
जम्मू-कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. 90 सीटों वाली जम्मू-कश्मीर विधानसभा में तीन चरणों में वोटिंग होगी. इसे लेकर प्रचार जोरों पर है. जम्मू-कश्मीर का चुनाव है तो PoK का मुद्दा बनना तय है. अब चुनाव के बीच एक बार फिर PoK का मुद्दा उठा है.
रविवार को जम्मू के रामबन में एक चुनावी रैली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने PoK का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि PoK के लोगों को पाकिस्तान विदेशी मानता है, लेकिन हम उन्हें अपना मानते हैं.
उन्होंने कहा, 'जम्मू-कश्मीर का विकास देखने के बाद PoK के लोग कहेंगे कि हम पाकिस्तान के साथ नहीं रहना चाहते. हम भारत के साथ जाना चाहते हैं.' राजनाथ सिंह ने आगे कहा, 'पाकिस्तान के लोग PoK की जनता को विदेशी मानते हैं, लेकिन भारत ने उन्हें हमेशा अपना माना है. आइए और हमारा हिस्सा बनिए.'
ऐसे में जानते हैं कि क्या सच में पाकिस्तान की सरकार PoK को विदेशी जमीन मानती है? और कैसे भारत का हिस्सा पाकिस्तान के हाथ में चला गया?
जब पाकिस्तान ने PoK को माना विदेशी जमीन
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रामबाण की चुनावी रैली में जो कहा, असल में उसका आधार पाकिस्तानी सरकार का एक हलफनामा था. ये हलफनामा पाकिस्तान की सरकार ने इस्लामाबाद हाईकोर्ट में दाखिल किया था.
दरअसल, ये पूरा मामला PoK के कवि और पत्रकार अहमद फरहाद शाह की गुमशुदगी से जुड़ा था. शाह इस साल 15 मई को इस्लामाबाद स्थित अपने आवास से गायब हो गए थे. 29 मई को उन्हें PoK के खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के गुज्जर कोहाला गांव से हिरासत में लिया गया था. शाह को मुजफ्फराबाद पुलिस ने एंटी-टेररिज्म कानून समेत कई मामलों के तहत गिरफ्तार कर लिया था.
पाकिस्तान सरकार ने दावा किया था कि शाह को आतंकवाद समेत कई आरोपों के तहत गिरफ्तार किया गया है. जबकि शाह की पत्नी ने इस्लामाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर कहा था कि उनके पति का अपहरण किया गया है. उन्होंने अपनी याचिका में मांग की थी कि शाह को अदालत में पेश किया जाए और उनका अपहरण वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए.
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान जज मोहसिन अख्तर कियानी ने लोगों के जबरन अपहरण पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों की आलोचना की थी.
तब जज कियानी ने शाह को अदालत में पेश करने को कहा था. इस पर एडिशनल अटॉर्नी जनरल (AAG) ने कहा था कि शाह को अदालत में पेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि वो PoK में पुलिस कस्टडी में हैं. AAG ने तर्क दिया था कि PoK एक 'विदेशी क्षेत्र' है, जिसका अपना संविधान है, अपनी अदालतें हैं. उन्होंने दलील दी थी कि Pok की अदालतों के फैसलों को 'विदेशी अदालतों के फैसले' के तौर पर माना जाता है. इस पर हाईकोर्ट ने सवाल किया था कि जब PoK विदेशी जमीन है, तो पाकिस्तानी सेना वहां कैसे दाखिल हो सकती है?
यह भी पढ़ें: बंटवारे के बाद कैसे बना PoK? पढ़ें- संयुक्त राष्ट्र क्यों पहुंचा था कश्मीर का मामला
पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है PoK
पड़ोसी मुल्क का संविधान कहता है कि पाकिस्तान के क्षेत्र में बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वाह, पंजाब और सिंध प्रांत के साथ-साथ संघीय राजधानी होगी. हालांकि, इसमें ये भी कहा गया है कि विलय या किसी भी माध्यम से क्षेत्र में शामिल कोई भी राज्य या क्षेत्र भी पाकिस्तान का हिस्सा होगा. लेकिन इसमें PoK का कोई जिक्र नहीं है. PoK को पाकिस्तान 'आजाद कश्मीर' कहता है.
पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 257 में कश्मीर का जिक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि PoK तभी पाकिस्तान का हिस्सा होगा, जब यहां के लोग देश में शामिल होने का फैसला करेंगे.
हालांकि, अभी इस सवाल का जवाब नहीं है कि PoK के लोग पाकिस्तान में शामिल होना चाहते हैं या नहीं. इसलिए, पाकिस्तान के लिए PoK अभी भी 'विदेशी जमीन' बना हुआ है.
कैसा है PoK?
पीओके असल में दो हिस्सों में बंटा है. पहला- जिसे पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है. और दूसरा- गिलगित बल्टिस्तान. आजाद कश्मीर वाला हिस्सा भारत के कश्मीर से सटा हुआ है. जबकि, गिलगित-बाल्टिस्तान कश्मीर के सबसे उत्तरी भाग में लद्दाख की सीमा से लगा है.
