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कौन सुलगा रहा है मणिपुर? जानिए किन उग्रवादी संगठनों के कारण 19 महीने से जारी है हिंसा

तीन मई 2023 से शुरू हुई मणिपुर में हिंसा अब तक जारी है. सैकड़ों मौतों के बावजूद मणिपुर शांत नहीं हो रहा है. मणिपुर में शांति बहाल करने के लिए की गई सारी कोशिशें नाकाम रही हैं. ऐसे में जानते हैं कि ऐसा क्या है कि डेढ़ साल से मणिपुर हिंसा की आग में जल रहा है.

मणिपुर में 3 मई 2023 से हिंसा जारी है. (फाइल फोटो-PTI) मणिपुर में 3 मई 2023 से हिंसा जारी है. (फाइल फोटो-PTI)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 03 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 1:52 PM IST

मणिपुर 19 महीने से हिंसा की आग में जल रहा है. अब तक सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं. हजारों परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर रिलीफ कैम्प में रहना पड़ रहा है. मगर मणिपुर शांत होने की बजाय भड़कता ही जा रहा है.

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में पिछले साल 3 मई को तब हिंसा भड़क गई थी, जब कुकी समुदाय की ओर से 'आदिवासी एकता मार्च' निकाला जा रहा था. ये मार्च चुरचांदपुर के तोरबंग इलाके से निकल रहा था. ये मार्च मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग के खिलाफ निकाला जा रहा था. इसी दौरान कुकी और मैतेई समुदाय के बीच हिंसक झड़प हो गई थी. तब से ही वहां हालात तनावपूर्ण बने हैं.

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कुकी और मैतेई के बीच झगड़ा सुलझाने के लिए तमाम कोशिशें की जा रहीं हैं. हालात सामान्य करने के लिए सेना को भी उतारना पड़ा. मगर तमाम कोशिशों के बावजूद मणिपुर में हालात ठीक क्यों नहीं हो पा रहे हैं? इसकी वजह है वहां के कुकी-जो और मैतेई से जुड़े संगठन. इन संगठनों के पास हजारों की संख्या में लड़ाके हैं. हथियार हैं. और वो सारी चीजें हैं, जो हिंसा को शांत नहीं होने देतीं.

कौन-कौन से संगठन हैं एक्टिव?

डेढ़ साल से भी लंबे वक्त से हिंसा से जूझ रहे मणिपुर में वैसे तो कई सारे संगठन हैं. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में तीन संगठनों के नाम हैं. ये संगठन कुकी-जो और मैतेई के हैं.

इनके नाम हैं- ITLF यानी इंडीजिनियस ट्राइबल लीडर्स फोरम. ये कुकी समुदाय का संगठन है. दूसरा है- आरामबाई टेंगोल और मैतेई लिंपुन. ये दोनों मैतेई समुदाय के संगठन हैं. इन संगठनों का पूरा मणिपुर में नेटवर्क है.

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ये तीनों ही संगठन बहुत ज्यादा पुराने नहीं हैं. ITLF का गठन तो 9 जून 2022 को हुआ था. वहीं, आरामबाई टेंगोल 2020 में और मैतेई लिंपुन 2015 में बना था.

क्या है इन तीनों संगठनों की कहानी?

- ITLF: इस संगठन का गठन जून 2022 में हुआ था. लगभग ढाई साल पुराने इस संगठन में पैते ट्राइब काउंसिल, कुकी इन्पी, सिम्ते ट्राइब काउंसिल, वेईफेई पीपल्स काउंसिल, मिजो पीपल्स कन्वेंशन, हमार इन्पुई, यूनाइटेड जो ऑर्गनाइजेशन और गांगते ट्राइब यूनियन जैसे संगठन शामिल हैं. ये कुकी समुदाय का संगठन है. ITLF के महासचिव मुआन तोंबिंग के खिलाफ पिछले साल सरकार ने देशद्रोह का केस दर्ज किया था. कुछ महीने पहले ही ITLF के नेता गिंजा वुआलजोंग पर मणिपुर में 3 मई 2023 को हिंसा भड़काने के आरोप में केस दर्ज किया गया है. ITLF मणिपुर में अलग सरकार की मांग कर रहा है.

