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आतंकी-दरिंदों की दया याचिका पर राष्ट्रपति का जीरो-टॉलरेंस, जानें- फिर भी कहां अटकी रह जाती है फांसी की सजा

24 साल पहले लाल किला पर हमला करने वाले पाकिस्तानी आतंकी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक की दया याचिका राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने खारिज कर दी. आतंकी अशफाक को 2005 में ट्रायल कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी.

प्रतीकात्मक तस्वीर. प्रतीकात्मक तस्वीर.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 13 जून 2024,
  • अपडेटेड 11:16 PM IST

राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने पाकिस्तानी आतंकी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक की दया याचिका खारिज कर दी है. अशफाक को लाल किला पर हमला करने के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई थी. 

लाल किला पर 24 साल पहले आतंकी हमला हुआ था. 22 दिसंबर 2000 को आतंकियों ने लाल किला में तैनात राजपूताना राइफल्स के जवानों पर फायरिंग कर दी थी. इस हमले में तीन जवान शहीद हो गए थे. हमले के चार दिन बाद दिल्ली पुलिस ने अशफाक को गिरफ्तार किया था. अशफाक लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी है. लाल किला पर हमला करने वाले तीन आतंकी अबू शाद, अबू बिलाल और अबू हैदर को एनकाउंटर में मारे गए थे.

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अक्टूबर 2005 में ट्रायल कोर्ट ने अशफाक को फांसी की सजा सुनाई थी. बाद में दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी सजा को बरकरार रखा. नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी रिव्यू पिटीशन भी खारिज कर दी थी.

मुर्मू ने दूसरी दया याचिका खारिज की

अदालतों में सारे रास्ते बंद होने के बाद अशफाक ने 15 मई को राष्ट्रपति मुर्मू के पास दया याचिका दायर की थी. उसकी दया याचिका 27 मई को ही खारिज हो गई थी. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत, राष्ट्रपति को कुछ मामलों में सजा माफ करने, कम करने या फिर उस पर रोक लगाने की शक्ति है. 

जुलाई 2022 में राष्ट्रपति बनने के बाद से द्रोपदी मुर्मू दो दोषियों की दया याचिका खारिज कर चुकी हैं. पिछली साल उन्होंने चार साल की बच्ची का रेप कर हत्या करने के मामले में फांसी की सजा पाए वसंत संपत दुपारे की दया याचिका खारिज कर दी थी.

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नागपुर के रहने वाले वसंत दुपारे ने अप्रैल 2008 में बच्ची का रेप कर उसकी निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी. वो चॉकलेट का लालच देकर बच्ची को अपने साथ ले गया था. उसने पहले उसका रेप किया और फिर पत्थरों से उसका सिर कुचलकर हत्या कर दी थी.

राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने पिछले साल अप्रैल में उसकी दया याचिका खारिज कर दी थी. दया याचिका खारिज होने के बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था.

जानकारों का मानना है कि मौत की सजा पाने वाला दोषी अभी भी संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत लंबी देरी के आधार पर अपनी सजा कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है.

कोविंद ने खारिज की थी 6 याचिकाएं

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने कार्यकाल में 30 दया याचिकाएं खारिज की थीं. इनमें अजमल कसाब, अफजल गुरु और याकूब मेमन की याचिका भी शामिल है. इन तीनों को तो फांसी हो गई. 

2017 से 2022 तक राष्ट्रपति रहे रामनाथ कोविंद ने 6 दया याचिकाएं खारिज की थीं. इनमें से 4 निर्भया के दोषियों की थी और उन चारों को फांसी हो गई. जबकि, 7 लोगों को जिंदा जलाने वाले जगत राय की याचिका अप्रैल 2018 में ही खारिज हो गई थी. 16 जुलाई 2020 को राष्ट्रपति कोविंद ने संजय की याचिका खारिज की थी.

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राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू अब तक दो की दया याचिका खारिज कर चुकी हैं. राष्ट्रपति सचिवालय की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, अभी कोई दया याचिका लंबित नहीं है.

4 महिलाओं की दया याचिका भी खारिज हो चुकी

12 साल में 4 महिलाओं की दया याचिका भी खारिज हो चुकी है. इनमें से दो बहनें थीं. इन दोनों बहनों के नाम रेणुका शिंदे और सीमा गोवित है. इन्होंने अपनी मां अंजना गोवित के साथ मिलकर 1990 से 1996 के बीच पुणे में 42 बच्चों की हत्या की थी. 1998 में अंजना की बीमारी से मौत हो गई. इन दोनों बहनों को फांसी की सजा हुई. इन्होंने अक्टूबर 2013 में राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगाई थी, जो जुलाई 2014 में खारिज हो गई थी.

