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जेब काट रही बेमौसम बारिश और भयानक गर्मी? पढ़ें- लगातार कम हो रही महंगाई 9 महीने बाद अचानक कैसे बढ़ गई?

कई महीनों से कम हो रही महंगाई दर 9 महीने बाद फिर हाई लेवल पर पहुंच गई है. सरकार की ओर से जारी आंकड़ों में बताया गया है कि सितंबर महीने में खुदरा महंगाई दर लगभग साढ़े पांच फीसदी रही. इससे पहले इतनी महंगाई दर पिछले साल दिसंबर में थी.

सब्जियों की कीमत में सबसे ज्यादा उछाल आया है. (फाइल फोटो-PTI) सब्जियों की कीमत में सबसे ज्यादा उछाल आया है. (फाइल फोटो-PTI)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 15 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 12:19 AM IST

महंगाई एक बार फिर बढ़ी है. सोमवार को जो आंकड़े सामने आए हैं, वो बताते हैं कि नौ महीने बाद खुदरा महंगाई दर यानी रिटेल इन्फ्लेशन रेट में बढ़ोतरी हुई है. अगस्त में खुदरा महंगाई दर 3.65% रही थी, जो सितंबर में बढ़कर 5.49% पहुंच गई. यानी, महीनेभर में ही महंगाई दर 2 फीसदी तक बढ़ गई.

नौ महीने बाद महंगाई दर बढ़ी है. दिसंबर 2023 में खुदरा महंगाई दर 5.69% रही थी. इसके बाद से ही महंगाई घट रही थी. जुलाई और अगस्त में तो ये 4% से भी नीचे आ गई थी. लेकिन अब एक बार फिर ये साढ़े पांच फीसदी के ऊपर पहुंच गई है.

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सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, गांवों में अब भी महंगाई दर शहरों की तुलना में थोड़ी ज्यादा है. सितंबर के महीने में गांवों में खुदरा महंगाई दर 5.87% तो शहरी इलाकों में 5.05% रही.

सब्जियों की कीमतों में लगी आग

भयंकर गर्मी, कम समय में ज्यादा बारिश और कहीं सूखा पड़ने की वजह से फसलें बर्बाद हो रहीं हैं. इससे सब्जियां, फल, दाल और खाने-पीने की चीजों की कीमतों में आग लग गई.

अक्टूबर में ही आई आरबीआई की रिपोर्ट बताती है कि 2011-12 से 2019-20 यानी 10 साल में सब्जियों की कीमतें इतनी नहीं बढ़ीं, जितनी इस साल के पांच महीनों में बढ़ गई. 

आरबीआई की रिपोर्ट कहती है कि 2011-12 से 2019-20 के बीच हर साल सब्जियों की कीमत में औसतन 30.4 फीसदी बढ़ी. जबकि, 2024-25 के पांच महीनों यानी अप्रैल से अगस्त के बीच 32.9 फीसदी तक बढ़ गई है.

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एक साल में कैसे बढ़ी महंगाई?

आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में बढ़ती महंगाई के लिए मौसम को जिम्मेदार माना था. रिपोर्ट में कहा गया था कि इस साल ज्यादातर इलाकों में भयंकर गर्मी पड़ी, जिसके चलते कई राज्यों में फसलें बर्बाद हुईं. इसका असर सब्जी, दाल और फलों की कीमतों पर पड़ा. इतना ही नहीं, कई राज्यों में बाढ़ और बेमौसम बारिश के कारण भी फसलों को नुकसान पहुंचा.

आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि मौसम की मार के चलते फसलों का उत्पादन कम हो रहा और आपूर्ति काफी हद तक प्रभावित हो रही है. इस कारण सब्जियों, अनाज और दालों की कीमतों पर असर पड़ा.

कंज्यूमर अफेयर्स डिपार्टमेंट की डेली प्राइस रिपोर्ट देखें तो पता चलता है कि एक साल में खाने-पीने की चीजें कितनी महंगी हो गईं. एक साल पहले तुअर दाल की औसत कीमत 152 रुपये प्रति किलो थी. अब 14 अक्टूबर को देश में एक किलो तुअर दाल की औसत 163 रुपये से ज्यादा है.

एक साल पहले एक किलो आलू की औसत कीमत 23.86 रुपये थी, जो अब 37.08 रुपये है. पहले प्याज की औसत कीमत 34.17 रुपये प्रति किलो थी, जो अब 54.13 रुपये पहुंच गई है. इसी तरह पिछले साल तक एक किलो टमाटर की औसत कीमत 27.89 रुपये थी, लेकिन 14 अक्टूबर 2024 को इसकी कीमत 67.5 रुपये थी.

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क्या होती है महंगाई दर?

महंगाई दर का मतलब है किसी सामान या सेवा की समय के साथ कीमत बढ़ना. इसे महीने और साल के हिसाब से मापते हैं. मसलन, कोई चीन सालभर पहले 100 रुपये की मिल रही थी, लेकिन अब 105 रुपये में मिल रही है. इस हिसाब से इसकी सालाना महंगाई दर 5 फीसदी रही.

महंगाई दर बढ़ने का सबसे बड़ा नुकसान ये होता है कि इससे समय के साथ मुद्रा का महत्व कम हो जाता है. यानी, अगर आपके पास आज 105 रुपये है तो वो सालभर पहले तक 100 रुपये के बराबर थे.

अभी महंगाई दर का आकलन 2012 के बेस प्राइस से किया जाता है. इससे अनुमान लगाया जाता है कि 2012 में 100 रुपये में आप जो चीज खरीद सकते थे, आज वही खरीदने के लिए आपको कितना खर्च करना होगा.

2012 में अगर आप 100 रुपये में कोई सामान खरीदते थे, तो आज उसी चीज को खरीदने के लिए आपको 194.2 रुपये खर्च करने होंगे. एक साल पहले तक आपको 184.1 रुपये खर्च करने पड़ते थे. चूंकि, एक साल में ही आपको उसी सामान को खरीदने के लिए 184.1 रुपये की बजाय 194.2 रुपये खर्च करने पड़े, इसलिए सालाना महंगाई दर 5.49% हो गई.

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कैसे मापते हैं महंगाई?

भारत में महंगाई मापने के दो इंडेक्स हैं. पहला है कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी CPI. और दूसरा है होलसेल प्राइस इंडेक्स यानी WPI. 

CPI के जरिए खुदरा महंगाई दर निकाली जाती है. वहीं, WPI से थोक महंगाई दर को मापा जाता है. 

आप और हम जैसे आम लोग ग्राहक के तौर पर जो सामान खरीदते हैं, वो खुदरा बाजार से खरीदते हैं. सीपीआई के जरिए पता लगाया जाता है कि खुदरा बाजार में जो सामान है, वो कितना महंगा या सस्ता हो रहा है. 

वहीं, कारोबारी या कंपनियां थोक बाजार से सामान खरीदती हैं. WPI से थोक बाजार में सामान की कीमतों में होने वाले बदलाव का पता चलता है. 

दुनिया के कई देशों में WPI को ही महंगाई मापने के लिए मुख्य मानक माना जाता है, लेकिन भारत में CPI को मुख्य पैमाना माना जाता है.

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