
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मामला शांत नहीं हो पा रहा है. शिंदे सरकार ने मराठाओं को 10 फीसदी आरक्षण वाला बिल पास जरूर कर दिया है, लेकिन अब भी विरोध खत्म नहीं हुआ है.
मराठा आरक्षण के लिए लंबे वक्त से आंदोलन कर रहे मनोज जरांगे ने इस बिल का विरोध किया है. उन्होंने 24 फरवरी से आंदोलन करने का ऐलान किया है.
20 फरवरी को शिंदे सरकार ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर मराठाओं को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण का बिल पास किया था. महाराष्ट्र में पहले ही 52 फीसदी आरक्षण था. मराठाओं के लिए अलग से 10 फीसदी आरक्षण के साथ अब वहां 62 फीसदी आरक्षण हो गया है. जबकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.
अभी ये बिल विधानसभा में पास हुआ है. अब इसे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे विधान परिषद में पेश करेंगे. वहां पास होने और राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद ये कानून बन जाएगा.
क्या है बिल में प्रावधान?
- महाराष्ट्र में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मराठाओं को 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. राज्य में मराठाओं की आबादी 28 फीसदी है.
- मराठा कोटा बिल में ये भी प्रावधान किया गया है कि आरक्षण की व्यवस्था लागू होने के 10 साल बाद फिर से रिव्यू किया जाएगा.
- बिल पेश करते हुए सीएम शिंदे ने बताया कि 22 राज्यों में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी के पार जा चुकी है. तमिलनाडु और बिहार में 69 फीसदी आरक्षण है.
फिर दिक्कत क्या है?
- दरअसल, सरकार ने मराठा को जो आरक्षण दिया है, वो अलग से दिया है. जबकि, मराठा ओबीसी के अंदर ही आरक्षण मांग रहे थे.
- मनोज जरांगे का कहना है कि आरक्षण 10 फीसदी है या 20 फीसदी, इससे फर्क नहीं पड़ता. कोटा ओबीसी के अंदर मिलना चाहिए था, न कि अलग से.
- उनका कहना है कि सरकार ने उन्हें वो दिया, जिसे वो मांग ही नहीं रहे थे. जरांगे ने कहा कि हम ओबीसी के अंदर ही आरक्षण मांग रहे थे, लेकिन उन्होंने हमें अलग से कोटा दिया है.
- उन्होंने कहा कि ओबीसी के दायरे से बाहर कोटा देने को कानूनी चुनौती मिल सकती है, क्योंकि इससे आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा हो गई है.
मराठाओं की मांग क्या है?
- मराठा खुद को कुनबी समुदाय का बताते हैं. कुनबी को महाराष्ट्र में ओबीसी कैटेगरी में रखा गया है. वो इसी आधार पर आरक्षण की मांग कर रहे हैं.
- मनोज जरांगे का कहना है कि मराठा और कुनबी एक ही हैं. संभाजी ब्रिगेड से जुड़े प्रवीण गायकवाड़ ने एक बार बताया था कि मराठा कोई जाति नहीं है. जो लोग महाराष्ट्र में रहते हैं, वो मराठा हैं.
- गायकवाड़ के मुताबिक, जाति तो व्यवसाय के आधार पर तय की गई थी. कुनबी तो सीमांत किसान थे. उनमें से जो लोग खेती-बाड़ी का काम निपटाने के बाद एक क्षत्रिय की भांति योद्धा की भूमिका निभाते थे, उन्हें मराठा कहा गया.
- कुनबी जाति को ओबीसी में शामिल किया गया है. उन्हें सरकारी नौकरियों से लेकर शैक्षणिक संस्थानों तक में आरक्षण मिलता है. मनोज जरांगे मराठियों को कुनबी जाति का सर्टिफिकेट देने और इसके तहत ही आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं.
- इनका दावा है कि सितंबर 1948 तक निजाम का शासन खत्म होने तक मराठाओं को कुनबी माना जाता था और ये ओबीसी थे. इसलिए अब फिर इन्हें कुनबी जाति का दर्जा दिया जाए और ओबीसी में शामिल किया जाए.
अलग से कोटे का विरोध क्यों?