इनके अलावा सोनिया की दया याचिका भी खारिज हो चुकी है. सोनिया हरियाणा की बरवाला सीट से निर्दलीय विधायक रहे रेलू राम पुनिया की बेटी थीं. सोनिया ने अपने पति संजीव के साथ मिलकर पिता रेलू राम समेत परिवार के 8 लोगों की हत्या कर दी थी. जून 2013 में संजीव और सोनिया दोनों की दया याचिका खारिज हो चुकी है, लेकिन अभी तक फांसी नहीं हुई है.

वहीं, चौथी महिला का नाम शबनम है. शबनम ने अप्रैल 2008 में प्रेमी सलीम के साथ मिलकर अपने ही परिवार के 7 लोगों की हत्या कर दी थी. शबनम और सलीम की दया याचिका अगस्त 2016 में खारिज हो चुकी है. 

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20 साल में किन-किन को हुई फांसी?

14 अगस्त 2004 | धनंजय चटर्जी

- 1990 में 14 साल की बच्ची से दुष्कर्म और उसके बाद उसकी हत्या के आरोप में फांसी की सजा सुनाई गई. राष्ट्रपति ने दो बार दया याचिका खारिज की. 14 अगस्त 2004 को कोलकाता की अलीपुर सेंट्रल जेल में धनंजय को फांसी पर चढ़ा दिया गया.

21 नवंबर 2012 | अजमल कसाब

- 26 नंबर 2008 को मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था. इस हमले को अंजाम देने वाले सभी आतंकी मारे गए थे. एकमात्र आतंकी अजमल कसाब जिंदा पकड़ा गया था. कसाब ने राष्ट्रपति के सामने दया याचिका लगाई थी, जो खारिज हो गई थी. उसे 21 नवंबर 2012 को पुणे की यरवदा जेल में फांसी दी गई.

9 फरवरी 2013 | अफजल गुरु

- 13 दिसंबर 2001 को संसद में 5 आतंकियों ने हमला किया. 9 लोगों की मौत हो गई. पांचों आतंकी भी मारे गए. संसद हमले का मास्टरमाइंड अफजल गुरु बाद में पकड़ा गया. उसने राष्ट्रपति के सामने दया याचिका लगाई, जो 3 फरवरी 2013 को खारिज हो गई. 9 फरवरी 2013 को तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई.

30 जुलाई 2015 | याकूब मेमन

- 12 मार्च 1993 को मुंबई में 12 सीरियल ब्लास्ट हुए. इसकी साजिश याकूब मेमन ने रची थी. याकूब ने दो बार राष्ट्रपति के सामने दया याचिका दायर की और दोनों ही बार खारिज हो गई. उसकी फांसी रुकवाने के लिए रात 3 बजे तक सुप्रीम कोर्ट में बहस चली. याकूब को उसके जन्मदिन पर ही 30 जुलाई 2015 को फांसी दे दी.

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20 मार्च 2020 | मुकेश, विनय, अक्षय और पवन

- 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ दुष्कर्म किया गया. बाद में उसकी मौत हो गई. उसे निर्भया नाम दिया गया. निर्भया कांड के 6 दोषी थे, जिनमें एक नाबालिग था. नाबालिग 3 साल की सजा काटकर छूट गया. एक दोषी ने आत्महत्या कर ली. बाकी 4 दोषी मुकेश सिंह, विनय शर्मा, अक्षय ठाकुर और पवन गुप्ता ने अपनी फांसी रुकवाने के लिए सारी तरकीबें आजमा लीं, लेकिन टाल नहीं सके. 20 मार्च 2020 को चारों को तिहाड़ जेल में फांसी पर लटका दिया.

कहां अटक जाती है फांसी की सजा?

कई बार ऐसा भी होता है कि राष्ट्रपति की ओर से दया याचिका खारिज होने के बाद भी फांसी की सजा इसलिए नहीं होती, क्योंकि मामला फिर से अदालती दायरे में आ जाता है. 

कई बार फांसी की सजा को बाद में उम्रकैद में भी बदल दिया जाता है. 1993 के दिल्ली ब्लास्ट मामले में दोषी देवेंदर पाल सिंह भुल्लर की दया याचिका खारिज हो गई थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी फांसी की सजा को उम्रकैद में इस आधार पर बदल दिया क्योंकि उसकी दया याचिका खारिज होने में 8 साल का वक्त लग गया था.

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इसी तरह राजीव गांधी की हत्या के तीन दोषियों की फांसी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था, लेकिन बाद में इसे भी उम्रकैद में बदल दिया. 

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में देशभर की अदालतों ने 190 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी. वहीं, 51 दोषी ऐसे थे जिनकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया था. 

एनसीआरबी के मुताबिक, 2001 से 2022 के बीच 22 सालों में 2 हजार 881 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई है. 

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