ये पूरा इलाका 90,972 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है. आजाद जम्मू-कश्मीर 13,297 और गिलगित-बाल्टिस्तान 72,495 वर्ग किलोमीटर में है.
रणनीतिक लिहाज से पीओके काफी अहम है. इसकी सीमा कई देशों से लगती है. पश्चिम में इसकी सीमा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और खैबर-पख्तूनख्वाह से लगती है. उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान के वखां कॉरिडोर, उत्तर में चीन और पूर्व में भारत के जम्मू-कश्मीर से सीमा जुड़ी हुई है.
साल 1949 में आजाद जम्मू-कश्मीर के नेताओं और पाकिस्तानी सरकार के बीच एक समझौता हुआ. इसे कराची समझौता कहा जाता है. समझौते के तहत आजाद जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान को सौंप दिया था.
आज हालत ये है कि पाकिस्तान ने कश्मीर के जितने हिस्से पर कब्जा कर रखा है, वो बहुत पिछड़ा हुआ है. यही वजह है कि कथित आजाद कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग आजादी की मांग करते हैं.
यह भी पढ़ें: पाकिस्तान से आजादी क्यों चाहता है PoK? वो 5 फैक्टर, जिसकी वजह से नाराज हैं स्थानीय लोग
पाकिस्तान ने कैसे किया अवैध कब्जा
आजादी के कुछ महीने बाद ही 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान से हजारों कबायलियों से भरे सैकड़ों ट्रक कश्मीर में घुस गए. इनका मकसद था कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाना. ये वो कबायली थे जिन्हें पाकिस्तान की सरकार और सेना का समर्थन मिला था.
27 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज पर दस्तखत किए. अगले ही दिन भारतीय सेना कश्मीर में उतर गई. धीरे-धीरे भारतीय सेना पाकिस्तानी कबायलियों को पीछे धकेलने लगी.
कहा जाता है कि भारत में तब के गवर्नर जनरल माउंटबेटन की सलाह पर जवाहर लाल नेहरू इस मसले को एक जनवरी 1948 को संयुक्त राष्ट्र में ले गए. उस साल कश्मीर को लेकर संयुक्त राष्ट्र में चार प्रस्ताव आए.
संयुक्त राष्ट्र में जब तक ये सब हो रहा था, तब तक पाकिस्तानियों ने कश्मीर के बड़े इलाके पर अवैध कब्जा कर लिया था. संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच सीजफायर तो हो गया. लेकिन साथ ही ये भी तय हुआ कि भारत के पास जितना कश्मीर था, उतना भारत के पास ही रहेगा. और जितने हिस्से पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया था, वो उसके पास चला जाएगा. इसे ही पीओके कहा जाता है.
1974 में आजाद जम्मू-कश्मीर नाम से एक कानून बनाया गया था. इस कानून के कारण ही यहां की अपनी अलग सरकार है. यहां का अलग राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री है. अपनी अलग न्यायिक व्यवस्था और पुलिस है.
अभी क्या है स्थिति?
3 जून 1948 को संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव नंबर-51 पास किया गया. इसमें तय हुआ कि यूनाइटेड नेशन कमीशन इंडिया-पाकिस्तान को दोनों देशों में भेजा जाएगा. दिसंबर 1948 में इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट सौंपी. इसमें जनमत संग्रह और सीजफायर की बात कही गई.
संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पास होने के बावजूद पीओके से पाकिस्तानी सेना वापस नहीं हटी. सितंबर 1952 में एक और प्रस्ताव पास हुआ. इसके अनुसार, पाकिस्तान की तरफ से 3 से 6 हजार और भारत की तरफ से 12 से 18 हजार सैनिक कश्मीर में रह सकते हैं.
1971 की जंग के बाद 1972 में दोनों देशों के बीच शिमला समझौता हुआ. शिमला समझौते में तय हुआ कि कश्मीर से जुड़े विवाद पर बातचीत में किसी तीसरे पक्ष का दखल मंजूर नहीं होगा. फिर चाहे वो संयुक्त राष्ट्र ही क्यों न हो. इस विवाद को भारत और पाकिस्तान ही मिलकर सुलझाएंगे.
लेकिन पाकिस्तान इस मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण करता रहा. पाकिस्तान के नेता कई बार जानबूझकर संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दे को उठाते हैं. जबकि, भारत साफ कर चुका है कि ये दो देशों का विवाद है और इस मामले में कोई तीसरा दखल नहीं देगा.
बहरहाल, कश्मीर का मुद्दा अब तक नहीं सुलझ सका है. पाकिस्तान आतंकवाद के जरिए कश्मीर में हालात बिगाड़ता रहता है. जबकि, भारत साफ कर चुका है कि जब तक आतंकवाद बंद नहीं होगा, तब तक कश्मीर पर कोई बातचीत नहीं होगी.