
मध्य प्रदेश का कूनो नेशनल पार्क. तकरीबन साल भर पहले यहां से निकला जो विषय गर्व का था, बीते कुछ महीनों से यह शोक में तब्दील होता दिख रहा है. वजह है केंद्र सरकार का महत्वाकांक्षी चीता प्रोजेक्ट, जिसके तहत यहां 20 चीते लाए गए थे. उद्देश्य था कि जो चीते 1948 के बाद देश से विलुप्त हो गए थे, वह फिर से भारतीय जंगलों में दौड़ें, उछलें, छलांगे मारें... मगर अफसोस, हर कुछ दिन बीतने के साथ कूनो से खबर आती हैं कि एक और चीता नहीं रहा. इस तरह अब तक तीन चीतों और उनके तीन शावकों की मौत हो चुकी है. अभी एक और शावक गंभीर है.
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर चीतों की इस अप्रत्याशित मौत की वजहें क्या हैं?
क्या उन्हें भारत रास नहीं आ रहा है?
अगर नहीं तो क्यों, क्या कूनो की जलवायु चीतों के अनुकूल नहीं है?
अगर नहीं तो ऐसा क्या है नामीबिया की जलवायु में जो यहां कूनो में नहीं है?
चीतों के लिहाज से, नामीबिया और भारत की जलवायु में अंतर
इन सारी बातों को मद्देनजर रखते हुए, इन सवालों के जवाब तथ्यों में तलाशने की कवायद शुरू हुई. ऐसे में सबसे पहले जलवायु के अंतर को देखने की कोशिश की गई. Worlddata के मुताबिक, भारत में मई में तापमान सबसे ज्यादा बढ़ जाता है. मई में औसत अधिकतम तापमान 36.5% रहता है. वहीं, सर्दियों की बात करें तो जनवरी में सबसे कम तापमान पहुंच जाता है. भारत में जनवरी में औसत तापमान 26.2°C रहता है.
वहीं, नामीबिया की बात करें तो वहां अक्टूबर सबसे गर्म होता है, हालांकि, वहां अधिकतम औसत तापमान 32.7 °C रहता है. यानी भारत की तुलना में नामीबिया में करीब 4°C तापमान कम होता है. नामीबिया में जून में ठंड पड़ती है, तब वहां सबसे कम औसत तापमान 25.9 °C रहता है. यानी भारत की तुलना में नामीबिया ठंडा रहता है.
रात की बात करें तो भारत में जनवरी में तापमान 13.7 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है. सबसे गर्म रातें जून में 25.9 डिग्री सेल्सियस पर होती हैं. नामीबिया में जुलाई में 7.5 डिग्री सेल्सियस पर रात में सबसे ठंडा और जनवरी में 18.9 डिग्री सेल्सियस पर सबसे गर्म होता है.
भारत में जून में गर्मी तो नामीबिया में सर्दी
नामीबिया और भारत की जलवायु में इस तरह का अंतर देखने के बाद इस तथ्य में मजबूती दिखती है कि, कूनो में चीतों के सर्वाइव न कर पाने की एक वजह दोनों देशों की जलवायु में पाया जाने वाला अंतर है. भारत और नामीबिया के बीच गर्मी और सर्दी के महीनों में भी फर्क है. जहां भारत में जून का महीना प्रचंड गर्मी वाला होता है तो वहीं नामीबिया में इस समय सर्द मौसम होता है.
क्यों हुई शावकों की मौत? बताई गई ये वजह
जब 23 मई को एक शावक की मौत की खबर आई थी, तब कूनो ने अपने जारी बयान में कहा था कि, ''शावक की मौत की वजह कमजोरी के कारण हुई है. जन्म से ही यह शावक चारों शावकों में सबसे छोटा और कमजोर और सुस्त था. इतना ही नहीं ये शावक अन्य की तुलना में दूध भी कम पी रहा था. बता दें कि इस शावक का जन्म 24 मार्च 2023 को ही हुआ था. इसके अलावा तीन शावक और जन्मे थे. 25 मई को इनमें से 2 शावकों की और मौत हो गई. अब मादा चीता ज्वाला की सिर्फ एक संतान जीवित है, हालांकि उसकी भी हालत गंभीर है.
सभी चीता शावक सामान्य से कम वजन और अत्यधिक डिहाइड्रेटेड पाए गए हैं. यानी चीतों की मौत की वजह पानी की कमी से हुई है. तो क्या चीते और उनके शावक यहां गर्मी नहीं झेल पा रहे हैं? यह भी बड़ा सवाल है.
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एक खास तथ्य: ज्यादा नहीं जी पाते हैं चीतों के बच्चे
एक तथ्य पर और निगाह डालने की जरूरत है. फैक्ट है कि सामान्यत: अफ्रीकी देशों में चीता शावकों का सर्वाइवल प्रतिशत काफी कम होता है. प्राकृतिक स्थलों में मात्र 10 में से एक चीता शावक ही वयस्क हो पाता है. '' एक रिसर्च के मुताबिक, चीतों के बच्चे बड़ी मुश्किल से बचते हैं. अफ्रीका में 90 के दशक में हुए एक शोध से ये चौंकाने वाली जानकारी सामने आई थी कि चीतों के 95 फीसदी बच्चे, वयस्क होने से पहले ही मर जाते हैं. यानी चीते के 100 बच्चों में से पांच ही बड़े होने तक जिंदा रहते हैं. 2013 में अफ्रीका के क्गालागाडी पार्क में पाए जाने वाले चीतों पर रिसर्च से पता चला था कि इनके बच्चों के बचने की उम्मीद 36 फीसद तक ही होती है.
बातें जो कूनो के लिए कही गई थीं...