- उसकी वजह है. मनोज जरांगे का कहना है कि अलग से 10 फीसदी कोटा कानूनी चुनौतियों के सामने नहीं टिक पाएगा. क्योंकि आरक्षण की सीमा 50 फीसदी के पार चली गई है.
- महाराष्ट्र में कई बार मराठाओं को अलग से आरक्षण देने की कोशिश की गई, लेकिन इसे हर बार अदालत में चुनौती मिली.
- साल 2014 के विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण मराठाओं को 16 फीसदी आरक्षण देने के लिए अध्यादेश लेकर आए थे. लेकिन फिर कांग्रेस-एनसीपी चुनाव हार गई. और राज्य में बीजेपी-शिवसेना की सरकार बनी. नवंबर 2014 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी.
- फडणवीस की सरकार में फिर मराठाओं को 16 फीसदी आरक्षण मिला. लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे कम करते हुए सरकारी नौकरियों में 13% और शैक्षणिक संस्थानों में 12% कर दिया. मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया, क्योंकि इससे राज्य में आरक्षण की सीमा 50% से ज्यादा हो रही थी.
- अब शिंदे सरकार ने जो अलग से कोटा दिया है, उससे महाराष्ट्र में आरक्षण की सीमा 62% पहुंच गई है. इसलिए कोर्ट में इसे चुनौती मिल सकती है और इसे रद्द किया जा सकता है. यही वजह है कि मराठा ओबीसी कोटे के अंदर ही अपने लिए आरक्षण मांग रहे हैं.
मराठा आरक्षण की आग...
- महाराष्ट्र में मराठा लंबे समय से अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं. साल 1982 में मराठा आरक्षण को लेकर पहली बार बड़ा आंदोलन हुआ था.
- 1982 में मठाड़ी नेता अन्नासाहेब पाटिल ने आर्थिक स्थिति के आधार पर मराठाओं को आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन किया था. सरकार ने उनकी मांग को नजरअंदाज किया तो उन्होंने खुदकुशी कर ली थी.
सियासत में कितने ताकतवर हैं मराठा?
- महाराष्ट्र की सियासत में मराठाओं का अच्छा-खासा दखल है. 1950 से 1980 के दशक तक मराठाओं की पसंद कांग्रेस हुआ करती थी. लेकिन बाद में इनका राजनीतिक रुख बदलता गया.
- कांग्रेस के बाद मराठा एनसीपी की ओर चले गए. बाद में शिवसेना और फिर बीजेपी की तरफ इनका रुझान बढ़ गया. अनुमान है कि अब बीजेपी को मराठा-कुनबी समुदाय से अच्छे-खासे वोट मिलते हैं.
- मार्च 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि महाराष्ट्र में मराठा सामाजिक और राजनीतिक रूप से काफी सक्षम हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महाराष्ट्र के 40 फीसदी से ज्यादा विधायक और सांसद मराठा समुदाय से होते हैं.
- एक स्टडी के मुताबिक, महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में लगभग 45 फीसदी सीटें मिलती रहीं हैं. 1980 का दशक छोड़ दिया तो कभी भी महाराष्ट्र की कैबिनेट में कभी भी हिस्सेदारी कभी भी 52 फीसदी से कम नहीं हुई है.
- इतना ही नहीं, 1960 में महाराष्ट्र के गठन के बाद से अब तक 20 मुख्यमंत्री बने हैं, जिनमें 12 मराठा समुदाय से ही रहे हैं. मौजूदा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे भी मराठा हैं.
मराठाओं की पसंद रही है बीजेपी-शिवसेना!
- महाराष्ट्र में मराठाओं की पसंद बीजेपी और शिवसेना रही है. चुनाव बाद हुए सर्वे बताते हैं कि मराठाओं के सबसे ज्यादा बीजेपी और शिवसेना को मिलते रहे हैं.
- 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 24% और शिवसेना को 30% वोट मराठाओं के मिले थे. इससे पहले हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को 52% वोट मराठाओं के हासिल हुए थे.
- वहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना को 39% और बीजेपी को 20% वोट मराठाओं के मिले थे. इसी तरह, उस साल हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना गठबंधन को 57% वोट मराठाओं ने दिया था.
- बीते दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनाव का ट्रेंड बताता है कि महाराष्ट्र में सत्ता की चाबी मराठा वोटों के हाथ में है.