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क्या है प्यूबर्टी ब्लॉकर जिसपर UK में लगी पाबंदी, टीनएज बच्चे क्यों धड़ल्ले से ले रहे ये विवादित दवा?

ब्रिटिश बच्चे अब अस्पताल में प्यूबर्टी ब्लॉकर का प्रिस्क्रिप्शन नहीं ले सकेंगे. वहां की नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) ने खुद ये फैसला लिया. ये वो दवाएं हैं, जो काफी विवादित रहीं. इसके विरोधी कहते हैं कि प्यूबर्टी ब्लॉकर से टीन-एज वाले लक्षण दिखना रुक जाते हैं. इससे जेंडर आइडेंटिटी ही खत्म हो रही है. साथ ही इसके दूसरे ज्यादा घातक खतरे भी हैं.

यूके में प्यूबर्टी ब्लॉकर का प्रिस्क्रिप्शन खूब लिया जा रहा था. (Photo- Unsplash) यूके में प्यूबर्टी ब्लॉकर का प्रिस्क्रिप्शन खूब लिया जा रहा था. (Photo- Unsplash)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 14 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 11:11 AM IST

प्यूबर्टी वो उम्र है, जिसमें बच्चे का शरीर वयस्कों वाले लक्षण लेने लगता है. ये लड़के और लड़कियों दोनों में होने वाली कुदरती प्रोसेस है. लेकिन हाल के समय में इससे भी छेड़छाड़ हो रही है. ब्रिटेन समेत कई देशों में हॉर्मोन्स की दवाएं आ रही हैं, जो इस नेचुरल प्रक्रिया को रोक या इतना धीमा कर दें कि बच्चे का शरीर तो बड़ा हो, लेकिन उसमें एडल्टहुड के लक्षण न दिख सकें. अब इंग्लैंड के एनएसएस ने इसपर बैन लगा दिया. 

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क्या है प्यूबर्टी ब्लॉकर

12 से 14 साल की उम्र के बच्चों में प्यूबर्टी आने लगती है. इस दौरान उनमें फिजिकल बदलाव होते हैं, जो उन्हें साफ तौर पर लड़का या लड़की दिखाते हैं. बीते कुछ समय से इसे ब्लॉक करने यानी रोकने की कोशिश दिखने लगी. इसमें ऐसी दवाएं या इंजेक्शन दिए जाते हैं, जो सेक्स हॉर्मोन जैसे टेस्टॉस्टेरॉन और एस्ट्रोजन का बनना रोक दें. इस दवा को लेने पर ये नहीं होता कि जो बदलाव हो चुके, वे पलट जाएं, लेकिन ब्रेस्ट डेवलपमेंट, चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ आना, या आवाज का भारी होना जैसी बातें थम जाती हैं. 

कितने बच्चे लेने लगे थे हॉर्मोन्स की दवाएं 

कुछ समय से NHS में प्यूबर्टी ब्लॉकर के लिए आने वाले टीन-एज लड़के-लड़कियां बढ़ गए थे. हालात ये हुए कि उसे पॉलिसी डॉक्युमेंट जारी करते हुए अपने यहां इसपर रोक लगाना पड़ गया. उसका कहना है कि इसका गलत और धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. साल 2021 से अगले एक वर्ष में 5 हजार से ज्यादा बच्चे NHS के उस खास क्लिनिक पहुंचे, जहां ये सर्विस मिलती है ताकि वे दवा ले सकें. अब ये क्लिनिक बंद होने जा रहे हैं. 

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किसलिए दी जा रही थी दवाएं

इन हॉर्मोनल दवाओं को खासकर नॉन-बायनरी जेंडर की मदद के लिए बनाया गया था. ये वो लोग हैं, जो न खुद को स्त्री मानते हैं, न पुरुष. या इसे ऐसे समझते हैं, ये आमतौर पर एक ऐसे लिंग से पहचान करते हैं जो जन्म के समय उन्हें दिए गए जेंडर से अलग हो. यानी लड़की के रूप में जन्म हुआ, लेकिन वे खुद को लड़का महसूस करें या इसका उलट. वे इन दवाओं से अपने मुताबिक पहचान को बनाए रखने की कोशिश करने लगे. यहीं से विवाद शुरू हुआ. 

कुछ ऐसे पेरेंट्स थे, जो हॉर्मोन्स की दवा देकर अपने बच्चे को उस जेंडर में रखने की कोशिश करने लगे, जैसा वे चाहते थे. दूसरी तरफ, ऐसे टीनएज बच्चे हैं, जो देखादेखी इस दवा के लिए हेल्थ सेंटर आने लगे. वे हॉर्मोन्स की घटबढ़ से कुछ नया करना चाहते थे. आखिरकार NHS को इसपर रोक लगाना पड़ा. अब भी यूके के कुछ प्राइवेट क्लिनिक्स में प्यूबर्टी ब्लॉकर मिल रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री लिज ट्रस लगातार मांग कर रही हैं कि पूरे देश में इसपर पाबंदी लग जाए. 

क्यों कर रहा एक खेमा विरोध

LGBTQ की वकालत करने वाली संस्थाएं इस फैसले के खिलाफ आ चुकीं. उनका कहना है कि प्यूबर्टी ब्लॉकर लेने से प्रोसेस स्लो हो जाती, इससे उन युवाओं की मदद हो पाती, जो अपने जेंडर का फैसला नहीं कर पा रहे. 

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आत्महत्या की प्रवृति ज्यादा

दूसरी तरफ NHS के फैसले के सपोर्ट में भी लोग और खुद मेडिकल एक्सपर्ट आ रहे हैं. वैसे तो अस्सी के दशक से ही प्यूबर्टी ब्लॉकर लेने का चलन आ गया था, लेकिन कुछ सालों से ये प्रयोग की तरह चलने लगा. जबकि इसके इस्तेमाल से घातक नतीजे दिखते हैं. जैसे साल 2020 में अमेरिकन अकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने पाया कि प्यूबर्टल सप्रेशन के उपयोग से लोगों में खुदकुशी की प्रवृति बढ़ जाती है. 

फिर ये दवाएं बनी ही क्यों

सबसे पहले नीदरलैंड के डॉक्टरों ने इसे ट्रांसजेंडर लोगों की मदद के लिए दिया. इससे सेक्स हॉर्मोन्स का बनना बहुत धीमा हो जाता. इससे पुरुष शरीर में जन्मे लोग अपने लक्षणों को रोक पाते थे. आगे चलकर बिना ज्यादा रिसर्च के ही इसे बाकी देश अपनाने लगे. यहां तक कि अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने भी इसे ग्रीन सिग्नल दे दिया. अब ये दिखने लगा है कि ब्लॉकर के चलते केवल सेक्स हॉर्मोन का बनना ही नहीं रुकता, इसका असर हड्डियों से लेकर ब्रेन तक पड़ता है.

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