
जुलाई की शुरुआत से ही नया क्रिमिनल लॉ लागू हो गया. आज की जरूरत के हिसाब से अपडेटेड और सिटिजन-फ्रैंडली मानी जा रही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता या बीएनएसएस में पुलिस की जिम्मेदारी भी बढ़ा दी गई. साथ ही इसके लिए उन्हें नए सिरे से ट्रेनिंग दी जाएगी.
शिकायत दर्ज करना जरूरी
बीएनएसएस की धारा 173 के अनुसार, पुलिस अधिकारी किसी पीड़ित की एफआईआर लिखने से इस आधार पर इनकार नहीं कर सकते कि घटना दूसरे क्षेत्र में हुई, या फिर विवादित क्षेत्र में हुई. उन्हें जीरो एफआईआर दर्ज करनी होगी, जिसके बाद वे केस संबंधित पुलिस थाने में ट्रांसफर करेंगे. इससे पहले बहुत से ऐसे मामले हुए, जब विवादित क्षेत्र के हवाले से पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की.
ई-सूचना का प्रावधान भी
सूचना बोलकर, लिखकर या इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भी दी जा सकती है, अगर जानकारी देने वाला शख्स तीन दिन के भीतर उस पर साइन कर दे. जानकारी देने का इलेक्ट्रॉनिक तरीका सरकारी संस्थाएं तय करेंगी. इन संस्थाओं में क्राइम और क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम्स पोर्टल के अलावा पुलिस की वेबसाइट या ऐसी ईमेल आईडी शामिल हो सकती है, जो खासकर इसी के लिए बनी हो ताकि सूचना या शिकायत चूक न जाए.
पुलिस अधिकारी अपनी ड्यूटी से कहीं चूक न जाएं, इसके लिए उन्हें डिजिटल सबूत इकट्ठे करने की ट्रेनिंग मिलेगी. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस की मदद के लिए मास्टर ट्रेनर भी तैयार किए गए हैं.
वीडियोग्राफी के लिए हो सकता है प्रशिक्षण
पुलिस द्वारा ली जाने वाली तलाशी के दौरान, कुछ चीजों की वीडियोग्राफी जरूरी है. इसमें घटनास्थल की वीडियो, फॉरेंसिक साक्ष्य इकट्ठा करने की प्रक्रिया और किसी जगह की तलाशी लेने या किसी प्रॉपर्टी को कब्जे में लेने की प्रक्रिया शामिल है.जांच अधिकारियों को ऐसे काम करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के साथ-साथ ट्रेनिंग भी दी जाएगी.
जांच करने वाले पुलिस अधिकारी को पीड़ित के स्टेटमेंट को सिर्फ ऑडियो की बजाए, वीडियो शूट भी करना होगा. इसके अलावा, 7 साल या इससे ज्यादा की सजा वाले क्राइम के लिए अनिवार्य तौर पर फॉरेंसिक एक्सपर्ट को अपने साथ रखना होगा.
नेशनल इंफॉर्मेशन सेंटर ने ई-साक्ष्य डिजाइन किया है. इसमें कई फोटो और वीडियो कैप्चर किए जा सकते हैं. इसका इस्तेमाल करके गवाहों की तस्वीरें ली जा सकती हैं. हर आइटम जियो-टैग्ड होगा और समय भी लिखा होगा ताकि डेटा पक्के रहें.
आरोपी की गिरफ्तारी का क्या प्रावधान
बीएनएसएस की धारा 37 के तहत हरेक पुलिस स्टेशन में एक पुलिस अधिकारी रहेगा, जो असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर के नीचे की श्रेणी का नहीं होना चाहिए. इस अधिकारी का काम गिरफ्तार किए गए लोगों के बारे जानकारी इकट्ठा करना और उसे थाने में डिस्प्ले करना है. इसलिए, पुलिस थानों में डिजिटल बोर्ड्स रहने चाहिए, जिनपर अपराधी का नाम, पता और उसने क्या अपराध किया है, ये पता लगता रहे. यह बोर्ड स्टेशन के ठीक बाहर के साथ-साथ कंट्रोल रूम में भी रहेगा.
बीमार और कमजोर या बुजुर्ग व्यक्तियों की गिरफ्तारी के लिए, धारा 35 में कहा गया है कि तीन साल से कम सजा वाले अपराध के लिए आरोपी की गिरफ्तारी में डीएसपी रैंक के अधिकारी की इजाजत चाहिए होगी. आईओ हथकड़ी का भी उपयोग कर सकता है लेकिन सावधानी बरतते हुए.
कितने समय के भीतर, कौन सा काम
- पॉक्सो के केस में अपराध की जानकारी मिलने के दो महीनों के भीतर जांच पूरी हो जानी चाहिए. पहले ये टाइम लिमिट रेप के मामलों में थी.
- बीएनएसएस की धारा 184(6) के तहत रेप के मामलों में, रजिस्टर्ड मेडिकल अधिकारी को 7 दिन के भीतर रिपोर्ट आईओ को भेजना जरूरी है. आईओ इसे संबंधित मजिस्ट्रेट को भेजेगा.
- एसपी या उससे ऊपर की रैंक के अधिकारी यह तय कर सकेंगे कि बीएनएस की धारा 113 के तहत मामला दर्ज किया जाए या नहीं. ये धारा अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट (यूएपीए) के लिए है.
और क्या-क्या बदल चुका
जुलाई की पहली तारीख से 1860 में बनी आईपीसी की जगह भारतीय न्याय संहिता, 1898 में बनी सीआरपीसी की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और 1872 के इंडियन एविडेंस एक्ट की जगह भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने ले ली. इसके बाद से कई नियम-कायदे बदल गए. कई ऐसे मामले हैं, जहां सजा मिलने पर उसके खिलाफ अपील नहीं की जा सकेगी. वहीं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता को लाने का मकसद, जेल में कैदियों की संख्या कम करना है. कानून की धारा 479 में प्रावधान किया गया है कि अगर कोई अंडर ट्रायल कैदी अपनी एक तिहाई से ज्यादा सजा जेल में काट चुका है तो उसे जमानत पर रिहा किया जा सकता है. हालांकि, ये राहत सिर्फ पहली बार अपराध करने वाले कैदियों को ही मिलेगी. उम्रकैद वालों पर ये नियम लागू नहीं होता.