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Israel से सीधी लड़ाई हिजबुल्लाह को बना सकती है मुस्लिम देशों का रहनुमा, क्यों चित और पट दोनों में फायदा?

हाल में हिजबुल्लाह चीफ हसन नसरल्लाह को इजरायली डिफेंस फोर्स ने मौत के घाट उतार दिया. इसके बाद से इस चरमपंथी लड़ाका संगठन की चर्चा है. यहां तक कि अरब देशों में लोग अपने बच्चों का नाम मृत लीडर के नाम पर रख रहे हैं. इस जंग में जीत या हार, दोनों ही हिजबुल्लाह के पक्ष में जा सकती है. अगर जीता तो अरब में उसका दबदबा हो जाएगा, और हारने पर सारे मुस्लिम देशों की सहानूभुति मिलेगी.

इजरायल लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं. इजरायल लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 04 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 7:36 AM IST

इजरायल से भिड़ने वाला हिजबुल्लाह इन दिनों जमकर चर्चा में है. अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के देश इस शिया संगठन को उसके चरमपंथी तौर-तरीकों की वजह से आतंकवादी समूह की लिस्ट में रख चुके. वहीं अरब समेत तमाम मुस्लिम देशों के लिए ये बगावत का प्रतीक बन रहा है. खासकर इजरायल से जंग में अपने लीडर हसन नसरल्लाह को खोने के बाद से इसे काफी सपोर्ट मिल रहा है. यहां तक जंग खत्म होते तक ये इस्लामिक देशों के लीडर की तरह उभर सकता है. 

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मिडिल ईस्ट में हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं. ईरान ने मंगलवार को इजरायल पर दर्जनों मिसाइलें दागीं. साथ ही इसे हिजबुल्लाह चीफ की हत्या का इंतकाम बताया. आतंकी गुट को अरब देशों समेत बहुत से मुस्लिम देशों की संवेदना मिल रही है. इसके बाद से उसका आत्मविश्वास भी बढ़ा हुआ है.

इस संगठन के पक्ष में कई बातें जा रही हैं

दक्षिणी लेबनान में, जहां इजरायली सेना घुसने की कोशिश में है, वो इसी का हेडक्वार्टर है. यानी वो इसके चप्पे-चप्पे से वाकिफ है. इस बात का रणनीतिक फायदा तो उसे मिलेगा ही. साथ ही अरब देशों का पूरा सपोर्ट भी मिलेगा, चाहे जीत हो या हार. इसकी भी दो वजहें हैं. एक- पिछले सत्तर दशक से हो रही फिलिस्तीन की मांग के लिए वो हमास से भी एक कदम आगे बढ़ता दिख रहा है. दूसरी वजह है उसकी इजरायल से सीधी भिड़ंत. लगभग सारे इस्लामिक देश इस यहूदी देश से सीधी टक्कर लेने से डरते हैं. ऐसे में वे हिजबुल्लाह के जरिए अपने हित साध सकते हैं. 

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क्या है हिजबुल्लाह का इतिहास

इसकी नींव ईरान ने इजरायल को पछाड़ने के लिए अस्सी के दशक में रखी थी. यह शिया संगठन है, जो लेबनान में बेहद ताकतवर है. इसे फिलहाल दुनिया की सबसे ताकतवर मिलिशिया की तरह भी देखा जा रहा है, जिसका काम इजरायल की नाक में दम किए रखना है. इसकी मुख्य फंडिंग ईरान करता है तो कह सकते हैं कि इसका काम मिडिल ईस्ट में इस देश को सबसे शक्तिशाली बनाए रखना भी रहा. लेकिन अब समीकरण बदल रहे हैं और संगठन बाकी देशों से भी कनेक्ट होता दिख रहा है. 

सीरियाई सिविल वॉर के दौरान इस देश ने वहां के शिया समुदाय को सपोर्ट किया सुन्नी-बहुल विपक्षियों के खिलाफ लड़ा. इसके बाद से सीरिया का शिया समुदाय भी खुलकर हिजबुल्लाह के साथ हो चुका. इनके अलावा तमाम शिया संगठन और मिलिशिया जिस तरह से अपने-अपने देशों में इसके सपोर्ट में बात कर रहे हैं, इससे अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि इसे व्यक्तिगत तौर पर भी फंडिंग और बाकी मदद मिलती होगी. 

रूस ने भी एक वक्त पर की थी मदद

इजरायल की हिजबुल्लाह से जंग जैसी दिख रही है, कुछ उतनी सरल भी नहीं. इसमें कई छिपे हुए कोने हैं. जैसे एक वक्त पर रूस इस गुट को सपोर्ट करता रहा. ये सीरियाई सिविल वॉर की बात है. द वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, रूस ने इसे काफी रणनीतिक सहयोग दिया था ताकि सीरिया में उसके मुताबिक सरकार बनी रहे. अब चूंकि युद्ध में इजरायल के जरिए अमेरिका भी इनवॉल्व होता दिख रहा है, लिहाजा पावर डायनेमिक्स के लिए रूस की एंट्री भी हो सकती है, भले ही पीछे के दरवाजे से सही. 

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जमीनी और राजनैतिक दोनों ही पकड़

हिजबुल्लाह सिर्फ मिलिशिया नहीं, बल्कि ये राजनैतिक पकड़ भी रखता है. धीरे-धीरे इसने लेबनानी सिस्टम पर अपनी मजबूती बढ़ाई. साल 2008 से, संगठन और इसके सपोर्टर अमल ने किसी भी सरकारी फैसले पर वीटो का पावर हासिल कर लिया. इसकी पॉलिटिकल ताकत का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि लेबनानी संसद के अध्यक्ष नबीह बेरी ने साफ कह दिया कि जब तक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को हिजबुल्लाह से मंजूरी नहीं मिलेगा, तब तक राष्ट्रपति चुनाव ही नहीं होगा. 

फिलहाल जो स्थिति है, उसमें ये मैसेज जा रहा है कि फिलिस्तीन समेत मुस्लिम हितों का रखवाला यही गुट है. इससे उसका कद तो बढ़ेगा ही, साथ ही ग्लोबल तौर पर उसके पक्ष में सहानुभूति रखने और मदद करने वाले बढ़ेंगे. 

इसका एक और पहलू भी हो सकता है

तेल अवीव जिस तरह से आक्रामक है, हो सकता है कि वो हिजबुल्लाह के काफी ठिकानों को खत्म कर उसे कमजोर बना दे. सीरियाई सिविल वॉर के बाद भी यही हुआ था. सीरिया में उसके दखल पर लेबनान और सीरिया दोनों ही देशों से नागरिक उससे नाराज हो गए. इससे उसकी जमीनी और राजनैतिक ताकत भी घटी. साथ ही साथ उसने काफी सारे लड़ाके भी खोए. इसके बाद से वो दोबारा कभी उतना मजबूत नहीं हो सका. आतंकी संगठन के तौर पर स्थापित हो जाने से उसे फंडिंग भी लुक-छिपकर होने लगी क्योंकि मदद कर रही ताकतों को खुद पर पाबंदी का डर रहा. 

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