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रघुपति राघव भजन को दिए सुर, शास्त्रीय संगीत को दी पहचान... कौन थे पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर

उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत के पुरोधा रहे हैं आचार्य पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर. पलुस्कर ने ही राग मिश्र में 'रघुपति राघव राजा राम भजन' को पिरोया था और वह इसे नित्य अपनी पूजा में गाया करते थे. जिस समय में भारतीय शास्त्रीय संगीत अपनी चमक खो रहा था, पंडित जी ने इसे फिर से प्रकाशित किया और इसके लिए सबसे अच्छा मंच उन्हें स्वतंत्रता आंदोलनों में ही मिला.

पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने दी थी रामधुन को भजन पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने दी थी रामधुन को भजन
विकास पोरवाल
  • नई दिल्ली,
  • 30 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 6:41 AM IST

12 मार्च 1930 को आधी धोती ओढ़े और आधी लपेटे महात्मा गांधी ने जब 'नमक कानून' तोड़ने का ऐलान किया तो इस इकहरे बदन वाले महामानुष के प्रण ने देशभर के सीने में ऊर्जा और उत्साह भर दिया. बापू नमक बनाने के लिए हाथ में लाठी लिए निकल पड़े और गांधी के इस बुलंद फैसले के बाद पूरा देश उनके पीछे चल पड़ा.उनकी लाठी अहिंसा की थी और यह यात्रा विरोध की.

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साबरमती आश्रम से दांडी तक की ये यात्रा पूरे 327 किमी का सफर था, जिसे दांडी मार्च के नाम से जाना गया. यह मार्च भले ही महात्मा गांधी ने अकेले शुरू किया था, लेकिन धीरे-धीरे एक बड़ा कारवां इससे जुड़ता चला गया.  इस हुजूम को एकजुट करने में जिसकी बड़ी भूमिका थी, वो था एक प्राचीन भजन, महात्मा का सबसे प्रिय भजन... 'रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम', 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान'

महात्मा गांधी ने किया था मूल भजन में बदलाव!
जब महात्मा गांधी ने इस भजन को दांडी मार्च का समूह गान बनाया तो कहते हैं कि उन्होंने इसके मूल शब्दों में बदलाव किया था और पंथ निरपेक्षता के साथ लोगों की आवाज बनाने की कोशिश की थी. उन्होंने मूल भजन में ईश्वर के साथ 'अल्लाह' शब्द को जोड़ा और फिर यह भजन, जन-जन का गीत बन गया. साबरमती आश्रम से लेकर दिल्ली में होने वाली महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं में यह भजन गाया जाने लगा और इसकी वैश्विक पहचान गई थी. 

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भजन के जरिए लोगों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ किया एकजुट
रामधुन के कई संस्करण हैं, और महात्मा गांधी ने जिस संस्करण का इस्तेमाल किया, उसमें "सार्वभौमिकता" थी. महात्मा गांधी द्वारा मूल भजन को संशोधित करने के पीछे मंशा थी कि, हिंदुओं का ईश्वर और मुसलमानों का अल्लाह एक ही है. इस तरह यह उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एकजुट करने का प्रयास था. 

लेकिन इस भजन को सुर किसने दिए थे?
उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत के पुरोधा रहे हैं आचार्य पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर. पलुस्कर ने ही राग मिश्र में इस भजन को पिरोया था और वह इसे नित्य अपनी पूजा में गाया करते थे. जिस समय में भारतीय शास्त्रीय संगीत अपनी चमक खो रहा था, पंडित जी ने इसे फिर से प्रकाशित किया और इसके लिए सबसे अच्छा मंच उन्हें स्वतंत्रता आंदोलनों में ही मिला, जहां वह बैठकों और भाषणों की शुरुआत से पहले संगीत प्रस्तुति दिया करते थे. इसी दौरान उन्होंने कई मौकों पर रामधुन भी गाया था, जो महात्मा गांधी को बेहद प्रिय लगा और वह इसे बार-बार सुनते थे. 

पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने शास्त्रीय संगीत को दी नई पहचान
पंडित पलुस्कर को भारतीय शास्त्रीय संगीत के बुझते दीपक में फिर से चेतना का संचार करने वाला कहा जाए तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. आजकल जो गली-गली में संगीत विद्यालय और सेंटर्स दिखाई देते हैं, यह उनकी ही देन है. उन्होंने अपने वक्त में जब ये देखा कि भारतीय शास्त्रीय संगीत और खासतौर पर उत्तर भारतीय संगीत एक तरह से परंपरा से ही गायब होता जा रहा है. इसके अलावा नए शिष्यों को ठीक से प्रशिक्षण भी नहीं मिल पा रहा है.

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खोला था सबसे पहला संगीत विद्यालय
इस कमी को समझते हुए उन्होंने साल 1901 में पहले गंधर्व महाविद्यालय की नींव रखी. यानी आज से 125 साल पहले... यह संगीत शास्त्र का आधुनिकता के साथ कदम ताल करने का पहला मौका था. उन्होंने घरानों को फिर से जोड़ा और उनकी परंपराओं को जीवित करने के लिए खयाल गायकी (संगीत में रागों को बंदिश के साथ गाने की शैली) को फिर से लोकप्रिय बनाया. उन्होंने जो भी उपलब्धियां हासिल कीं, उनकी राह इतनी आसान नहीं थी.

पिता मंदिर में गाते थे कीर्तन
18 अगस्त सन 1872 में महाराष्ट्र के कुरुंदवाड़ में जन्में विष्णु दिगंबर के पिता दिगंबर गोपाल पलुस्कर साधारण व्यक्ति थे, लेकिन उन्हें संगीत की समझ थी और अक्सर वह मंदिर में कीर्तन करते पाए जाते थे. खुला गला और उन्मुक्त आवाज में ईश्वर की वंदना सहज ही लोगों का मन मोह लेती थी. नन्हे पलुस्कर पर भी पिता की इस विरासत का असर पड़ा और वह भी कीर्तन में गाने लगे.

12 वर्षों तक ली संगीत की विधिवत शिक्षा
विष्णु दिगंबर थोड़े बड़े हुए तभी एक दुर्घटना हो गई. आतिशबाजी से उनकी आंखों की रौशनी कम होती गई और पढ़ाई मुश्किल होने लगी. पिता ने संकट की इस घड़ी में उन्हें पूरी तरह संगीत की ओर मोड़ दिया. उनकी नैसर्गिक प्रतिभा को देखते हुए पिता ने उन्हें पास के शहर मिराज भेजा, जहां प्रसिद्ध संगीतकार पंडित बालकृष्ण  इचलकरंजीकर ने उन्हें संगीत की शिक्षा दी. पंडित बालकृष्ण ग्वालियर घराने से जुड़े थे और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की खयाल गायकी के गायक थे. पलुस्कर ने उनसे 12 वर्षों तक संगीत सीखा और खूब सीखा.

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संगीत को महलों और मंदिरों से निकालकर लोगों के बीच लाने वाली शख्सियत
उसी दौरान पलुस्कर ने यह भी समझ लिया कि शाही दरबारों में भले ही उनके गले-गायकी की बहुत तारीफ हो जाए, लोग प्रशंसा करें, लेकिन संगीत अभी भी बस कीर्तन बनकर या तो मंदिरों के भीतर है या फिर मनोरंजन बनकर दरबारों में. उनके गुरु भी शाही दरबार में थे लेकिन पलुस्कर को कभी सार्वजनिक समारोह में नहीं बुलाया जाता था. अब यहां से पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने ये ठान लिया कि, समाज में संगीतकारों को वो दर्जा और सम्मान दिलवाना ही होगा, जिसके वे हकदार हैं.

इसके लिए उन्होंने तय किया कि पहले तो संगीत को आम लोगों के बीच पहुंचाना होगा. वह चाहते थे कि शास्त्रीय संगीत का आनंद, समाज का एक ख़ास वर्ग ही नहीं बल्कि आम लोग भी उठा सकें और यही चाहत संगीत की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव लाने की शुरुआत बनी. 

