
कामकाजी महिलाओं को पीरियड के दौरान लीव मिलनी चाहिए या नहीं? इस पर विवाद भी होता है और बहस भी. सालों से भारत में पीरियड लीव की मांग भी होती है तो कई इसका विरोध भी करते हैं. खुद महिलाएं भी इसका विरोध करती हैं. पर अब सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड लीव पर केंद्र सरकार को एक मॉडल पॉलिसी बनाने का निर्देश दिया है.
चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि पीरियड लीव नीति से जुड़ा मुद्दा है और इस पर अदालत में विचार नहीं किया जा सकता.
बेंच ने कहा कि अदालत अगर फैसला सुनाती है तो ये हानिकारक हो सकता है और कंपनियां महिलाओं को नौकरी पर रखने से बच सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि असल में ये सरकारी नीति का मामला है और अदालत को इस पर गौर नहीं करना चाहिए.
कोर्ट ने नीति तय करने के लिए केंद्र सरकार को सभी राज्यों और पक्षों के साथ बातचीत करने को भी कहा है. कोर्ट ने ये भी साफ किया कि अगर कोई राज्य इसे लेकर कुछ कदम उठा रहा होगा, तो केंद्र सरकार उनके रास्ते में नहीं आएगी.
इससे पहले पिछली साल भी जब पीरियड लीव की मांग को लेकर याचिका दाखिल हुई थी तो चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने याचिकाकर्ता को नीति बनाने के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से संपर्क करने की सलाह दी थी. हालांकि, याचिकाकर्ता का कहना है कि केंद्र ने अब तक इस पर कोई फैसला नहीं लिया है.
पर पीरियड लीव की जरूरत क्यों?
इससे मतलब है कि जब किसी महिला को पीरियड आए तो उसे दफ्तर से छुट्टी मिले और इस छुट्टी का पैसा न काटा जाए.
पीरियड आना एकदम सामान्य बात है. ज्यादातर महिलाओं का मेन्स्ट्रुअल साइकल 28 दिनों का होता है. लेकिन किसी-किसी को 21 से 35 दिनों में भी पीरियड आ सकते हैं.
पीरियड लीव की वकालत करने वालों का कहना है कि इस दौरान महिलाओं को असहनीय दर्द से गुजरना पड़ता है. मेडिकल साइंस कहता है कि पीरियड आने से पहले और इसके दौरान महिलाओं में 200 तरह के बदलाव होते हैं. ये बदलाव सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक भी होते हैं.
महिलाओं में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है. मन उदास रहता है. बात-बात पर रोने का मन करता है. पेट और पीठ में दर्द बना रहता है. थकान और कमजोरी बनी रहती है.
अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सियाओबान हार्लो का कहना है कि पीरियड्स के दौरान 15% से 25% महिलाओं को जबरदस्त दर्द होता है. 2017 में नीदरलैंड्स में 32,748 महिलाओं पर एक सर्वे हुआ था. इस सर्वे में 14% महिलाओं ने बताया था पीरियड्स के दौरान उन्होंने काम या स्कूल से छुट्टी ले ली थी. एक स्टडी बताती है कि पीरियड्स से जुड़ी समस्याओं के कारण कर्मचारियों को हर साल 8.9 दिन की प्रोडक्टिविटी का नुकसान होता है.
कुछ रिसर्च बताती हैं कि ज्यादातर महिलाओं को पीरियड्स से पहले या इस दौरान ऐसी समस्याएं नहीं होतीं, जो उनके रोजाना के कामकाज पर असर डाले. अमेरिका के एक जर्नल के मुताबिक, 20% से 32% महिलाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें प्रीमैन्स्ट्रुअल सिंड्रोम के कारण दिक्कत होती है और उनका काम प्रभावित होता है. 3% से 8% महिलाओं के लिए ये दर्द बहुत गंभीर होता है.
पीरियड लीव पर भारत में क्या-क्या हुआ?
भारत में पीरियड लीव पर कोई केंद्रीय कानून या नीति नहीं है. 2020 में जोमैटो ने पीरियड लीव का ऐलान किया था. जोमैटो हर साल 10 दिन की पेड लीव देता है. जोमैटो के बाद और भी कई स्टार्टअप ने ऐसी छुट्टियां देनी शुरू कर दी थीं.
भारत में सिर्फ तीन राज्यों- बिहार, केरल और सिक्किम में पीरियड लीव को लेकर नियम हैं. पिछड़ा माने जाने वाला बिहार पहला राज्य था, जिसने अपनी महिला कर्मचारियों को पीरियड लीव का हक दिया था. बिहार में 1992 से कानून है कि राज्य सरकार की महिला कर्मचारी हर महीने दो दिन की पीरियड लीव ले सकती हैं. ये छुट्टी 45 साल की उम्र तक मिलती है.
पिछले साल जनवरी में केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने सरकारी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वालीं छात्राओं के लिए पीरियड लीव का ऐलान किया था. इसके साथ ही महिला छात्राओं के लिए 75% की बजाय 73% अटेंडेंस को ही अनिवार्य कर दिया गया था.
इसी साल मई में सिक्किम हाईकोर्ट ने भी रजिस्ट्री में काम करने वाली सभी महिला कर्मचारियों को पीरियड लीव देने का फैसला लिया है. हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में काम करने वालीं महिलाएं हर महीने दो से तीन दिन की छुट्टी ले सकती हैं.