- आरामबाई टेंगोलः ये मैतेई का संगठन है. इसकी स्थापना मणिपुर के राजा और राज्यसभा सांसद लैशेम्बा सनाजाउबा ने की थी. रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी इंफाल में आरामबाई टेंगोल की 50 से ज्यादा खुफिया यूनिट हैं. इसके सदस्य हमेशा काली टी-शर्ट पहनते हैं, जिस पर तीन घुड़सवारों का लोगो होता है. इस संगठन का मकसद मैतेई समुदाय के बीच सनामाही धर्म को फिर से स्थापित करना था. लेकिन अब इसकी गिनती कट्टरपंथी संगठन में होती है. मणिपुर में हिंसा में इस संगठन का नाम आता रहता है. संगठन के सदस्यों पर कुकी लोगों और उनके गांवों पर हमला करने का आरोप है. माना जाता है कि मणिपुर की सरकार का समर्थन भी इसे मिला है.

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- मैतेई लिपुनः इसकी शुरुआत 2015 में हुई थी. मैतेई लिपुन के मुखिया प्रमोद सिंह का कहना है कि ये एक संगठन नहीं, बल्कि आंदोलन है. प्रमोत सिंह दावा करते है्ं कि कुकी मणिपुर के मूल निवासी नहीं है. इसके बावजूद उन्हें जनजाति का दर्जा दे दिया गया. उनका ये भी दावा कि 15 साल में मणिपुर में 14 हजार से ज्यादा कुकी गांव बस गए हैं. मैतेई लिपुन का कैडर दो हिस्सों में बंटा है. एक- जो हथियार चलाना जानता है. और दूसरा- जो लोगों के बीच में रहकर उनकी मदद करता है. मई 2023 की हिंसा भड़काने के लिए मैतेई लिपुन को भी जिम्मेदार माना जाता है. 8 जुलाई 2023 को पुलिस ने प्रमोत सिंह के खिलाफ हिंसा भड़काने, दो समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ाने और आपराधिक साजिश रचने के आरोप में केस दर्ज किया था.

मणिपुर में किस बात पर है लड़ाई?

मणिपुर में ये सारी लड़ाई जनजाति के दर्जे को लेकर है. पिछले साल अप्रैल में मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश देते हुए कहा था कि वो मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग पर विचार करे. इस पर कुकी और नगा समुदाय भड़क गए. तीन मई को रैली निकाली गई और यहीं से हिंसा भड़क गई. 

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मणिपुर में मैतेई समुदाय की आबादी 53 फीसदी से ज्यादा है. ये गैर-जनजाति समुदाय है, जिनमें ज्यादातर हिंदू हैं. वहीं, कुकी और नगा की आबादी 40 फीसदी के आसपास है.

राज्य में इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद मैतेई समुदाय सिर्फ घाटी में ही बस सकते हैं. मणिपुर का 90 फीसदी से ज्यादा इलाकी पहाड़ी है. सिर्फ 10 फीसदी ही घाटी है. पहाड़ी इलाकों पर नगा और कुकी समुदाय का तो घाटी में मैतेई का दबदबा है.

मणिपुर में एक कानून है. इसके तहत, घाटी में बसे मैतेई समुदाय के लोग पहाड़ी इलाकों में न बस सकते हैं और न जमीन खरीद सकते हैं. लेकिन पहाड़ी इलाकों में बसे जनजाति समुदाय के कुकी और नगा घाटी में बस भी सकते हैं और जमीन भी खरीद सकते हैं. 

पूरा मसला इस बात पर है कि 53 फीसदी से ज्यादा आबादी सिर्फ 10 फीसदी इलाके में रह सकती है, लेकिन 40 फीसदी आबादी का दबदबा 90 फीसदी से ज्यादा इलाके पर है.

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