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प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण देना आसान क्यों नहीं? कर्नाटक से पहले ये राज्य भी कर चुके हैं कोशिश, लेकिन...

विवाद के बाद कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने उस बिल पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिसमें प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को आरक्षण देने का प्रावधान था. अगर ये बिल कानून बनता तो प्राइवेट नौकरियों में कन्नड़ों को 50% से 100% तक आरक्षण मिलता. ऐसे में जानते हैं कि कर्नाटक से पहले किन-किन राज्यों में ऐसी कोशिश हो चुकी है और क्यों प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को आरक्षण देना आसान नहीं है?

प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को आरक्षण की कई बार कोशिश की जा चुकी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर- Getty) प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को आरक्षण की कई बार कोशिश की जा चुकी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर- Getty)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 18 जुलाई 2024,
  • अपडेटेड 7:51 PM IST

क्या प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण दिया जा सकता है? संविधान तो इसकी इजाजत नहीं देता. मगर राज्य सरकारें तमाम संवैधानिक चुनौतियों के बावजूद ऐसा करती हैं. ताजा उदाहरण कर्नाटक का है, जहां की सिद्धारमैया सरकार प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था लागू करने की कोशिश कर रही है.

कर्नाटक सरकार एक नया बिल लेकर आई. इस बिल को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है. अगर ये बिल कानून बनता है तो कर्नाटक में कारोबार कर रहीं प्राइवेट कंपनियों को अपने यहां कन्नड़ भाषियों को 50% से लेकर 100% तक आरक्षण देना होगा. हालांकि, फिलहाल कर्नाटक सरकार ने इस पर रोक लगा दी है.

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इस बिल पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का कहना है कि हम कन्नड़ समर्थक सरकार हैं और हमारी प्राथमिकता कन्नड़ लोगों के कल्याण का ध्यान रखना है.

हालांकि, इस बिल पर विवाद भी शुरू हो गया है. इंडस्ट्री लीडर्स ने चिंता जताते हुए कहा है कि सरकार को आरक्षण की व्यवस्था करने के बजाय स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करना चाहिए. वहीं, कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने बचाव करते हुए कहा कि कर्नाटक में कांग्रेस कन्नड़ लोगों की गरिमा को बनाए रखने के लिए सत्ता में आई है.

कर्नाटक सरकार का ये बिल क्या था?

स्थानीयों के लिए प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था करने के लिए लाए गए बिल का नाम 'कर्नाटक स्टेट एम्प्लॉयमेंट ऑफ लोकल कैंडिडेट्स इन द इंडस्ट्रीज, फैक्ट्रीज एंड अदर एस्टैब्लिशमेंट' है.

अगर ये बिल कानून बनता है तो इसके दायरे में सभी इंडस्ट्रियां, फैक्ट्रियां और प्राइवेट संस्थान आएंगे. इससे प्राइवेट नौकरियों में स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण जरूरी हो जाएगी. 

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बिल के कानून बनने के बाद प्राइवेट नौकरियों में मैनेजमेंट के 50% और नॉन-मैनेजमेंट के 75% पदों पर स्थानीय उम्मीदवारों को भर्ती करना होगा. इसके अलावा, ग्रुप C और D कैटेगरी के पदों पर 100% भर्तियां स्थानीयों की होगी.

बिल के मुताबिक, स्थानीय उसे माना जाएगा जिसे कन्नड़ भाषा बोलनी, लिखनी और समझ में आती हो और वो कम से कम 15 साल से कर्नाटक का मूल निवासी हो. अगर किसी स्थानीय ने 10वीं क्लास कन्नड़ भाषा में पास नहीं की होगी तो उसे कर्नाटक प्रोफेशिएंसी टेस्ट देना जरूरी होगा. 

अगर कोई कंपनी या मैनेजर इस कानून का उल्लंघन करती है तो उस पर 10 हजार से लेकर 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा.

हालांकि, जब इस बिल पर विवाद बढ़ा तो कर्नाटक सरकार ने बिल पर रोक लगा दी. कर्नाटक सरकार का कहना है कि वो इस बिल पर एक बार फिर विचार करेगी. इसके बाद इसे लाया जाएगा.

कहां-कहां आ चुकी है ऐसी कोशिश?

- आंध्र प्रदेशः 2019 में आंध्र प्रदेश में प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को 75% आरक्षण देने का कानून बना था. आंध्र पहला राज्य था, जहां इस तरह का कानून लाया गया था. हालांकि, हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था. फिलहाल, ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

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- महाराष्ट्रः 2019 में शिवसेना-कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन की सरकार बनने के बाद प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को 80% नौकरियां देने का प्रस्ताव लाया गया था. सरकार इसे विधानसभा में भी लाना चाहती थी. लेकिन इसे लाया नहीं गया.

- कर्नाटकः यहां कई बार प्राइवेट जॉब में कन्नड़ों के लिए आरक्षण तय करने की कोशिश हो चुकी है. सिद्धारमैया सरकार में ये तीसरी बार है जब ऐसी कोशिश हो रही है. इससे पहले 2014 और 2017 में भी सरकार कोशिश कर चुकी है. वहीं अक्टूबर 2020 में येदियुरप्पा की अगुवाई में बीजेपी सरकार ने प्राइवेट नौकरियों में ग्रुप C और D में 75% आरक्षण स्थानीयों को देने का ऐलान किया था. हालांकि, ये लागू नहीं हो सका.

