
नाइजर के बाद अफ्रीका के एक और देश गैबॉन में तख्तापलट हो गया. यहां चुने हुए राष्ट्रपति को नजरबंद करके सैन्य शासन लागू हो गया. बीते 26 अगस्त को ही यहां इलेक्शन के नतीजे आए थे. अब 'अगली सूचना' तक सैनिक ही देश को संभालेंगे. नाइजर और सूडान में भी हाल में भारी फसाद सुनने में आया.
बीते साल बुर्किना फासो, चड और माली यही हालात देख चुके. दुनिया के बाकी हिस्से जहां तरक्की कर रहे हैं, वहीं अफ्रीकी देश लगातार गरीबी और लड़ाइयों में घिरे हुए हैं. बची-खुची कमी तख्तापलट से पूरी हो जाती है.
क्या है तख्तापलट और क्यों होता है?
ये तब होता है जब किसी देश की सेना उसके सुप्रीम लीडर पर भी भारी पड़ जाती है. इस समय जो उठापटक होती है, उसे सैन्य बदलाव कहते हैं. वहीं कई बार विपक्ष भी सत्ता पक्ष से ज्यादा मजबूत हो जाता है. ऐसे में भी तख्तापलट होता है, लेकिन इसमें खूनखराबा नहीं या कम होता है. दूसरी तरफ सैन्य बदलाव में सरकार और सेना के बीच लड़ाई होती है, यहां तक कि सरकार के पक्ष में खड़े आम लोगों का भी नुकसान होता है.
वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, आमतौर पर सैन्य तख्तापलट वहीं होता है, जहां मानव विकास सूचकांक (HDI) काफी कम होता है. यानी लोग गरीबी, भुखमरी, महंगाई, अराजकता जैसी चीजें झेल रहे हों, वहां सरकार से यकीन कम होने लगता है. सेना जब ये देखती है तो अपनी ताकत बढ़ाने लगती है. वो मौजूदा सत्ता के कई लोगों को अपने पक्ष में कर लेती है और फिर विद्रोह कर देती है. इसके बाद सरकार बेबस हो जाती है.
कहां, कितनी हुई तख्तापलट की कोशिशें
- अफ्रीका में 2 सौ से ज्यादा कोशिशें हुईं, जिनमें से 106 के करीब सफल भी हुईं.
- यूरोप में 17 प्रयासों में से 8 में तख्तापलट हो गया.
- दक्षिण एशिया में कुल 16 बार तख्तापलट को डॉक्युमेंट किया गया, जिसमें 10 सफल हुए.
- बेहद अस्थिर मिडिल ईस्ट में भी अफ्रीका से कम लगभग 50 बार ही तख्तापलट के प्रयास दिखे.
- लैटिन अमेरिका इस दौड़ में अफ्रीका के बाद खड़ा है, जिसने 146 प्रयास झेले.
- सबसे अधिक तख्तापलट के मामलों में अफ्रीकी देश सूडान सबसे ऊपर है.
- अरेस्टेड डिक्टेटरशिप वेबसाइट के मुताबिक साल 2021 से पहले अफ्रीका में हर साल एक तख्तापलट होता रहा.
क्यों अफ्रीका बना हुआ जंग का मैदान?
इसकी एक नहीं, कई वजहें हैं. शुरुआत जमीन से करते हैं. अटलांटिक और हिंद महासागर इसके पश्चिम और पूर्व में हैं. वहीं उत्तर की ओर सहारा मरुस्थल पसरा हुआ है. ऐसे में ये महाद्वीप लंबे समय तक दुनिया से कटा हुआ रहा. 18वीं सदी के मध्य में ये दूरी पटी तो लेकिन तब भी दुनिया में इसे बाकी देशों की तरह नहीं अपनाया गया. अफ्रीकी लोगों का रंग-रूप, कद-काठी में बाकियों से कुछ अलग होना भी आइसोलेशन का कारण बन गया. यही वजह है कि वहां या तो देश जल्दी गए नहीं, और पहुंचे भी तो वहां के कच्चे माल और मैनपावर के इस्तेमाल के लिए.
ताकत दिखाने का जरिया बन चुका
अफ्रीकी देश रूस और वेस्ट के लिए अपनी ताकत को साबित करने का जरिया भी बन चुके हैं. ये वैसा ही है, जैसे एक घर में रहने वाले दो मजबूत सदस्यों में मतभेद हो जाए तो एक मेंबर बाकियों को अपनी तरफ करने लगे. इससे उसके पास बहुमत हो जाएगा और जाहिर तौर पर ताकत बढ़ेगी. रूस पर कुछ इसी तरह के आरोप हैं. रूस की प्राइवेट सेना वैगनर यहां लंबे समय से एक्टिव थी ताकि पश्चिम का सपोर्ट करने वाली सरकार को गिरा सके.
रूस ठीक यही आरोप अमेरिका पर लगाता रहा कि वो जानकर अपनी पसंद की सरकार यहां बनवाता है ताकि यहां घुसपैठ कर सके. बता दें कि अफ्रीकी देशों में सोने और कई तरह के बेशकीमती कच्चे माल का भंडार है. इन्हीं खदानों पर कब्जा करने के लिए ISIS भी यहां पहुंचा, और यही रूस समेत पश्चिम का भी टारगेट हो सकता है.
इस्लामिक स्टेट का भी कब्जा दिखता रहा
इराक और सीरिया से भगाए जाने के बाद ISIS के बचे-खुचे आतंकियों ने हार नहीं मानी, बल्कि अफ्रीका में जाकर काम करने लगे.
वहां के बुर्किना फासो को इस्लामिक स्टेट ने लंबे समय तक अपना गढ़ बनाए रखा. वो गरीबी से जूझते यहां के युवाओं को जेहादी बनने की ट्रेनिंग देता, उन्हें हथियार मुहैया कराता और अपने साथ आतंकी बना डालता. कई इंटरनेशनल एजेंसियों आगाह करती रहीं कि इस्लामिक स्टेट सीमा-पार नशे के व्यापार और मानव तस्करी में भी इन लोगों का इस्तेमाल कर रहा है.
समय-समय पर फासो और माली समेत कई देशों में इस आतंकी ग्रुप की हिंसा की खबरें आती रहती हैं.
जातिगत लड़ाइयां भी यहां खूब होती हैं
पूरे महाद्वीप में मोटे तौर पर तीन एथनिक समूह हैं, बर्बर, होसा और योरुबा. इसमें भी कई सब-डिवीजन हैं. खानपान और पूजा-पाठ से लेकर बोली के आधार पर लोग खुद को अलग मानते हैं. तो होता ये है कि अक्सर सत्ता में बदलाव के दौरान लोकल समूह एक-दूसरे से लड़ने लगते हैं. सभी चाहते हैं कि उनके लोगों के पास ज्यादा ताकत आए. बड़े स्तर पर इसे धार्मिक रंग भी दिया जाता है, जैसे मुस्लिमों में शिया-सुन्नी के बीच का भेद. चूंकि अफ्रीका में युवा आबादी बहुत ज्यादा है, लिहाजा लड़ाइयां भी वहां खुलकर होती हैं.