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यूरोप का वो शहर, जहां 10 हजार से ज्यादा इंसान मिनटों में कांच में बदल गए, ज्वालामुखी ने मचाई ऐसी तबाही

लावा इतनी तेजी से गुजरा कि नाचते हुए लोगों का खून उबलकर जम गया. स्नानागार में नहाते लोग उसी हालत में मर गए. लगभग 19 सौ साल बाद जब शहर मिला तो हर कोई हैरान था. ज्वालामुखी का फटना तो राख बना देता है, लोग कांच कैसे बन गए? 1000 डिग्री फैरनहाइट से भी ज्यादा गर्मी से गुजरे लोग लंबे समय तक पहेली रहे.

दक्षिणी इटली का पोम्पई शहर तब काफी शानदार हुआ करता था (AFP) दक्षिणी इटली का पोम्पई शहर तब काफी शानदार हुआ करता था (AFP)
मृदुलिका झा
  • नई दिल्ली,
  • 30 नवंबर 2022,
  • अपडेटेड 7:35 PM IST

अमेरिका के हवाई द्वीप पर दुनिया का सबसे बड़ा सक्रिय ज्वालामुखी मौउना लोआ हाल में फट पड़ा. विस्फोट के कई दिनों बाद भी लावा बह रहा है. आसपास आबादी न होने के कारण कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता. आज से लगभग 19 सौ साल पहले इटली में फटे ज्लावामुखी ने एक पूरे शहर को खत्म कर दिया. हंसते-खेलते, बात करते, घर के काम करते, और बाजार में खरीददारी करते लोगों पर से लावा गुजरा और जो जहां था, वहीं खत्म हो गया. बस, एक बात अलग थी. लोग राख नहीं बने, बल्कि कांच की मूर्तियों जैसे दिखने लगे.

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विज्ञान की जबान में कहें तो विट्रिफिकेशन. लेकिन विज्ञान छोड़कर पहले हम 79 ईंसवी के पोम्पई शहर चलते हैं. 

बेहद विकसित हुआ करता था शहर
दक्षिणी इटली का ये शहर तब काफी शानदार हुआ करता था. शानदार इसलिए कि वहां बड़े बाजार थे, जहां सबकुछ मिलता. बाल बनवाने की दुकानें भी थीं, और रेस्त्रां की तर्ज पर खाने के ठिये भी. यहां तक कि टूरिस्ट्स के लिए कॉमन स्पा भी होता. बता दें कि पोम्पई तब इटली के सबसे खूबसूरत शहरों में था, जहां हर मौसम सैलानी रहते.

आधुनिक इटली में भी इस जगह पर आबादी है लेकिन जरा वैज्ञानिक ढंग से और ज्यादा सचेत (Photo- AFP)

बस, एक दिक्कत थी. शहर नेपल्स की खाड़ी में बसा था, जिसके बिल्कुल पास एक एक्टिव ज्वालामुखी था. माउंट वेसविअस ज्वालामुखी अब तक 50 से ज्यादा बार फट चुका है. आमतौर पर ये उतना खतरनाक नहीं होता, लेकिन 19 सौ साल पहले इसने पोम्पई को खत्म कर दिया. 

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ऐसे उठा लावे का गुबार
लगभग 10 हजार की आबादी वाले पोम्पई में तब दिन का समय रहा होगा, ये अनुमान वैज्ञानिकों ने वहां जमकर मरे हुए लोगों की एक्टिविटी देखते हुए लगाया. जमीन एकदम से कांपती लगी. मछलियां-मांस खरीद रहे लोग, और मुसाफिर डर से भागने लगे. माउंट वेसविअस फट पड़ा था. हवा में लगभग 20 मील दूर तक जहर और धुआं ही धुआं भर गया. बच्चे-बूढ़े दम घुटने से मरे. लेकिन रातोंरात ही कुछ और बदला. तेजी से बहते लावा ने 10 हजार की आबादी वाले पूरे शहर को लील लिया.

प्राचीन रोमन लेखक प्लिनी द यंगर ने सैकड़ों मील दूर से धूल का गुबार देखा और मान लिया कि दूर कहीं दुनिया खत्म होने की शुरुआत हो चुकी है. उनकी चिट्ठियों में इस बात का खूब जिक्र मिल चुका है. 

ज्वालामुखी फटने से उठता धुएं का गुबार सैकड़ों मील दूरी तक दिखाई पड़ा. प्रतीकात्मक फोटो (Getty Images)

वॉल्केनिक इरप्शन इतना भयंकर था कि पायरोक्लेस्टिक सर्ज हुआ
यानी धूल में बदली चट्टानें 180 मील से भी तेजी से नीचे की ओर भागने लगीं. हर चीज इनके नीचे दब गई. स्नानागार और दुकानों और लोगों समेत. कुछ 19 घंटों के भीतर पोम्पई राख के नीचे दब गया. सालों तक ये खोया हुआ शहर रहा, जब तक कि वापस इसे कुछ सैलानियों ने ही नहीं ढूंढ लिया. 