- तेलंगानाः अगस्त 2020 में तेलंगाना कैबिनेट ने प्राइवेट सेक्टर की सेमी-स्किल्ड जॉब में 80% और स्किल्ड जॉब में 60% नौकरियां स्थानीयों के लिए आरक्षित करने को मंजूरी दी थी. हालांकि, बाद में सरकार ने ही इस बिल को वापस ले लिया था. 

- मध्य प्रदेशः 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने प्राइवेट इंडस्ट्रियों में स्थानीयों के लिए 70% आरक्षण तय करने के लिए कानून पास किया था. हालांकि, ये कानून लागू हो पाता, उससे पहले ही कांग्रेस सरकार गिर गई और बीजेपी की सरकार बन गई. इसके बाद इस पर कोई चर्चा नहीं हुई.

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- हरियाणाः 2020 में तब की मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को 75% आरक्षण देने के लिए कानून पास किया था. हाईकोर्ट में इस चुनौती दी गई. हाईकोर्ट ने पिछले साल नवंबर में इस कानून को रद्द कर दिया.

- झारखंडः दिसंबर 2023 में हेमंत सोरेन की सरकार ने सरकारी नौकरियों की ग्रुप 3 और 4 में स्थानीयों को 100% आरक्षण देने के मकसद से बिल पास किया था. ये बिल विधानसभा में पास हो गया था, लेकिन गवर्नर ने इसे लौटा दिया था.

प्राइवेट सेक्टर में कोटा लाने में चुनौतियां

1. समानता का अधिकारः संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है. जबकि, अनुच्छेद 15 और 16 जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है. हालांकि, ये अनुच्छेद किसी सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग या एससी-एसटी की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान भी करते हैं.

2. संवैधानिक वैधताः भारत का संविधान जन्म स्थान या निवास स्थान के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है. इसलिए जरूरी है कि नौकरियों में स्थानीयों को आरक्षण देने के मुद्दे पर इनका ध्यान रखा जाना भी जरूरी है, ताकि अदालतों में इसे चुनौती न मिले.

3. मौलिक अधिकारों में दखलः मूल निवास के आधार पर आरक्षण अनुच्छेद 14 के तहत मिले समानता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है. अदालतें अक्सर ऐसे आरक्षणों की जांच करती हैं. ऐसे कानून बनाते समय इन बातों का ध्यान रखा जाना जरूरी है कि इससे गैर-निवासियों के खिलाफ बहुत भेदभाव न हो.

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4. आर्थिक प्रभावः मूल निवास के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था करने से आर्थिक प्रभाव पड़ सकता है. खासकर ऐसी जगहों पर जहां बड़ी संख्या में बाहरी राज्यों से लोग काम के लिए आते हैं. अदालतों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि इस तरह के आरक्षण से आर्थिक और सामाजिक विघटन हो सकता है.

5. कोटे की लिमिटः 1992 में इंदिरा साहनी मामले में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया था कि आरक्षण की सीमा 50% से ज्यादा नहीं होगी. आरक्षण की यही लिमिट मूल निवासी आरक्षण में भी होनी चाहिए. अदालतों ने प्राइवेट सेक्टर में इस तरह के आरक्षण को काफी हद तक खारिज कर दिया है.

अदालतों ने क्या-क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे फैसले दिए हैं, जिसने मूल निवास के आधार पर आरक्षण पर मिसाल कायम की है. 1984 में प्रदीप जैन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा था कि मूल निवासी उम्मीदवारों को कुछ प्राथमिकता दी जा सकती है, लेकिन ये पूरी तरह नहीं हो सकती और इससे गैर-निवासियों को बाहर नहीं रखा जा सकता.

1995 में सुनंदा रेड्डी बनाम आंध्र सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पीजी मेडिकल कोर्सेस में मूल निवासियों को 100% आरक्षण को रद्द कर दिया था. तब कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण के कारण योग्यता और दक्षता से समझौता नहीं होना चाहिए.

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इसी तरह 2002 में कैलाश चंद शर्मा बनाम राजस्थान सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में मूल निवासियों को कुछ खास फायदे देने वाले राजस्थान सरकार के फैसले को अमान्य करार दिया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है.

इसी तरह हाईकोर्ट ने भी नौकरियों में मूल निवासियों के आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया है. 1997 में अरविंद दत्तात्रेय बांड मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरियों में मूल निवासियों को 100% प्राथमिकता देने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले को असंवैधानिक ठहराया था. 

पिछले साल नवंबर में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को 75% आरक्षण के हरियाणा सरकार के कानून को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि इस कानून का मकसद लोगों के बीच अंतर और भेदभाव करना है. कोर्ट ने ये भी कहा था कि प्राइवेट एम्प्लॉयर को स्थानीय लोगों को भर्ती करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.

इनपुटः नलिनी शर्मा

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