया. इस स्कीम के तहत, अगर किसी की जमीन को अधिग्रहित किया जाता है, तो बदले में दूसरी जगह जमीन दी जाती है. मसलन, अगर किसी की 2 एकड़ जमीन अधिग्रहित की जाती है तो उसे दूसरी जगह 1 एकड़ जमीन दी जाती है.

आरोप है कि MUDA ने मैसूर की प्राइम लोकेशन पर पार्वती को जमीन दी. ये जमीन 14 अलग-अलग जगहों पर थी. दावा है कि सिद्धारमैया की पत्नी को उन इलाकों में जमीन दी गई, जहां सर्किल रेट ज्यादा था, जिससे उसकी कीमत केसारू की असल जमीन से ज्यादा हो गई.

ये मामला तब सामने आया जब मंजूनाथ स्वामी नाम के व्यक्ति ने मैसूर के डिप्टी कमिश्नर को चिट्ठी लिखकर केसारू गांव की उस जमीन को अपनी पैतृक संपत्ति बताया. स्वामी ने दावा किया कि उसके चाचा देवराज ने धोखे से उस जमीन पर कब्जा कर लिया और बाद में सिद्धारमैया के बहनोई मल्लिकार्जुन को बेच दिया.

कर्नाटक हाईकोर्ट का क्या है कहना?

इस मामले में जब थावरचंद गहलोत ने केस दर्ज कर जांच करने की अनुमति दी तो सिद्धारमैया ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी. 

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हाईकोर्ट ने सिद्धारमैया को झटका देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करना होता है, लेकिन असाधारण परिस्थियों में वो खुद से फैसला ले सकते हैं और मौजूदा मामला ऐसा ही है.

जस्टिस एन नागप्रसन्ना ने कहा कि ये मान लेना मुश्किल है कि सीएम सिद्धारमैया MUDA की जमीन के लेन-देन के दौरान पर्दे के पीछे नहीं थे, जिससे उनके परिवार को कथित रूप से 56 करोड़ रुपये का फायदा हुआ. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ये भी कहा कि सिद्धारमैया 1996 से 1999 तक डिप्टी सीएम और 2013 से 2018 तक मुख्यमंत्री रहे हैं.

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले की जांच की जरूरत है. कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल ने अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए सही फैसला लिया है. सिद्धारमैया की याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने प्रिवेन्शन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 17A के तहत केस दर्ज कर जांच करने की मंजूरी दे दी.

अब आगे क्या?

हाईकोर्ट से झटका मिलने के बाद बीजेपी ने सिद्धारमैया के इस्तीफे की मांग की है. साथ ही इस कथित घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग भी कर रही है. हालांकि, सिद्धारमैया ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है.

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मंगलवार को हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिद्धारमैया ने दावा करते हुए कहा, मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है और मेरे खिलाफ झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं. इसलिए मैं इस्तीफा नहीं दूंगा. राजनीतिक रूप से ये लड़ाई लड़ूंगा.

उन्होंने बीजेपी पर सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाया. सिद्धारमैया ने कहा कि लीगल एक्सपर्ट और पार्टी नेताओं से सलाह-मशविरा करने के बाद वो आगे की कानूनी लड़ाई पर फैसला करेंगे.

फिलहाल, सिद्धारमैया के पास अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के पास जाने का रास्ता बचा है. सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी जा सकती है.

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