हालांकि, केंद्रीय स्तर पर इसे लेकर कोई कानून या नीति नहीं है. संसद में कई बार पीरियड लीव को लेकर कुछ सांसदों ने प्राइवेट बिल जरूर पेश किए, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया. पिछले साल दिसंबर में केंद्र में मंत्री रहीं स्मृति ईरानी ने कहा था कि पीरियड के लिए छुट्टी की जरूरत नहीं है. ये कोई बीमारी या विकलांगता नहीं है. उनका कहना था कि पीरियड लीव को लेकर कोई प्रस्ताव नहीं है.
दुनिया में कहां-कहां मिलती है पीरियड लीव?
इतिहासकार पी. भास्करानुन्नी ने अपनी किताब 'केरल इन द 19th सेंचुरी' में दावा किया है कि 1912 में केरल के कोचिन (अब एर्नाकुलम) के त्रिपुनीथुरा के एक सरकारी स्कूल में छात्राओं को पीरियड लीव लेने की इजाजत दे दी थी. तब यहां पढ़ने वाली लड़कियां वार्षिक परीक्षा के दौरान पीरियड लीव ले सकती थीं और अपना एग्जाम बाद में दे सकती थीं.
इसी तरह 1922 में सोवियत संघ ने पीरियड लीव देने का फैसला लिया था. तब महिलाएं हर महीने दो से तीन दिन की छुट्टी ले सकती थीं और उनकी सैलरी भी नहीं काटी जाती थी. हालांकि, इस फैसले को भेदभावपूर्ण बताकर 1927 में रद्द कर दिया गया था.
जापान में 1947 से इसे लेकर कानून है. यहां कंपनियां महिलाओं को पीरियड लीव देने से मना नहीं कर सकतीं. महिलाएं चाहें तो पीरियड लीव ले सकती हैं. हालांकि, ज्यादातर महिलाएं छुट्टी नहीं लेतीं. 2014 में हुए एक सरकारी सर्वे में सामने आया था कि सिर्फ 0.9% महिलाओं ने ही पीरियड लीव ली थी.
इंडोनेशिया और फिलीपींस में भी कामकाजी महिलाएं हर महीने दो दिन की छुट्टी ले सकती हैं. ताइवान में भी पीरियड लीव अनिवार्य है. यहां कामकाजी महिलाएं साल में तीन दिन छुट्टी ले सकती हैं. इस छुट्टी के दौरान उन्हें आधी सैलरी दी मिलती है. साउथ कोरिया में कामकाजी महिलाओं को हर महीने एक दिन की छुट्टी मिलती है.
वियतनाम का कानून थोड़ा अलग है. यहां पीरियड के दौरान महिलाओं को 30 मिनट का ब्रेक मिलता है. हालांकि, 2020 में इसमें संशोधन किया गया, जिसके बाद महिलाएं हर महीने तीन दिन की छुट्टी ले सकती हैं. कानून में छुट्टी न लेने पर उन्हें एक्स्ट्रा पे करने का प्रावधान भी किया गया है.
अफ्रीका में जाम्बिया इकलौता ऐसा देश है जहां 2015 से पीरियड लीव अनिवार्य है. यहां महिलाएं हर महीने एक दिन की छुट्टी ले सकती है. अगर किसी महिला को पीरियड लीव देने से इनकार किया जाता है तो वो कंपनी या मालिक पर मुकदमा भी कर सकती है.
प्रोग्रेसिव माने जाने वाले यूरोप में सिर्फ स्पेन है जहां पिछले साल पीरियड लीव को लेकर कानून लाया गया था. यहां महिलाएं साल में चार बार पीरियड लीव ले सकती हैं. छुट्टी लेने के लिए डॉक्टर के पर्चे की जरूरत पड़ती है. इससे पहले 2016 में इटली की संसद में इसे लेकर बिल लाया गया था, लेकिन ये पास नहीं हो सका. अमेरिका में भी इसे लेकर कोई नियम या कानून नहीं है.
भारत में क्यों नहीं मिलती छुट्टी?
भारत में लंबे वक्त से पेड पीरियड लीव की मांग उठती रही है, लेकिन इस पर कभी सहमति नहीं बन सकी. केंद्र सरकार भी पेड पीरियड लीव का विरोध करती है.
पिछले साल दिसंबर में स्मृति ईरानी ने संसद में कहा था कि महिलाओं को पीरियड लीव की जरूरत नहीं है. इस तरह की लीव से महिला कर्मचारियों के साथ भेदभाव बढ़ेगा. स्मृति ईरानी ने जब ये बात कही थी, तब वो केंद्र में महिला और बाल कल्याण मंत्री थीं.
पीरियड लीव का विरोध इसलिए भी किया जाता है, क्योंकि इससे वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी कम होने का खतरा भी है. तर्क ये भी दिया जाता है कि फिर कंपनियां महिलाओं को नौकरी पर रखने से बचेंगी. दूसरा तर्क ये भी दिया जाता है कि पेड पीरियड लीव कर देने से महिलाएं इसका गलत फायदा भी उठाएंगी. हालांकि, आंकड़े इसे खारिज करते हैं. जापान के सरकारी सर्वे के मुताबिक, 2017 में सिर्फ 0.9% महिलाओं ने ही पीरियड लीव ली थी. इसी तरह साउथ कोरिया में भी 20% से कम महिलाओं ने पीरियड लीव के लिए अप्लाई किया था.