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अब आगे की कहानी....
साल 1549 में इसी शहर से होते हुए वॉटर चैनल बना, लेकिन जैसे सीरियलों में कुछ चीजें छिपी ही रह जाती हैं, वैसे ही शहर का राज भी राख में रहा, जब तक कि साल  1748 में कुछ युवा सैलानी नई जगह की खोज करते यहां नहीं पहुंच गए. यहां जमीन के नीचे से कई चीजें मिलने लगीं, जिन्हें एंटीक कहा जाता है. बात स्पेन के किंग चार्ल्स तृतीय तक पहुंची, जो पुरानी चीजों के शौकीन थे. यहीं से खुदाई शुरू हुई, जिससे 17 सदियों से दबा शहर वापस खोजा जा सका. 

विट्रिफिकेशन की प्रक्रिया ने हर चीज को कांच की तरह बना दिया. प्रतीकात्मक फोटो (Pixabay)

नीचे रहस्य ही रहस्य थे
आमतौर पर पुरातत्व में जो चीजें मौसम की मार से खत्म हो जाती हैं, ज्वालामुखी की राख के साथ वो भी सुरक्षित रहीं. बिल्डिंग्स की नक्काशी दिख रही थी. उस दौर के बर्तन और गहने मिल गए. यहां तक कि राख के नीचे सब्जियां और खाने की दूसरी चीजें तक मिलीं. लेकिन सबसे अजीब था, यहां के लोगों का कांच में तब्दील हो जाना. जैसे कहानियों में शाप से कोई पत्थर बन जाए, कुछ वैसा ही इन्हें देखकर लगता. वैज्ञानिक पहले तो हैरान हुए, फिर रहस्य से परदा उठा. 

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साइंस ने खोज निकाला जवाब
न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में बताया गया कि ऐसा विट्रिफिकेशन के कारण होता है. ये वो प्रक्रिया है, जिसमें बहुत तेजी से कोई चीज एक्सट्रीम तापमान पर पहुंच जाती है, और फिर उसी तेजी से ठंडी पड़ जाती है. इससे वो वस्तु कांच की तरह दिखने लगती है. यही बात यूनिवर्सिटी ऑफ नेपल्स ने भी कही, और दुनिया के कई फॉरेंसिक एंथ्रोपोलॉजिस्ट्स ने भी. स्टडी हीट इंड्यूस्ड ब्रेन विट्रिफिकेशन नाम से साल 2020 में प्रकाशित हुई. 

 लावे की गर्मी के कारण लोगों का बॉडी टेंपरेचर 1000 डिग्री F से भी ऊपर चला गया. प्रतीकात्मक फोटो (AP)

काले कांच की तरह जमे या बने हुए कई लोग मिले
20 साल का कोई युवक बिस्तर पर सोया हुआ. एक बच्चा खाने की मुद्रा में. कोई बाजार करता हुआ. वैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ ही मिनटों के भीतर इनके शरीर ने 520 डिग्री सेल्सियस की गर्मी झेली होगा. यानी लगभग 1000 डिग्री फैरनहाइट. यहां ये जरूर याद रखिएगा कि हमारे शरीर का सामान्य तापमान ही लगभग 98 डिग्री फैरनहाइट है. इससे लगभग 10 गुना ज्यादा तेजी से ये गर्म हवा और लावे के संपर्क में आए होंगे.

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन का शोध वेट्रिफिकेशन के बारे में कहता है कि इस दौरान अत्यधिक गर्मी से शरीर के सॉफ्ट टिश्यू भाप बन जाते हैं. इससे शरीर सड़ता-गलता भी नहीं है, बस कांच की तरह जम जाता है. 

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पोम्पई की वास्तुकला के साथ वहां की पॉटरी तक की नकल हो रही है. प्रतीकात्मक फोटो (Unsplash)

वास्तुकला की होने लगी नकल
शहर के रहस्यों से परदा उठने के बाद यहां की वास्तुकला को देखने दूर-दूर से जानकार पहुंचे. इटली के इस सदियों पुराने शहर में वास्तु इतनी भव्य थी कि पूरा यूरोप दबे हुए पोम्पई की नकल करने लगा. न केवल इमारतें, बल्कि बर्तन और फर्निचर तक इसकी नकल पर बनाए जाने लगे. यूरोप में खासकर थर्ड ड्रॉइंगरूम का चलन हुआ, जो इसी शैली की कॉपी था. इसे एट्रस्कन रूम भी कहते हैं. 

चोर सक्रिय हो उठे
इतने खूबसूरत शहर का एक बार खत्म होना जैसे काफी न हो, सैलानी और आसपास के लोग वापस इस मिली हुई धरोहर को नष्ट करने लगे. यहां से चोरियां होने लगीं. आखिरकार 1997 में इटली की सरकार और यूनेस्को ने मिलकर इसे हैरिटेज साइट्स की सूची में डाल दिया. बात तब भी नहीं बनी. मामला इतना बिगड़ा कि साल 2008 में इतालवी सरकार ने पोम्पई साइट पर सालभर की इमरजेंसी लगा दी और इसे देखने के लिए खास कमिश्नर तैनात किया ताकि खोकर पाया हुआ शहर पूरी तरह खत्म न हो जाए. 

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