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क्या हिंदी-संस्कृत की तरह भोजपुरी भी बनेगी आधिकारिक भाषा? रवि किशन का बिल कानून बना तो क्या होगा फायदा

भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार और बीजेपी सांसद रवि किशन ने भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए प्राइवेट बिल लेकर आए हैं, ताकि उसे आधिकारिक भाषा का दर्जा मिल सके. ऐसे में जानते हैं कि क्या भोजपुरी को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिल सकता है? और अगर दर्जा मिल जाता है तो क्या फायदा होगा?

रवि किशन गोरखपुर से सांसद हैं. (फाइल फोटो-PTI) रवि किशन गोरखपुर से सांसद हैं. (फाइल फोटो-PTI)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 29 जुलाई 2024,
  • अपडेटेड 1:17 AM IST

बीजेपी सांसद रवि किशन ने भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए एक प्राइवेट बिल पेश किया है, ताकि इसे आधिकारिक भाषा का दर्जा मिल सके. रवि किशन खुद भी भोजपुरी सिनेमा के स्टार रहे हैं. इससे पहले भी वो भोजपुरी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के मकसद से प्राइवेट बिल ला चुके हैं.

संसद के बजट सत्र में उन्होंने एक बार फिर प्राइवेट बिल पेश किया. संविधान संशोधन बिल 2024 को पेश करते हुए उन्होंने कहा कि भोजपुरी सिर्फ फूहड़ गीतों के बारे में नहीं है, बल्कि इसका एक समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास और साहित्य है, जिसे बढ़ावा देने की जरूरत है.

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इस बिल में उन्होंने कहा, 'इतने सारे लोग इस भाषा को बोलते और समझते हैं. ये हमारी मातृभाषा है. मैं इस भाषा को बढ़ावा देना चाहता हूं क्योंकि इस भाषा में फिल्म उद्योग भी चल रहा है और लाखों रोजगार भी मिल रहे हैं.'

रवि किशन ने कहा कि लोगों को इस भाषा को गंभीरता से लेना होगा. ये भाषा सिर्फ फूहड़ता तक नहीं है. ये भाषा बहुत समृद्ध है और इसका अपना साहित्य है.

भोजपुरी को आधिकारिक भाषा का दर्जा क्यों?

इस बिल में कहा गया है कि भोजपुरी भाषा गंगा के मैदानी इलाकों में उत्पन्न हुई है. ये बहुत पुरानी और समृद्ध भाषा है जिसकी उत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुई है.

इसमें आगे कहा गया है कि भोजपुरी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों के साथ-साथ कई दूसरे देशों में रहने वाले लोगों की मातृभाषा है. मॉरिशस में भी भोजपुरी भाषा बोलने वाली बड़ी आबादी है. दुनियाभर में 14 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं.

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बिल में कहा गया है कि भोजपुरी फिल्में देश-विदेश में लोकप्रिय हैं और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में गहरा असर डालती हैं. भोजपुरी भाषा में एक समृद्ध साहित्य और सांस्कृतिक विरासत है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपना कुछ काम भी भोजपुरी में किया है. विवेकी राय और भिखारी ठाकुर जैसे भोजपुरी के लेखक हुए हैं. भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी और मुंशी प्रेमचंद जैसे हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक भी भोजपुरी साहित्य से प्रभावित थे.

इस बिल में आखिरी में कहा गया है कि भोजपुरी भाषा को उसका उचित स्थान दिलाने के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार में कई आंदोलन हुए हैं, लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसे अभी तक आठवीं अनुसूची में जगह नहीं मिली है.

लंबे समय से हो रही है मांग

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग लंबे वक्त से हो रही है. 1971 में सीपीआई सांसद भोगेंद्र झा ने इस मुद्दे पर लोकसभा में बिल पेश किया था, जिसे नामंजूर कर दिया गया था.