अब वापस कूनो चलते हैं. जब चीता प्रोजेक्ट शुरू किया गया था तो इस महत्वकांक्षी योजना को जमीन देने के लिए कूनो को हर स्तर पर सबसे उपयुक्त पाया गया था.
1. सामने आया था कि, 2010 और 2012 के बीच मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में दस साइट्स का सर्वेक्षण किया गया. बाद में यह पाया गया कि मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में बना कूनो राष्ट्रीय उद्यान ही चीतों के लिए सबसे सही और सुरक्षित जगह है.
2. जिस तापमान और जलवायु की बात हम पहले कर चुके हैं, उस वक्त इस नजरिए से भी कूनो को ही सबसे उचित माना गया था. बताया गया था कि नामीबिया की तरह ही गर्मियों में कूनो नेशनल पार्क का तापमान 35 40 डिग्री तक पहुंच जाता है. यहां तापमान न ज्यादा ठंडा होगा, न अधिक बारिश, और यहां उमस भी ज्यादा नहीं होती है. ऐसे में इस स्थान को चीतों के रहने के लिए उचित ठहराया गया था.
3. इसके अलावा कूनो की ऊंची घास वाले खुले मैदान भी चीतों के रहने, शिकार करने और सर्वाइवल के लिए उचित बताए गए थे. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कूनो नेशनल पार्क में 21 चीतों के रहने की जगह है. अगर 3,200 वर्ग किलोमीटर में सही मैनेजमेंट किया जाए तो यहां पर 36 चीते रह सकते हैं और पूरे आनंद के साथ शिकार कर सकते हैं. कूनो पार्क में चीता के साथ साथ बाघ, शेर और तेंदुए के लिए भी रहने के लिए सबसे बेहतरीन जगह है. इस जंगल में तेंदुओं की आबादी काफी है. यहां प्रति 100 वर्ग किलोमीटर में लगभग 9 तेंदुए पाए जाते हैं.
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कूनो से कब कब आई मौत की खबरें
कूनो के बारे में
मध्य प्रदेश में स्थित है कूनो पालपुर नेशनल पार्क. यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ के कोरिया के साल जंगलों से मिलता जुलता है. कोरिया के साल जंगल ही वह स्थान हैं जहां 1948 में आखिरी बार चीते देखे गए थे. इसे कूनो नाम भी जंगल के बीच बहती कूनो नाम की एक नदी से मिला है. यह नदी मध्यप्रदेश में चंबल की एक सहायक नदी है. 180 किमी लंबी इस नदी की प्रमुख बहाव वाला हिस्सा कूनो नेशनल पार्क के अंदर से होकर गुजरता है. ऐसे में यह नदी इस जंगल को परीकथाओं सरीखा वैभव भी प्रदान करती है, जिनमें एक जंगल, जंगल में नदी और जैव विविधता को पूरा करने वाले जानवर पाए जाते हैं. यह नदी जंगली जानवरों के लिए लाइफ लाइन जैसी भी है. कूनो को सन 2018 में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया था. इसकी स्थापना सन 1981 को एक वन्य अभयारण्य के रूप में की गई थी. यह उद्यान के श्योपुर और मुरैना जिलों तक फैला हुआ है.
केंद्र ने बनाई 11 सदस्यों की कमेटी
कूनो से चीतों की मौत की लगातार आ रही खबरों के बाद केंद्र सरकार ने एक्शन में है. चीता परियोजना की निगरानी के लिए केंद्र ने उच्च स्तरीय पैनल का गठन किया है. केंद्र ने चीता प्रोजेक्ट की प्रगति की समीक्षा और निगरानी के लिए एक 11-सदस्यीय हाई लेवल कमेटी का गठन किया है. यह ईको-टूरिज्म को शुरू करने के लिए भी सुझाव प्रदान करेगी.
मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में दो और चीता शावकों की मौत की खबर आने के कुछ ही समय बाद गुरुवार को ग्लोबल टाइगर फोरम के महासचिव राजेश गोपाल की अध्यक्षता वाली समिति बनाने पर फैसला लिया गया.बता दें कि कुनो नेशनल पार्क में लगभग दो महीने में तीन वयस्क चीते और नामीबिया की मादा चीता, सिसाया से पैदा हुए चार शावकों में से तीन की मौत हो गई है. जिसके कारण कई विशेषज्ञों ने आवास और वन्यजीव प्रबंधन की उपयुक्तता पर सवाल उठाए हैं.
ये लोग हैं कमेटी में शामिल
इस कमेटी के अन्य 10 सदस्यों में राजस्थान के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक आरएन मेहरोत्रा, पीआर सिन्हा, भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व निदेशक एचएस नेगी, पूर्व एपीसीसीएफ, वन्यजीव, और पीके मलिक शामिल होंगे. इसके साथ ही जीएस रावत, WII के पूर्व डीन, अहमदाबाद स्थित सामाजिक कार्यकर्ता मित्तल पटेल, कमर कुरैशी, WII वैज्ञानिक और NTCA के महानिरीक्षक व एमपी के प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन्यजीव और मुख्य वन्यजीव वार्डन अन्य सदस्य हैं. एड्रियन टोरडिफ, पशु चिकित्सा वन्यजीव विशेषज्ञ, प्रिटोरिया विश्वविद्यालय, दक्षिण अफ्रीका सहित अंतरराष्ट्रीय चीता विशेषज्ञों का एक परामर्श पैनल; लॉरी मार्कर, चीता संरक्षण कोष, नामीबिया; एंड्रयू जॉन फ्रेजर, फार्म ओलिवेनबॉश, दक्षिण अफ्रीका और विन्सेंट वैन डैन मर्व, प्रबंधक, चीता मेटापोपुलेशन प्रोजेक्ट, दक्षिण अफ्रीका, आवश्यकता पड़ने पर सलाह प्रदान करेंगे.