24 साल की उम्र में की यात्राएं, संगीत को दी नहीं पहचान
अपनी इस चाहत को पंडित पलुस्कर ने अपनी जिद बना लिया और साल 1896 में इसके लिए वह यात्रा पर निकल पड़े. इस दौरान वह बड़ौदा गए, फिर ग्वालियर भी पहुंचे. इसके बाद अलीगढ़, मथुरा, दिल्ली, जालंधर, कश्मीर और बीकानेर भी पहुंचे और हर जगह जाकर अलग-अलग गायकी के उस्ताद संगीतकारों से भेंट की. उन्होंने इस यात्रा में संगीत के कई नए आयाम भी सीखे और फिर उन्हें यह भी समझ आया कि संगीत यूं ही भारत की आत्मा नहीं है, इस विधा में हर स्थान के खास भूगोल और प्रकृति की आत्मा बसी है. 

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संगीत समारोह आयोजित करने की शुरुआत की
इंग्लिश में एक प्रसिद्ध फ्रेज है, 'वन फॉर दि किचन, वन फॉर दि सोल' सीधे तौर पर ये फ्रेज धन की जरूरत पर प्रकाश डालता है. कहा जाता है कि पंडित पलुस्कर ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पहली बार संगीत समारोह जैसे आयोजनों की नींव रखी. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर एक बार और मथुरा पहुंचे उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बंदिशें समझने के लिए ब्रज भाषा सीखी. पुरानी जितनी भी बंदिशें हैं, अधिकतर ब्रजभाषा में ही लिखी गई हैं. इसके अलावा उन्होंने मथुरा में ध्रुपद शैली का गायन भी सीखा.

यहीं से पलुस्कर पंजाब के लाहौर पहुंचे और 1901 में उन्होंने गंधर्व महाविद्यालय की स्थापना की. इस के जरिए उन्होंने कई संगीत विभूतियों को तैयार किया. पलुस्कर ने अखिल भारतीय संगीत सम्मेलनों की शुरुआत की, जिसमें अलग-अलग संगीत घरानों के प्रसिद्ध संगीतकार हिस्सा लेते थे. इसके पहले इस तरह के सम्मेलन नहीं हुआ करते थे. संगीत सम्मेलन बहुत सफल रहे और उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्राण फूंक दिये. सबसे बड़ा बदलाव ये हुआ कि अब संगीतकार सिर्फ शाही खानदानों के भरोसे नहीं रह गए थे और न ही राग-रागिनियां महलों की भीतर की शोभा. जहां संगीतकारों को खुले दिल से आम लोगों के बीच जगह मिलने की शुरुआत हुई तो वहीं संगीत ने भी खुली हवा में सांस ली. 

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आजादी के आंदोलनों में भी हुए सक्रिय
संगीत को विशेष दर्जा दिलाने और आम लोगों तक पहुंचाने के लिए पंडित पलुस्कर ने एक और बड़ा काम किया. वह स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय हो गए और इस तरह वह महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय और पंडित मदनमेहन मालवीय जैसे नेताओं के संपर्क में आए. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन के पहले पलुस्कर के स्वर में वंदे मातरम का गायन होता था. माना जाता है कि महाविद्यालय अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे क्रांतिकारियों को पनाह भी देते थे तथा स्कूल के छात्र विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों के बीच संदेशवाहकों का काम करते थे.

59 वर्ष की आयु में निधन
इसी कड़ी में 1930 का साल आया, जब दांडी मार्च निकाला गया. महात्मा गांधी ने इस क्रांतिकारी कदम से जहां अंग्रेजों के प्रति एक बड़ा विरोध दर्ज कराया तो इसी क्रांति ने रघुपति राघव राजा राम भजन को लोगों की जुबान पर अमर बना दिया. इसके साथ ही अमर हो गए पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर. 21 अगस्त सन 1931 को 59 वर्ष की आयु में पंडित पलुस्कर का निधन हो गया लेकिन वह आज ही संगीत की एक समृद्ध विरासत के साथ अमर हैं. 
 

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