बिहार के डिप्टी सीएम रहे सुशील मोदी ने 2013 में कहा था कि अगर बीजेपी केंद्र की सत्ता में आती है तो भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाएगा. पूर्व कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी कहा था कि वो भोजपुरी को उसका सही स्थान दिलाने के लिए कड़ी मेहनत करेंगे.

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2009 और 2016 में लोकसभा में इस मुद्दे को उठाया था. तब योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद थे. अप्रैल 2016 में योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा था कि भोजपुरी दुनिया की सबसे बड़ी बोली है, जिसे सिर्फ यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड में ही नहीं, बल्कि दुनिया के 27 देशों में भी बोला जाता है.

इससे पहले 2009 में भी योगी आदित्यनाथ ने लोकसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए तत्कालीन यूपीए सरकार से भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की थी.

क्या है संविधान की आठवीं अनुसूची?

संविधान की आठवीं अनुसूची में भारतीय भाषाओं का जिक्र है. इसमें 22 भाषाओं को जगह दी गई है. शुरुआत में इसमें 14 भाषाओं को ही शामिल किया गया था. बाद में तीन बार संशोधन कर इसमें 8 भाषाओं को और जोड़ा गया.

जब संविधान बना था, तब इसमें 14 भाषाएं- हिंदी, तेलुगु, बंगाली, मराठी, तमिल, उर्दू, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, उडि़या, पंजाबी, कश्मीरी, असमिया और संस्कृत थी. 

बाद में 1967 में सिंधी, 1992 में कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली और 2003 में मैथिली, संथाली, बोडो और डोंगरी को जोड़ दिया गया.

किसे भाषा को कैसे किया जाता है शामिल?

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गृह मंत्रालय के मुताबिक, किसी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए कोई तय मापदंड नहीं है.

हालांकि, पहले की कमेटियों ने कुछ मापदंड तय किए थे, जिनके आधार पर किसी भाषा को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलता है. मसलन, तीन दशकों की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार उस भाषा को कम से कम 5 लाख लोग बोलते हों. आसपास के इलाकों में दूसरी भाषा के रूप में इसका इस्तेमाल होता है. बंटवारे से पहले किसी राज्य में बोली जाती हो और बंटवारे के बाद भी कुछ राज्यों में इस्तेमाल हो रही हो.

इसके अलावा, अगर किसी भाषा का स्कूली शिक्षा में माध्यम के तौर पर उपयोग हो रहा है और लिखने की भाषा के रूप में 50 साल से अस्तित्व में होने का सूबत हो तो उसे आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाता है.

पर इससे फायदा क्या होता है?

अगर किसी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाता है तो वो आधिकारिक भाषा बन जाती है. ऐसे में यूपीएससी समेत बाकी सिविल सर्विस परीक्षाओं में इस भाषा में भी परीक्षा दी जा सकती है.

जिन राज्यों में इस भाषा को बोला या लिखा जाता है, वहां ये सरकारी कामकाज की भाषा बन जाती है. इसके अलावा लोकसभा या विधानसभा में भी इस भाषा में भाषण दिया जा सकता है या फिर सवाल-जवाब किया जा सकता है.

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तो क्या भोजपुरी शामिल होगी?

फिलहाल तो इसकी गुंजाइश न के बराबर है. वो इसलिए क्योंकि रवि किशन ने प्राइवेट बिल पेश किया है. प्राइवेट बिल संसद का ऐसा सदस्य पेश करता है जो मंत्री नहीं होता. कोई विपक्षी नेता भी प्राइवेट बिल ला सकता है.

प्राइवेट बिल को इसलिए लाया जाता है, ताकि उस मुद्दे पर सरकार का ध्यान लाया जा सके. हालांकि, प्राइवेट बिल का कानून बन पाना बहुत मुश्किल होता है. आजादी से अब तक सिर्फ 14 बार ही प्राइवेट बिल कानून बन सके हैं. 

रवि किशन इससे पहले साल 2019 में भी भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए प्राइवेट बिल लेकर आए थे.

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