
चुनाव से काफी पहले से ही चुनाव आयोग काम करने लगा था. दूर-दराज के इलाकों से लेकर हिंसा-प्रभावित क्षेत्रों में मतदान शांति से और पारदर्शिता से हो सके, इसके लिए आयोग की लंबी-चौड़ी बॉडी लगातार मुस्तैद रही. अब इलेक्शन के नतीजे भी आ चुके, और मोदी 3.0 कार्यकाल की शुरुआत भी हो चुकी. लेकिन अब भी ईसी खाली नहीं बैठेगा, उसके हिस्से नए काम आ चुके. जानिए, इलेक्शन के बाद क्या करता है चुनाव आयोग, कौन सी बड़ी जिम्मेदारियां उसके हिस्से हैं.
इलेक्शन कमीशन एक तरह की अदालत का काम करता है, जिसका काम पॉलिटिकल पार्टियों के बखेड़े सुलझाना है. किस पार्टी पर किन नेताओं का हक होगा, ये काम ईसी ही देखता है. मसलन, कुछ समय पहले महाराष्ट्र में एनसीपी टूटकर दो फांक हो गई थी. तब असल एनसीपी को लेकर काफी विवाद हुआ था, जिसका फैसला इलेक्शन कमीशन ने ही सुनाया. उसने तय किया कि एनसीपी अजित पवार के पास रहेगी, और शरद पवार को अपनी पार्टी का नाम बदलना होगा.
पार्टियों में टूट पर निपटारे का काम आयोग ही करता है. इस दौरान वो कोर्ट की तरह तमाम दस्तावेज देखता और तर्क सुनता है.
राजनैतिक दलों को नाम और चिन्ह बांटने का काम चुनाव आयोग करता है. जैसे शिवसेना का अधिकार एकनाथ शिंदे गुट को मिला तो उद्धव गुट को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नाम मिला. चुनाव के पहले किसी पार्टी को आधिकारिक चुनाव चिन्ह भी यही देता है. देश में बहुत सी पॉलिटिकल पार्टियां हैं. इनमें कौन सी पार्टी नेशनल होगी और कौन सा दल क्षेत्रीय, ये तय करने का हक भी चुनाव आयोग करता है. इसके लिए वो पार्टियों को मिले वोट प्रतिशत देखता है.
ईसी के पास ये अधिकार भी है कि वो संसद और विधानसभा में चुनकर आ चुके सदस्यों की अयोग्यता पर टिप्पणी कर सके. जैसे फिलहाल गंभीर अपराधों के आरोप में जेल में बंद दो कैदी चुनाव जीत चुके हैं. अब बहस हो रही है कि क्या आतंक फैलाने या देश तोड़ने के इरादे से काम करने वालों को चुनाव लड़ने और अपने क्षेत्र का रिप्रेजेंटेशन करने का हक होना चाहिए. फिलहाल ईसी ने इसपर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन हो सकता है कि आगे इसपर कोई बात हो. इसी तरह से चुनाव के दौरान करप्शन के दोषी पाए गए लोगों को अयोग्य घोषित करने के मामले में भी ईसी परामर्श देती है. अगर कोई नेता या पार्टी चुनावी खर्चों में कोई गड़बड़ी करे तो उसे भी अयोग्य करार दिया जा सकता है.
एक बहुत जरूरी काम है वोटर आईडी जारी करना. आयोग मतदाता पहचान पत्र देता है. कोई वोटर अगर किसी एक से दूसरी जगह पर लंबे समय के लिए जाकर रहे तो वोटर लिस्ट में उसका नाम ट्रांसफर करना भी आयोग की जिम्मेदारी है. इसी तरह किसी वोटर के निधन के बाद लिस्ट से उसका नाम हटाया जाता है.
चुनाव के काफी पहले ही ईसी आदर्श आचार संहिता के लिए सभी राजनैतिक दलों की सहमति लेता है, और फिर उसे लागू करता है ताकि पार्टियों को प्रचार-प्रसार के लिए समान अवसर मिल सकें. समय-समय पर मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट को देखा और उसपर चर्चा की जाती है.
आम चुनाव तो खत्म हो चुके, लेकिन इसके बाद भी कई राज्यों के चुनाव कतार में हैं. इसकी जिम्मेदारी भी इलेक्शन कमीशन के पास रहती है. इसके अलावा चुनाव आयोग किसी नेता के निधन या उसे मिली सजा के बाद अयोग्य करार दिए जाने पर दोबारा भी इलेक्शन करवा सकता है, लेकिन इसका फैसला वो अकेले नहीं, बल्कि पॉलिटिकल पार्टियों की सहमति से ही ले सकता है.
चुनावों के दौरान भारी मात्रा में मिले कैश के निपटारे की जिम्मेदारी भी ईसी के पास होती है. बता दें कि लोकसभा से लेकर स्थानीय इलेक्शन्स में भी वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए कई पार्टियां नकदी, कीमती धातुएं और शराब वगैरह बांटती रहीं. चुनावी चरणों के दौरान ये जब्त होते हैं, जिन्हें संभालने का जिम्मा आयोग के पास रहता है.