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क्या नंबरगेम में अटक जाएगा One Nation-One Election बिल? क्यों मोदी सरकार के लिए इसे पास कराना है टेढ़ी खीर

एक देश-एक चुनाव को लेकर बिल संसद में पेश हो गया है. सरकार ने मंगलवार को इसे लोकसभा में पेश कर दिया. पेश होते ही इस बिल पर घमासान भी शुरू हो गया. सरकार अब इसे जेपीसी के पास भेज सकती है. लेकिन इस बिल को पास कराना के लिए सरकार के टेढ़ी खीर साबित हो सकता है.

वन नेशन-वन इलेक्शन का बिल लोकसभा में पेश हो गया है. (फोटो-PTI) वन नेशन-वन इलेक्शन का बिल लोकसभा में पेश हो गया है. (फोटो-PTI)
हिमांशु मिश्रा
  • नई दिल्ली,
  • 17 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 1:59 PM IST

मोदी सरकार जिस 'एक देश-एक चुनाव' की बात सालों से करती आ रही थी, अब उसे अमलीजामा पहनाने की तैयारी शुरू हो गई है. सरकार ने एक देश-एक चुनाव वाला बिल लोकसभा में मंगलवार को पेश कर दिया. कुछ दिन पहले ही मोदी कैबिनेट ने इस बिल को मंजूरी दी थी. अब इस बिल को सरकार संसद की संयुक्त समिति यानी जेपीसी के पास भेज सकती है.

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एक देश-एक चुनाव के लिए सरकार दो बिल लेकर आई है. एक बिल संविधान संशोधन है. जबकि, दूसरा बिल जम्मू-कश्मीर और दिल्ली समेत केंद्र शासित प्रदेशों में एक साथ चुनाव कराने से जुड़ा है.

देशभर में एक साथ चुनाव कराए जाने को लेकर पिछले साल सितंबर में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया था. कमेटी ने मार्च में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इसी साल सितंबर में मोदी कैबिनेट ने इस रिपोर्ट को मंजूरी दी थी. इस रिपोर्ट में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा और पंचायत चुनाव एक साथ कराए जाने को लेकर सुझाव दिए गए थे.

हालांकि, सरकार के लिए इस बिल को पास कराना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. वो इसलिए क्योंकि इनमें से एक संविधान संशोधन बिल है, जिसे पास कराने के लिए सरकार के पास बहुमत नहीं है.

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कहां फंस सकता है मामला?

एक देश-एक चुनाव का संविधान संशोधन बिल पास कराना सरकार के लिए आसान नहीं होगा. चूंकि ये बिल संविधान संशोधन करेगा, इसलिए ये तभी पास होगा, जब इसे संसद के दो तिहाई सदस्यों का समर्थन मिलेगा.

संसद में एनडीए के पास दो तिहाई बहुमत नहीं है. लोकसभा में अगर सभी 543 सांसद वोटिंग में शामिल होंगे, तो बिल पास कराने के लिए 362 वोट चाहिए होंगे. इसी तरह राज्यसभा में इस बिल को पास कराने के लिए 164 वोट की जरूरत होगी.

अभी लोकसभा में एनडीए के पास 292 सीटें हैं. जबकि, राज्यसभा में 112 सीटें हैं. 6 मनोनीत सांसद भी एनडीए के साथ हैं.

वहीं, इस बिल का विरोध करने वाली पार्टियों के पास लोकसभा में 205 और राज्यसभा में 85 सीटें हैं. कुल मिलाकर, सरकार को इस बिल को पास कराने के लिए विपक्ष की जरूरत होगी.

सरकार को किस-किसका साथ मिल सकता है?

एक देश, एक चुनाव सरकार अगर बिल लाती है तो उसे पास करवाने के लिए राजनीतिक पार्टियों के समर्थन की जरूरत होगी. 

केंद्र की एनडीए सरकार में बीजेपी के अलावा चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी, नीतीश कुमार की जेडीयू और चिराग पासवान की एलजेपी (आर) बड़ी पार्टियां हैं. जेडीयू और एलजेपी (आर) तो एक देश, एक चुनाव के लिए राजी हैं, जबकि टीडीपी ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया था. 

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पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अगुवाई बनी समिति ने 62 राजनीतिक पार्टियों से संपर्क किया था. इनमें से 32 ने एक देश, एक चुनाव का समर्थन किया था. जबकि, 15 पार्टियां इसके विरोध में थीं. 15 ऐसी पार्टियां थीं, जिन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था.

जेडीयू और एलजेपी (आर) ने एक देश, एक चुनाव का ये कहते हुए समर्थन किया था कि इससे समय और पैसे की बचत हो सकेगी. टीडीपी ने कोई जवाब नहीं दिया था. हालांकि, 2018 में लॉ कमीशन के सामने टीडीपी ने ये तर्क दिया था कि इससे संविधान के मूल ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है. 

वहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, सीपीएम और बसपा समेत 15 पार्टियों ने इसका विरोध किया था. जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा, टीडीपी, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग समेत 15 पार्टियों ने कोई जवाब नहीं दिया था.

क्या संशोधन करना होगा?

समिति ने सुझाव दिया था कि इसके लिए संविधान में अनुच्छेद 82A जोड़ा जाए. अनुच्छेद 82A अगर जुड़ता है तो लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हो सकते हैं.

अगर संविधान में अनुच्छेद 82A जोड़ता है और इसे लागू किया जाता है तो सभी राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल लोकसभा के कार्यकाल के साथ ही खत्म हो जाएगा. यानी, अगर अगर ये अनुच्छेद 2029 से पहले लागू हो जाता है तो सभी विधानसभाओं का कार्यकाल 2029 तक होगा.

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इसका मतलब ये होगा कि सभी राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल लोकसभा के कार्यकाल के साथ ही खत्म हो जाएगा. यानी कि अगर किसी राज्य में विधानसभा चुनाव 2027 में होते हैं तब भी उसका कार्यकाल जून 2029 तक ही होगा. इस हिसाब से सभी राज्यों में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा के चुनाव भी कराए जा सकेंगे.

एक साथ चुनाव पर क्या थी सिफारिश?

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अगुवाई में बनी कमेटी ने इसी साल 14 मार्च को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को रिपोर्ट सौंपी थी. साढ़े 18 हजार पन्नों की इस रिपोर्ट में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ-साथ नगर पालिकाओं और पंचायत चुनाव करवाने से जुड़ी सिफारिशें थीं. कमेटी ने दो चरणों में एक साथ चुनाव कराने का सुझाव दिया था.

पहले चरण में लोकसभा के साथ-साथ सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव करवा दिए जाएं. समिति ने सिफारिश की थी कि 2029 में इसकी शुरुआत की जा सकती है, ताकि फिर हर पांच साल में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी हो सकें.

जबकि, दूसरे चरण में नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनाव करवाए जाएं. नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनाव लोकसभा-विधानसभा चुनाव खत्म होने के 100 दिन के भीतर कराए जाने चाहिए.

बिल से कानून बनने में कितने पड़ाव?

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अभी सरकार ने इसका बिल पेश किया है. इस बिल को जेपीसी के पास भेजा जाएगा. जेपीसी के पास इसे इसलिए भेजा जाएगा, ताकि सभी पार्टियों की राय और सहमति बन सके.

जेपीसी की रिपोर्ट के आधार पर फिर से बिल को संसद में पेश किया जाएगा. अगर संसद के दोनों सदनों में ये बिल पास हो जाता है तो इसे फिर राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही ये बिल कानून बनेंगे.

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